Friday, November 30, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 12


ज़ेहनी ग़ुस्ल 

ज़िंदगी एक दूभर सफ़र है, 
यह तन इसका मुसाफ़िर है. 
आसमान के नीचे धूप, धूल और थकान के साथ साथ सफ़र करके 
हम बेहाल हो जाते हैं. मुसाफ़िर पसीने पसीने हो जाता है, 
लिबास से बदबू आने लगती है, तबीअत में बेज़ारी होने लगती है, 
ऐसे में किसी साएदार पेड़ को पाकर हम राहत महसूस करते है. 
कुछ देर के लिए इस मरहले पर सुस्ताते हैं, पानी मिल गया तो हाथ मुंह भी धो लेते हैं मगर यह पेड़ का साया सफ़र का मरहला होता है, हमें पूरी सेरी नहीं देता. 
हमें एक भरपूर ग़ुस्ल की ज़रुरत महसूस होती है. 
इस सफ़र में अगर कोई साफ़ सफ़फ़ाफ़ और महफूज़ ग़ुस्ल ख़ाना हमको मिल जाए 
तो हम अन्दर से सिटकिनी लगा कर, सारे कपड़े उतार के फेंक देते हैं 
और मादर ज़ाद नंगे हो जाते हैं, फिर जिस्म को शावर के हवाले कर देते हैं. 
अन्दर से सिटकिनी लगी हुई है, कोई खटका नहीं है. सामने कद्दे आदम आईना 
लगा हुआ है. इसमें बग़ैर किसी लिहाज़ के अपने पूरे जिस्म का जायज़ा लेते है, 
आख़िर यह अपना ही तो है. बड़े प्यार से मल मल कर अपने बदन के 
हर हिस्से से गलाज़त छुडाते हैं. जब बिलकुल पवित्र हो जाते हैं 
तो खुश्क तौलिए से जिस्म को हल्का करते हैं, 
इसके बाद धुले जोड़े पहेन कर संवारते हैं. 
इस तरह सफ़र के तकान से ताज़ा दम होकर हम 
अगली मंजिल की तरफ क़दम बढ़ाते हैं.
ठीक इसी तरह हमारा दिमाग भी सफ़र में है, 
सफ़र के तकान से बोझिल है. सफ़र के थकान ने इसे चूर चूर कर रखा है. 
जिस्म की तरह ही ज़ेहन को भी एक हम्माम की ज़रुरत है 
मगर इसके तक़ाज़े से आप बेख़बर हैं जिसकी वजेह से ग़ुस्ल करने का एहसास 
आप नहीं कर पा रहे हैं. 
नमाज़ रोज़े पूजा पाठ और इबादत को ही हम ग़ुस्ल समझ बैठे हैं. 
यह तो सफ़र में मिलने वाले पेड़ नुमा मरहले जैसे हैं, 
हम्मामी मंज़िल की नई राह नहीं. 
ज़ेहनी ग़ुस्ल है इल्हाद या नास्तिकता के साबुन से स्नान.
जिसे की धर्म और मज़हब के सौदागरों ने ग़लत माने पहना रखा है, 
गालियों जैसा घिनावना. बड़ी हिम्मत की ज़रुरत है कि 
आप अपने ज़ेहन को जो भी लिबास पहनाए हुए हैं, महसूस करें कि 
वह सदियों के सफ़र में मैले, गंदे और बदबूदार हो चुके हैं. 
इन को तन से उतार फेंकिए, 
नए फ़ितरी और लौकिक लिबास के बेदाग़ तोहफ़े पैक्ड 
आपका इंतज़ार कर रहे हैं. ज़रुरत है आपको एक ज़ेह्नी ग़ुस्ल की. 
बंद सिटकिनी कगे ग़ुस्ल ख़ाने जाकर  एक दम उरियाँ हो जाइए, 
वैसे ही जैसे आपने अपने शरीर को प्यार और जतन से साफ़ किया हैं, 
अपने ज़ेहन को नास्तिकता और नए मानव मूल्यों के साबुन से मल मल कर धोइए. जदीद तरीन इंसानी क़दरों की ख़ुशबू में बह जाइए, 
जब आप तबदीली का ग़ुस्ल कर रहे होंगे, कोई आप को देख नहीं रहा होगा, 
अन्दर से सिटकिनी लगी हुई होगी. शुरू कीजिए दिमाग़ी ग़ुस्ल. 
धर्मो मज़हब, ज़ात पात की मैल को ख़ूब रगड़ रगड़ कर साफ़ कीजिए, 
हाथ में सिर्फ़ इंसानियत का कीमयाई साबुन हो. 
इस ग़ुस्ल से आप के दिमाग़ का एक एक गोशा पाक और साफ़ हो जाएगा. 
धुले हुए नए जोड़ों को पहन कर बाहर निकलिए. 
अपनी शख़्सियत को बैलौस, बे खौ़फ जसारत के जेवरात से सजाइए, 
इस तरह आप वह बन जाएँगे जो बनने का हक़ क़ुदरत ने आप को अता किया है.
याद रखें जिस्म की तरह ज़ेहन को भी ग़ुस्ल की ज़रुरत हुवा करती है. 
सदियों से आप धर्म ओ मज़हब का लिबास अपने ज़ेहन पर लादे हुए हैं 
जो कि गूदड़ हो चुके हैं. इसे उतार के आग या फिर क़ब्र के हवाले कर दें 
ताकि इसके जरासीम किसी दूसरे को असर अंदाज़ न कर सकें. 
नए हौसले के साथ ख़ुद को सिर्फ़ एक इंसान होने का एलान कर दें. 
***

