Friday, February 22, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -81

 जन्नत की हूरें 
अरबिस्तान (मिडिल ईस्ट) और तुर्किस्तान (मध्य एशिया) के बाशिंदे कुछ ज़्यादा ही  सेक्सी हुवा करते हैं. इस में अय्याशी कम, संतान उत्पत्ति का जज़्बा ज़्यादः कारगर होता है, क्योंकि बच्चे ही उनकी असली संपति होती है. 
उनकी औरतें बच्चा पैदा करने की मशीन होने में समाज का गौरव हुवा करती हैं. हमारे उप महाद्वीप ख़ास कर भारत के लोग सेक्स से ज़्यादः, 
आध्यात्मिक हुवा करते हैं. वह सेक्स से दूर भागते हैं. 
सेक्स को समाधि मानते हैं. 
वह इससे बचने के लिए योगी और सन्यासी बन जाते हैं, 
यहाँ तक कि साधु साध्वी और ब्रह्मचारी भी. 
बाल ब्रहमचर्य तो यहाँ महिमा मंडित हुवा करते हैं, 
गोया महात्मा ने कभी सेक्स-पाप नहीं किया.
बड़ा शांत स्वभाव होता है इनका. एक सामान्य मर्द याऔरत, 
इन्हें नपुंसक भी कह सकते है.  
अरबिस्तान और तुर्किस्तान के बाशिदों का मिज़ाज इसके उल्टा होता है. 
वहां ब्रहमचर्य का तसव्वुर भी नहीं होता. 
बहु विवाह और अनेक बच्चे वाले ही वहां का सम्मान है.
इस्लाम तो ब्रहमचर्य को हराम समझता है. 
न संभोग तो घर बार की ज़िम्मेदारी ही सही,
एक बेबसऔरत या बेवा का सहारा ही सही.
वहां मुस्लिम में माँ, बहिन, बेटियों के लिए कोई आश्रम नहीं होता.
न ही बनारस और विन्द्रा वन जैसे पंडों का बनाया गया क़ैद ख़ाना 
जिस में वह अय्याशी  भी करते हैं और देह व्योपार भी. 
हिन्दू भगवन से मोक्ष की प्रार्थना करता है.
इसके बर अक्स  
इस सेक्सी समाज के लिए अल्लाह कहता है 
तुम अपनी समाजी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभावगे 
तो तुमको मरने के बाद भी sex के लिए हूरों के झुण्ड देंगे. 
इनका अल्लाह झूटा हो या बे ईमान, 
औरतों की हिफ़ाज़त करने में सफल है. 
***

Tuesday, February 19, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -80


 क़ानूने-फ़ितरत 
तब्दीलियाँ क़ानूने-फ़ितरत हैं जो वक़्त के हिसाब से ख़ुद बख़ुद आती रहती हैं. मुहम्मद ने अपना दीन थोपने के लिए ''तबदीली बराए तबदीली'' की है 
जो कठ मुल्लाई पर आधारित थी. 
ख़ास कर औरतें इस में हादसाती लुक़्मा हुईं. 
क़ब्ले-इस्लाम औरतों को यहाँ तक आज़ादी थी,
कि शादी के बाद भी कि अगर संतान से वंचित हैं तो  
वह समाज के लायक़ ओ फ़ायक़ फ़र्द से, 
अपने शौहर की रज़ामंदी के बाद, मासिक धर्म से फ़ारिग होकर, 
उसकी ''शर्म गाह'' की तलब कर सकती थीं 
और तब तक के लिए जब तक कि वह हामला न हो जाएँ .
 ये रस्म अरब में अलल एलान थी और क़ाबिले-सताइश थी, 
जैसा कि भारत में नियोग की प्रथा हुवा करती थी. 
मुहम्मद ने अनमोल कल्चर का गला गोंट दिया, 
मुसलमानों को सिर्फ़ यही याद रहने दिया गया कि 
सललललाहो अलैहेवसल्लम ने बेटियों को जिंदा दफ़नाने को रोका.
***