Thursday, November 29, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 11


  ज़ेहनी ग़ुस्ल 

ज़िंदगी एक दूभर सफ़र है, 
यह तन इसका मुसाफ़िर है. 
आसमान के नीचे धूप, धूल और थकान के साथ साथ सफ़र करके 
हम बेहाल हो जाते हैं. मुसाफ़िर पसीने पसीने हो जाता है, 
लिबास से बदबू आने लगती है, तबीअत में बेज़ारी होने लगती है, 
ऐसे में किसी साएदार पेड़ को पाकर हम राहत महसूस करते है. 
कुछ देर के लिए इस मरहले पर सुस्ताते हैं, पानी मिल गया तो हाथ मुंह भी धो लेते हैं मगर यह पेड़ का साया सफ़र का मरहला होता है, हमें पूरी सेरी नहीं देता. 
हमें एक भरपूर ग़ुस्ल की ज़रुरत महसूस होती है. 
इस सफ़र में अगर कोई साफ़ सफ़फ़ाफ़ और महफूज़ ग़ुस्ल ख़ाना हमको मिल जाए 
तो हम अन्दर से सिटकिनी लगा कर, सारे कपड़े उतार के फेंक देते हैं 
और मादर ज़ाद नंगे हो जाते हैं, फिर जिस्म को शावर के हवाले कर देते हैं. 
अन्दर से सिटकिनी लगी हुई है, कोई खटका नहीं है. सामने कद्दे आदम आईना 
लगा हुआ है. इसमें बग़ैर किसी लिहाज़ के अपने पूरे जिस्म का जायज़ा लेते है, 
आख़िर यह अपना ही तो है. बड़े प्यार से मल मल कर अपने बदन के 
हर हिस्से से गलाज़त छुडाते हैं. जब बिलकुल पवित्र हो जाते हैं 
तो खुश्क तौलिए से जिस्म को हल्का करते हैं, 
इसके बाद धुले जोड़े पहेन कर संवारते हैं. 
इस तरह सफ़र के तकान से ताज़ा दम होकर हम 
अगली मंजिल की तरफ क़दम बढ़ाते हैं.
ठीक इसी तरह हमारा दिमाग भी सफ़र में है, 
सफ़र के तकान से बोझिल है. सफ़र के थकान ने इसे चूर चूर कर रखा है. 
जिस्म की तरह ही ज़ेहन को भी एक हम्माम की ज़रुरत है 
मगर इसके तक़ाज़े से आप बेख़बर हैं जिसकी वजेह से ग़ुस्ल करने का एहसास 
आप नहीं कर पा रहे हैं. 
नमाज़ रोज़े पूजा पाठ और इबादत को ही हम ग़ुस्ल समझ बैठे हैं. 
यह तो सफ़र में मिलने वाले पेड़ नुमा मरहले जैसे हैं, 
हम्मामी मंज़िल की नई राह नहीं. 
ज़ेहनी ग़ुस्ल है इल्हाद या नास्तिकता के साबुन से स्नान.
जिसे की धर्म और मज़हब के सौदागरों ने ग़लत माने पहना रखा है, 
गालियों जैसा घिनावना. बड़ी हिम्मत की ज़रुरत है कि 
आप अपने ज़ेहन को जो भी लिबास पहनाए हुए हैं, महसूस करें कि 
वह सदियों के सफ़र में मैले, गंदे और बदबूदार हो चुके हैं. 
इन को तन से उतार फेंकिए, 
नए फ़ितरी और लौकिक लिबास के बेदाग़ तोहफ़े पैक्ड 
आपका इंतज़ार कर रहे हैं. ज़रुरत है आपको एक ज़ेह्नी ग़ुस्ल की. 
बंद सिटकिनी कगे ग़ुस्ल ख़ाने जाकर  एक दम उरियाँ हो जाइए, 
वैसे ही जैसे आपने अपने शरीर को प्यार और जतन से साफ़ किया हैं, 
अपने ज़ेहन को नास्तिकता और नए मानव मूल्यों के साबुन से मल मल कर धोइए. जदीद तरीन इंसानी क़दरों की ख़ुशबू में बह जाइए, 
जब आप तबदीली का ग़ुस्ल कर रहे होंगे, कोई आप को देख नहीं रहा होगा, 
अन्दर से सिटकिनी लगी हुई होगी. शुरू कीजिए दिमाग़ी ग़ुस्ल. 
धर्मो मज़हब, ज़ात पात की मैल को ख़ूब रगड़ रगड़ कर साफ़ कीजिए, 
हाथ में सिर्फ़ इंसानियत का कीमयाई साबुन हो. 
इस ग़ुस्ल से आप के दिमाग़ का एक एक गोशा पाक और साफ़ हो जाएगा. 
धुले हुए नए जोड़ों को पहन कर बाहर निकलिए. 
अपनी शख़्सियत को बैलौस, बे खौ़फ जसारत के जेवरात से सजाइए, 
इस तरह आप वह बन जाएँगे जो बनने का हक़ क़ुदरत ने आप को अता किया है.
याद रखें जिस्म की तरह ज़ेहन को भी ग़ुस्ल की ज़रुरत हुवा करती है. 
सदियों से आप धर्म ओ मज़हब का लिबास अपने ज़ेहन पर लादे हुए हैं 
जो कि गूदड़ हो चुके हैं. इसे उतार के आग या फिर क़ब्र के हवाले कर दें 
ताकि इसके जरासीम किसी दूसरे को असर अंदाज़ न कर सकें. 
नए हौसले के साथ ख़ुद को सिर्फ़ एक इंसान होने का एलान कर दें. 
***

Wednesday, November 28, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 10


अल्लाह क्या है ?               
अल्लाह एक वह्म, एक ग़ुमान है.
अल्लाह का कोई भी ऐसा वजूद नहीं जो मज़ाहिब बतलाते हैं.
अल्लाह एक अंदाजा है, एक अंदेशा नुमा खौ़फ़ है.
अल्लाह एक अक़ीदा है जो विरासत या ज़ेह्नी ग़ुलामी के मार्फ़त मिलता है.
अल्लाह हद्दे ज़ेहन है या अक़ली कमज़ोरी की अलामत है,
अल्लाह अवामी राय है या फिर दिल की चाहत,
कुछ लोगों की राय है कि 
अल्लाह कोई ताक़त है जिसे सुप्रीम पावर भी कह जाता है?
अल्लाह कुछ भी नहीं है. 
ग़ुनाह और बद आमाली कोई फ़ेल नहीं होता ?
अगर आपके फ़ेल से किसी का कोई नुक़सान न हो. 
इन बातों का यक़ीन करके अगर कोई शख़्स मौजूदा 
इंसानी क़द्रों से बग़ावत करता है तो वह 
बद आमाली की किसी हद के क़रीब सकता है.
ऐसे कमज़ोर इंसानों के लिए अल्लाह को मनवाना ज़रूरी है.
वैसे अल्लाह के मानने वाले भी ग़ुनहगारी की तमाम हदें पर कर जाते हैं.
बल्कि अल्लाह के यक़ीन का मुज़ाहिरा करने वाले और अल्लाह की 
अलम बरदारी करने वाले सौ फ़ीसद दर पर्दा बेज़मिर मुजरिम देखे गए हैं.
बेहतर होगा कि बच्चों को दीनी तअलीम देने की बजाय उन्हें  
अख़लाक़यात पढ़ाई जाए, 
वह भी जदीद तरीन इंसानी क़द्रें जो मुस्तक़बिल क़रीब में उनके लिए फ़ायदेमंद हों.
मुस्तक़बिल बईद में इंसानी क़द्रों के बदलते रहने के इमकानात हुवा करते है.
आजका सच कल झूट साबित हो सकता हैं, 
आजकी क़द्रें कल की ना क़दरी बन सकती है.
***

Tuesday, November 27, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 9


ख़ुद को तलाशो     

मौजूदा  साइंस की बरकतों से फैज़याब दौर के लोगो! 
ख़ास कर मुसलमानों!!
एक बार अपने ख़ुदा के वजूद का तसव्वुर अपनी ज़ेहनी सतह पर बड़ी ग़ैर जानिब दारी से क़ायम करो. 
बस कि सच का मुक़ाम ज़ेहन में हो. 
सच से किसी शरीफ़ और ज़हीन आदमी को इंकार नहीं हो सकता, 
इसी सच को सामने रख कर ख़ुदा का वजूद तलाशो, 
हमारे कुछ सवालों का जवाब ख़ुद को दो.
1-क्या ख़ुदा हिदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों और दीगर मज़ाहिब के हिसाब से जुदा जुदा हो सकता है?
2- क्या ख़ुदा भारत, चीन, योरोप, अरब, अमरीका और जापान वग़ैरह के जुग़राफ़ियाई एतबार से अलग अलग हो सकता है?
3- क्या ख़ुदा नस्लों, तबकों, फिरकों, संतों, ग़ुरुओं, पैग़मबरों और क़बीलों के एतबार से जुदा जुदा हो सकते हैं?
4- समाज के इज्तेमाई (सामूहिक) फ़ैसले के नतीजे से बरआमद ख़ुदा क्या हो सकता है?
5- खौफ़, लालच, जंग ओ जेहाद से बरामद किया हुआ ख़ुदा क्या सच हो सकता है?
6- क्या ज़ालिम, जाबिर, ज़बर दस्त, मुन्तक़िम चालबाज़, ग़ुमराह करने वाली हस्ती ख़ुदा हो सकती है?
7- पहले हमल में ही इंसान की क़िस्मत लिख्खे, फिर पैदा होते ही कांधों पर आमाल नवीस फ़रिश्ते मुक़र्रर करे. इसके बाद यौमे हिसाब मुनअक़िद करे, 
क्या ऐसा कोई ख़ुदा हो सकता है?
8-क्या ख़ुदा ऐसा हो सकता है जो नमाज़, रोज़ा, पूजा पाठ, चढ़ावा और प्रसाद वग़ैरह का लालची हो सकता है?
9- क्या ऐसा ख़ुदा कोई हो सकता है कि जिसके हुक्म के बग़ैर पत्ता भी न हिले?
तो क्या तमाम समाजी बुराइयाँ इसी के हुक्म से हैं.
 तब तो दुन्या के तमाम दस्तूर इसके ख़िलाफ़ हैं.
10- कहते हैं ख़ुदा के लिए हर कम मुमकिन है, क्या ख़ुदा इतना बड़ा पत्थर का गोला बना सकता है, जिसे वह ख़ुद न उठा पाए?
मुसलमानों! 
इन सब सवालों का सही सही जवाब पाने के बाद तुम चाहो तो बेदार हो सकते हो.
जगे हुए इंसान को किसी .पैग़मबर अल्लाह की ज़रुरत नहीं होती है.
जगे हुए इंसान का रहनुमा ख़ुद इसके अन्दर विराजमान होता है.
याद रखो तुम्हारे जागने से सिर्फ़ तुम नहीं जागते, 
बल्कि इर्द गिर्द का माहौल जागेगा, 
चिराग़ जलने के बाद सिर्फ़ चिराग़ रौशनी में नहीं आता 
बल्कि तमाम सम्तें रौशन हो जाती हैं.

महक़ उट्ठो अपने अन्दर की ख़ुशबू से. लाशऊरी तौर पर तुम 
अपनी इस ख़ुशबू को ख़ारजी रुकावटों के बायस पहचान नहीं पाते. 
ये ख़ुशबू है इंसानियत की. 
मज़हब तो ख़ारजी लिबास पर इतर का छिडकाव भर है.
छोडो इन पंज रुकनी लग्वियात को. 
और इस पंज वकता खुराफ़ात को,
मैं देता हूँ तुम्हें बहुत ही आसान पाँच अरकान ए हयात.

1-सच को जानो. सच के बाद भी सच, 
सच को ओढो और बिछाओ, 
2- मशक़्क़त, का एक नवाला भी अपने या अपने बच्चों के मुँह में हलाल है, 
मुफ़्त या हराम से मिली नेमत मुँह में मत जाने दो.
3- हिम्मत, सदाक़त को जिसारत की बहुत सख़्त ज़रुरत होती है, 
वैसे सदाक़त अपने आप में जिसारत है.
4. प्यार, इस धरती से, धरती की हर शै से और ख़ुद से भी.
5- अमल, 
तुम्हारे किसी अमल से किसी को ज़ेहनी, जिस्मानी या फिर माली नुकसान न हो.
 बस.
***

Monday, November 26, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -8



 नया आईना 
लाखों, करोरों, अरबों बल्कि उस से भी कहीं ज़्यादः बरसों से इस ब्रह्मांड का रचना कार अल्लाह क्या चौदह सौ साल पहले सिर्फ़ तेईस साल चार महीने (मोहम्मद का पैग़मबरी काल) के लिए अरबी जुबान में बोला था? 
वह भी मुहम्मद से सीधे नहीं, किसी तथा कथित दूत के माध्यम से, 
वह भी बाआवाज़ बुलंद नहीं काना-फूसी कर के ? 
जनता कहती रही कि जिब्रील आते हैं तो सब को दिखाई क्यूँ नहीं पड़ते? 
जो कि उसकी उचित मांग थी 
और मोहम्मद बहाने बनाते रहे. 
क्या उसके बाद अल्लाह को साँप सूँघ गया कि स्वयम्भू अल्लाह के रसूल की मौत के बाद उसकी बोलती बंद हो गई और जिब्रील अलैहिस्सलाम मृत्यु लोक को सिधार गए ? 
उस महान रचना कार के सारे काम तो बदस्तूर चल रहे हैं, 
मगर झूठे अल्लाह और उसके स्वयम्भू रसूल के छल में आ जाने वाले 
लोगों के काम चौदह सौ सालों से रुके हुए हैं, 
मुसलमान वहीं है जहाँ सदियों पहले था, 
उसके हम रक़ाब यहूदी, ईसाई और दीगर क़ौमें आज मुसलमानों को 
सदियों पीछे अतीत के अंधेरों में छोड़ कर प्रकाश मय संसार में बढ़ गए हैं. 
हम मोहम्मद की गढ़ी हुई जन्नत के फ़रेब में ही नमाज़ों के लिए 
वज़ू, रुकू और सजदे में विपत्ति ग्रस्त है. 
मुहम्मदी अल्लाह उन के बाद क्यूँ किसी से वार्तालाप नहीं कर रहा है? 
जो वार्ता उसके नाम से की गई है उस में कितना दम है? 
ये सवाल तो आगे आएगा जिसका वाजिब जवाब देना होगा....
क़ुरआन का पोस्ट मार्टम खुली आँख से देखें 
"हर्फ़ ए ग़लत" का सिलसिला जारी हो गया है. 
आप जागें, मुस्लिम से मोमिन हो जाएँ और ईमान की बात करें. 
अगर ज़मीर रखते हैं तो सदाक़त ज़रूर समझेंगे और 
अगर इसलाम की कूढ़ मग्ज़ी ही ज़ेह्न में समाई है तो जाने दीजिए 
अपनी नस्लों को तालिबानी जहन्नम में.
***

Sunday, November 25, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -7


 दो+दो=चार. न तीन, न पांच
मुसलमानो !
मक्र कभी हक़ीक़त का सामना नहीं कर सकता, 
मुहम्मद आलमे-इंसानियत में बद तरीन मुजरिम हैं.
नादानों ! अपने आप को और अपनी औलादों को आने वाले वक़्त से बचाओ. अभी सवेरा है, वरना अपनी नस्लों को मुहम्मद के किए धरे की सज़ा भुगतने के लिए तैयार रख्खो. 
तुमको छूट है कि मोमिन बन के अपने बुज़ुर्गों की भूल की तलाफ़ी करो.
ईमान दार मोमिन ही क़ुरआन की सही तर्जुमानी कर सकता है, 
ये ज़मीर फ़रोश ओलिमा सच बोलने की हिम्मत भी नहीं कर सकते. 
क़ुरआन में फ़र्ज़ी वाक़िये और नामुकम्मल ग़ुफ़्तगू में आलिम ने क्या क्या न आरिफ़ाना (आध्यात्मिक) मिर्च मसालों की छ्योंक बघारी हैं कि 
पढ़ कर दिल मसोसता है. 
तुम जागो, जग कर मोमिन हो जाओ, 
मोमिन का ईमान ही इंसान का मुकम्मल मज़हब है, 
जिसका कोई झूठा पैग़म्बर नहीं, 
कोई चल-घात की बातें नहीं, सीधा सादा एलान कि 2+2=4 होता है, 
न तीन और न पाँच. 
फूल में ख़ुशबू होती है, इसे किसने पैदा किया? 
उसकी तलाश में मत जाओ कि तुम्हारी तलाश की राह में 
कोई मुहम्मद बना हुवा पैग़म्बर बैठा होगा. 
बहुत से सवाल, जवाब नहीं रखते, 
कि वक़्त कब शुरू हुआ था? कब ख़त्म होगा? 
सम्तें (दिशाएँ) कहाँ से शुरू होती हैं, कहाँ ख़त्म होंगी? 
इन सवालों को ज़मीन की दीगर मख़लूक़ की तरह सोचो ही नहीं. 
फ़ितरत की इस दुन्या में चार दिन के लिए आए हो, 
फ़ितरी ज़िन्दगी जी लो.

तुम्हें सुलाए हुए हैं. 
जागो, आँखें खोलो. 
इक्कसवीं सदी की सुब्ह हुए देर हुई, 
देखो कि ज़माना चाँद सितारों पर सीढियां लगा रहा है. 
कल जब यह ज़मीन सूरज के गोद में चली जाएगी तो बाक़ी लोग अपनी अपनी नस्लों को लेकर उस सय्यारे पर बस जाएँगे और तुम्हारी नस्लें कहीं की न होंगी. 
तुम समझते हो कि तुम हक़ बजानिब हो? 
तो तुम बहके हुए हो. तुमको बहकाए हुए हैं, इस्लामी ओलिमा, 
जिनका कि ज़रीआ मुआश ही इस्लाम है. 
इनका पूरा माफ़िया लामबंद है. 
इनकी पकड़ सीधे सादे मुसलमानों को अपनी मुट्ठी में दबोचे हुए है. 
ज़रा सर उठा कर तो देखो, इनके एजेंट तुम को फ़तवा देना शुरू कर देंगे, 
समाज में इनके इस्लामी गुंडे तुम्हारे बग़ल में ही बैठे होंगे, 
तुम को अलावा समझाने बुझाने के ये और कोई राय नहीं देंगे.
हर एक का मुआमला पेट से जुड़ा हुवा है यह तो तुम मानते हो ? 
वह भी मजबूर हैं कि उनकी रोज़ी रोटी है, 
गोरकुन की तरह. कोई मुक़र्रिर बना हुवा है, कोई मुफ़क्किर, 
कोई प्रेस चला कर, इस्लामी किताबों की इशाअत और तबाअत कर रहा है. जो उसकी रोज़ी है, 
कोई नमाज़ पढ़ाने के काम पर, तो कोई अज़ान देने का मुलाज़िम है, 
मीडिया वाले भी ओलिमा को बुला कर तुम्हें आकर्षित करते हैं 
ताकि चैनल के शाख़ उरूजपे.
यह सब मिल कर तुम्हें सुलाए हुए हैं. 
कोई जगाने वाला नहीं हैं. 
तुम ख़ुद आँखें खोलनी होगी.
***

Saturday, November 24, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -6


सीध सड़क            
मैं क़ुरआन को एक साज़िशी और अनपढ़ दीवाने  की पोथी मानता हूँ 
और मुसलामानों को इस पोथी का दीवाना.
एक ग़ुमराह इंसान चार क़दम भी नहीं चल सकता कि राह बदल देगा, 
ये सोच कर कि शायद वह ग़लत राह पर ग़ुम हो रहा है. 
इसी कशमकश में वह तमाम उम्र ग़ुमराही में चला करता है. 
मुसलमानों की ज़ेह्नी कैफ़ियत कुछ इसी तरह की है, 
कभी वह अपने दिल की बात मानता है, 
कभी मुहम्मदी अल्लाह की बतलाई हुई राह को दुरुस्त पाता है. 
इनकी इसी चाल ने इन्हें दर्जनों तबक़े में बाँट दिया है. 
अल्लाह की बतलाई हुई राह में ही रह कर वह अपने आपको तलाश करता है, 
कभी वह उसी पर अटल हो जाता है. 
जब वह बग़ावत कर के अपने नज़रिए का एलान करता है 
तो इस्लाम में एक नया मसलक पैदा होता है.
यह अपनी मक़बूलियत की दर पे तशैया (शियों का मसलक) से लेकर अहमदिए (मिर्ज़ा ग़ुलाम मुहम्मद क़ादियानी) तक होते हुए चले आए हैं. 
नए मसलक में आकर वह समझने लगते है कि 
हम मंजिल ए जदीद पर आ पहुंचे है, 
मगर दर अस्ल वह अस्वाभाविक अल्लाह के फंदे में फंस कर 
नए सिरे से अपनी नस्लों को एक नया इस्लामी क़ैद खाना और भी देते है.
कोई बड़ा इंक़लाब ही इस क़ौम को राह ए रास्त पर ला सकता है 
जिसमे कॉफ़ी ख़ून ख़राबे की संभावनाएं निहित है. 
भारत में मुसलामानों का उद्धार होते नहीं दिखता है 
क्यूंकि इस्लाम के देव को अब्दी नींद सुलाने के लिए 
हिंदुत्व के महादेव को अब्दी नींद सुलाना होगा. 
यह दोनों देव और महा देव, सिक्के के दो पहलू हैं.
मुसलामानों ! 
इस दुन्या में एक नए मसलक का आग़ाज़ हो चुका है, 
वह है तर्क ए मज़हब और सजदा ए इंसानियत. 
इंसानों से ऊँचे उठ सको तो मोमिन की राह को पकड़ो 
जो कि सीध सड़क है. 
***

Friday, November 23, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 5



 नामी गिरामी 

गहरवार ठाकुर वंसज के एक पुरुष हुए जिनका काल्पनिक नाम - - -
नामी गिरामी रख कर मैं उनका संक्षेप में इतिहास बतलाता हूँ - - - 
नामी गिरामी रात को सोए तो सुबह उठ कर परिवार और समाज के लोगों को इकठ्ठा किया और एलान किया कि - - -
मैंने रात को नींद के आलम में अपनी यवनि (मुसलमान) उप पत्नी का झूटा पानी पी लिया है, इसलिए अब मैं हिन्दू धर्म में रहने योग्य नहीं रहा .
 मैं कालिमा पढ़ के मुसलमान हो रहा हूँ. 
और वह पल भर में मुसलमान हो गए .
नामी गिरामी के निर्णय को सुनकर महफ़िल अवाक रह गई 
और माहौल में मौत का सा सन्नाटा छा गया .
पंडितों और प्रोहितों ने उन्हें हज़ार समझाया और प्रयास किया कि वेद मन्त्रों के अनुष्ठान में इसका निदान है, मगर नामी गिरामी इसके लिए राज़ी न हुए, तो न हुए .
नामी गिरामी के निर्णय से परिवार पर विपत्ति ही आ गई, 
दो छोटे भाइयों ने घर बार छोड़ कर दूर देश बसाया, 
दो हिन्दू पत्नियों में से एक ने वैराग ले लिया और 
दूसरी ने नामी गिरामी का साथ दिया . 
नामी गिरामी शेरशाह सूरी के गहरे प्रभाव में थे, 
उसके पतन के साथ साथ नामी गिरामी पर भी ज़वाल आया, 
उन्हें अपना राज्य छोड़ कर दर बदर होना पड़ा.
मैं जुनैद मुंकिर उन्हीं नामी गिरामी कि चौदहवीं संतान हूँ. 
मेरे भीतर उन्ही पूर्वजों का हिदू ख़ून प्रवाह कर रहा है . 
मुसलमान गहरवारों का अपने हिदू गहरवारों से हमेशा संपर्क रहा है . 
मुझे अपने एक बुज़ुर्ग की चिट्ठी आई कि - - - 
आपके लिए हमेशा द्वार खुले हैं, चाहें तो घर वापसी कर लें, स्वागत है.
मै ने उनको जवाब दिया कि 
आप अनजाने में वही ग़लती मुझ से करवाना चाहते है 
जो मेरे पूर्वज नामी गिरामी ने किया था. 
उनकी मजबूरी थी कि उस समय इस्लाम के अलावा 
उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था 
मगर 400 सालों बाद मेरे पास विकल्प है, 
मैं मुसलमान से हट कर मानव-मात्र हो गया हूँ. 
अब मानव धर्म ही मेरा धर्म है .

 इस दास्तान को बयान करने की वजह यह है कि मेरा ज़मीर चाहता है 
कि मैं अपने हिन्दू भाइयों को भी स्वाभाविक सच्चाइयों से आगाह करूँ, 
उनकी ख़ामियां और ख़ूबिया उनके सामने रखूं , 
ख़्वाह परिणाम कुछ भी हो . 
सत्य कभी हिदू या मुसलमान नहीं होता. 
***

Thursday, November 22, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 4


मैं जुनैद 'मुंकिर'  

हर बात के दो पहलू होते हैं, 
पहला ये कि इसे मान लिया जाए, यानी इक़रार. 
दूसरा ये कि उसको न माना जाए यानी इंकार. 
बातें चाहे मशविरा हों, हुक्म हो या फिर ईश वाणी जिसे वह्यि का नाम दे दिया जाता है. 
इक़रार करने की आदत या ख़सलत आम लोगों में होती है 
मगर इंकार की हिम्मत कम ही लोगों में होती है. 
इसी रिआयत से मैंने अपना तख़ल्लुस (उपनाम) मुंकिर रखा है .
सदियों से इंसान मज़हबी चक्की में पिसता चला आ रहा है. 
इसके गिर्द इंकार की कोई गुंजाईश नहीं है. 
घुट घुट कर फ़र्द मज़हबी झूटों का शिकार रहा है. 
मज़हब की ज़्यादः तर बातें मा फ़ौक़ुल फ़ितरत (अलौकिक) होती हैं 
जिनको डरा धमका कर या फुसला कर अय्यार धर्म ग़ुरु आम इंसान से मनवा लेते हैं. 
झूट को तस्लीम करके झूटी ज़िन्दगी जीना इंसान की क़िस्मत बन जाती है .
हमारी मशरिक़ी दुन्या बनिस्बत मग़रिब के कुछ ज़्यादः ही झूट जीना पसंद करती है, जिसके नतीजे में यह हमेशा कमज़ोर और मग़रिब की ग़ुलाम रही है . 
वक़्त आ गया है कि हम इन झूठे मज़हबी पाखण्ड के मुंकिर हो जाएँ .
*** 

Wednesday, November 21, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -3


मैं जुनैद 'मुंकिर'  

हर बात के दो पहलू होते हैं, 
पहला ये कि इसे मान लिया जाए, यानी इक़रार. 
दूसरा ये कि उसको न माना जाए यानी इंकार. 
बातें चाहे मशविरा हों, हुक्म हो या फिर ईश वाणी जिसे वह्यि का नाम दे दिया जाता है. 
इक़रार करने की आदत या ख़सलत आम लोगों में होती है 
मगर इंकार की हिम्मत कम ही लोगों में होती है. 
इसी रिआयत से मैंने अपना तख़ल्लुस (उपनाम) मुंकिर रखा है .
सदियों से इंसान मज़हबी चक्की में पिसता चला आ रहा है. 
इसके गिर्द इंकार की कोई गुंजाईश नहीं है. 
घुट घुट कर फ़र्द मज़हबी झूटों का शिकार रहा है. 
मज़हब की ज़्यादः तर बातें मा फ़ौक़ुल फ़ितरत (अलौकिक) होती हैं 
जिनको डरा धमका कर या फुसला कर अय्यार धर्म ग़ुरु आम इंसान से मनवा लेते हैं. 
झूट को तस्लीम करके झूटी ज़िन्दगी जीना इंसान की क़िस्मत बन जाती है .
हमारी मशरिक़ी दुन्या बनिस्बत मग़रिब के कुछ ज़्यादः ही झूट जीना पसंद करती है, जिसके नतीजे में यह हमेशा कमज़ोर और मग़रिब की ग़ुलाम रही है . 
वक़्त आ गया है कि हम इन झूठे मज़हबी पाखण्ड के मुंकिर हो जाएँ .
***

Tuesday, November 20, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -2


मेरा इख़्तिसार (संक्षिप्त) 

ख़ुश हाल किसान का पोता और बदहाल मज़दूर का बेटा , 
मैं एक साधारण परिवार से हूँ .  
दस साल की उम्र तक स्कूल का मुंह नहीं देखा था, 
मामा ने मोहल्ले में जूनियर हाई स्कूल खोला , 
पांचवीं पास बच्चे उन्हें कक्षा 6 के लिए मिल गए , 
बाहर  बरांडे में मोहल्ले के अनपढ़ और लाख़ैरे बच्चे बैठने लगे, 
उनमें से एक भी था. 
पढ़ाई की ललक दिल में थी मामा ने मुझे समझा और 
कक्षा ६ में मुझे बैठने की इजाज़त दे दी .  
मुझे तालीम का सिरा मिल गया था, 
मैं दर्जा नौ में आते आते क्लास टॉप कर गया. 
और पांच साल में ही हाई स्कूल कर लिया . 
बदहाली ने आगे पढ़ने न दिया, 
पांच साल ग़ुरबत से लड़ने की नाकाम कोशिश की , 
उसके बाद तरक़्क़ी का सिरा मेरे हाथ लगा , 
पुवर फंड लेकर पढ़ने वाले तालिब इल्म ने लाखों रुपए इनकम टैक्स भरे .  
बड़ी ईमानदारी की रोज़ी कमाई . 
साठ साल की उम्र आते आते अपनी माली तरक़्क़ी से भी मेरा मन भर गया . 
मैं सोलह साल की नाबालिग़ उम्र तक मज़हबी रहा, 
उसके बाद मज़हब को मैंने अपनी आँखों से देखना शुरू किया , 
मैं ने पाया कि धर्म व् मज़हब में जितना झूट और फ़रेब है, उतना और कहीं नहीं . 
कारोबार से फ़ारिग़ होने के बाद मैंने अपना समय सच्चाई को पाने के 
लिए वक़्फ़ कर दिया,
सालों साल से दिल में जमा उदगार फटने लगा . 
मैं बीस साल से अपनी तहरीर से इंसानी ज़ेहन खोल रहा हूँ ,
जिसमें शेर व् शायरी भी एक माध्यम है . 
***

Monday, November 19, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 1


प्रिय पाठको ! 
मेरी तहरीर 'फेस बुक' पर 1,30,000 Likes पा चुकी है. 
अब मैं 'ब्लॉग' की दुन्या में क़दम रख रहा हूँ. 
यह मेरा तीसरा बाब होगा, 
दो बाब 'हर्फ़-ग़लत' और 'जुंबिशें' पहले से ही 'ब्लॉग' की दुन्या में सर गर्म हैं. 
मेरी कोशिश होगी की आपको कुछ दे सकूँ.
जुनैद 'मुंकिर' 

1 - हिन्दुर

मैंने जब लिखना शुरू किया तो उर्दू में हिंदी के शब्द लाना अजीब सा लगता, जैसे बिरयानी में दाल मिला कर खा रहे हों. 
इसी तरह हिंदी लिखने में उर्दू अल्फ़ाज़ खटकते. 
उचित तो ये है कि जो लफ़्ज़ माक़ूलियत को लेकर ज़ेहन में आएँ, 
उसे लिख मारें. 
धीरे धीरे माक़ूलियत का दिल पर ग़लबा होता गया और अब मुनासिब शब्दों को चुनने में कोई क़बाहत नहीं होती. 
अकसर मेरे हिंदी पाठक उलझ जाते हैं, मैं उनको सुलझाए रहता हूँ. 
अपने दिल की बात मैं जिस ज़बान में अदा करता हूँ, उस भाषा को मैंने नाम दिया है,
"हिन्दुर"   (हिंदी+उर्दू)
धीरे धीरे पाठक मेरी "हिन्दुर" को समजने लगेंगे, 
इसमें उनका भी फ़ायदा है कि वह दोनों ज़बानों के वाक़िफ़ कार हो जाएँगे.   
जहाँ तक भाषाओं की बात की जाए तो, उर्दू में अपनी एक चाशनी है, 
बहुत मुकम्मल और सुसज्जित ज़बान है. 
जब कि हिंदी आज भी अधूरी भाषा है, 
जिसकी बुन्याद ही ऐसी पड़ी है कि सुधार मुमकिन नहीं. 
उर्दू में नफ़ासत और बाँकपन है, 
हिंदी में ज़बान की रवानी (Flow) नहीं, भद्दा पन अलग से, 
उच्चारण ही मुहाल है. 
मिसाल के तौर पर अभी अभी अवतरित होने वाला शब्द "सहिष्णुता".
इसे उर्दू में रवादारी (Ravadari)  कहते हैं जोकि कितना आसान है.
उर्दू कानों में तरन्नुम घोलती है, 
हिंदी कान में कभी कभी तो कंकड़ जैसी लगती है. 
उर्दू में अरबी, फ़ारसी, तुर्की, हिंदी अंग्रेज़ी और यूरेशियाई आदि कई ज़बानों के शब्द हैं. जिन से वह मालामाल है. 
सब ज़बानों की विरासत है उर्दू. 
नशेमन पर मेरे बार ए करम सारी ज़मीं का है,
कोई तिनका कहीं का है , कोई तिनका कहीं का है .
अपने संगीत मय शब्दावली और उन सब के ग्रामर का असर है उर्दू पर, 
जिससे हिंदी महरूम है. 
उर्दू ने संस्कृत के शब्द भी लिए हैं मगर उनका उर्दू करण करते हुए. ण च छ ठ ढ भ जैसे कई अक्षर उर्दू में नहीं, 
फ़ारसी ने इन में से कुछ अक्षर को लिया ज़रूर है मगर इनसे बने हुए अकसर शब्द सभ्य समाज के लिए नकार्मक अर्थ रखते हैं. 
हिदुस्तान में प्रचलित सारी गालियाँ फ़ारसी भाषा की देन हैं.
उर्दू ने हिंदी और अंग्रेज़ी के शब्दों को लिया मगर इनमें करख्त कठोर अक्षर को बदल कर, जैसे यमुना =जमना, रामायण =रामायन, करके.
ऐसे ही Madam को मादाम करके. 
मुझे दोनों भाषाएँ अज़ीज़ हैं अपनी दोनों आँखों की तरह.
***