Monday, February 18, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -79


 मुसलमान ख़ुद पर जदीद इलाज हराम करें 

मैं एक मुस्लिम का बेटा हूँ और स्वाभाविक रूप में एक मुस्लिम कालोनी में अपनी ज़िम्मेदारी उठाते हुए रहता हूँ. कालोनी में एक मस्जिद है, 
बनते वक़्त जिसका मैंने विरोध किया था कि कालोनी मंदिर व् मस्जिद से पाक हो. 
इसके लिए बिल्डर ने हमसे भी दस हज़ार रुपए का अतिया लेकर फ्लैट दिया था. 
मैंने उसे समझाया अतिया जबरन नहीं ली जाती, मगर वह राज़ी नहीं हुवा. 
मेरे अपने परिवार की मज़बूरी थी. 
मै नमाज़ रोज़ा नहीं करता न ही मुहम्मदी अल्लाह को तस्लीम करता हूँ. 
मस्जिद का मेंटेननेस देने से इंकार कर दिया जिसे कट्टर लोगों ने 
मुझ पर लागू कर दिया. 
बक़रीद की क़ुरबानी नहीं कराता, यह बात अलग है कि 
मैंने कालोनी के पार्क में दो संग मरमर की बेन्चें लगवा दीं. 
सुसाइटी की ज़िम्मेदारियाँ हमारी फ़ेमिली संभालती रही. 
अख़लाक़ी तौर पर हमारी फ़ेमली समाज के ज़िम्मेदार तरीन लोग हैं. 
पिछले दिनों मैंने इरादा किया कि मरने के बाद मैं अपना शरीर मेडिकल कालेज को दान कर दूं, मेरी फ़ेमिली इसके लिए ख़ुशी के साथ राज़ी हो गई, 
स्टाम्प पेपर भरा गया, पत्नि, बेटियों और बेटों ने रज़ामंदी के दस्तख़त किए, 
अब ज़रुरत हुई कि दो मुकामी लोग मुझे इंट्रोड्यूस करें, 
मैंने कालोनी के ही दो लोगों को पकड़ा जो मेरी तरह ही बूढ़े थे और जिनसे मेरी बनती भी थी. उन्होंने मेरे काम की तो सराहना की मगर इंट्रोडकशन देने से इंकार कर दिया कि यह बात इस्लाम के ख़िलाफ़ है. 
उनकी सोच यह कि इस काम से वह ग़ुनहगार होंगे और अल्लाह उनको पकड़ेगा.
ग़ुनाह का पसे मंज़र बतला दूं - - - 
कि मरने के बाद मुन्किर नक़ीर (यम राज) मुझे क़ब्र में नहीं पाएँगे तो हिसाब किताब किस से करेंगे. 
मैंने मेडिकल कालेज में अपने मुर्दे को दान करके अल्लाह और मौत के फ़रिश्ते को ग़ुमराह किया है. वह अल्लाह को जवाब क्या देगा और अल्लाह मुझ ग़ुनहगार को सज़ा कैसे दे पाएगा ?
सर्व शक्तिमान अल्लाह इतना कमज़ोर कि मुझे क़ब्र के बाहर तलाश नहीं कर सकता. सर्व शक्तिमान अल्लाह आख़िर मुझे ऐसी सोच ही क्यों दी जो वह अपने बन्दों से नहीं चाहता ??
सर्व शक्तिमान अल्लाह मेडिकल साइंस के अंदर इंसानों कि भलाई में लिए तह दर तह राज़ पोशीदा किए हुए है और दूसरी तरफ़ मज़हब हमें अपने नाकारा और मुर्दा जिस्म को डाक्टरों कि तालीम के लिए देने से मना कर रहा है ?
इन विरोधा भाषों के चौराहे पर मुसलमानो का कारवाँ सदियों से अटका हुवा है.  
मुसलमानो को राहे-रास्त तब ही मिल सकती है कि इनको तमाम नई ईजादों की बरकतों से महरूम कर दिया जाए.  
यही इनका इलाज है.  
***

Sunday, February 17, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -78


 ख़ुदाओं की आमद 
तख़लीक़ ए कायनात का ज़िक्र जब आता है, 
जो सिर्फ़ साढ़े छः हज़ार साल पहले दुन्या के वजूद में आने की बात करता है. 
तो वाक़ेया नाटा ठिंगना और हास्य स्पद लगने लगता है. 
लाखो वर्ष पहले के इंसानी और हैवानी कंकाल मिलते है, 
साढ़े छह हज़ार पहले पैदा होने वाला पहला आदमी आदम कहाँ ठहरता है ? 
यह सूरतें कोरी कल्पनाएँ हैं जहाँ पर अक़्ल ए इंसानी जाकर अटक जाती है.  
इनको कंडम किए बिना वह आगे नहीं बढ़ सकती. 
 बचती है डरबन की थ्योरी जो बतलाती है कि इंसान का वजूद भी दूसरे जीवों की तरह पानी से ही हुवा, यह ख़याल अभी तक का सत्य मालूम पड़ता है, 
बाक़ी पूर्ण सत्य आने वाले भविष्य में छुपा हुवा है. 
आप अपने सर मुबारक को खुजलाएं कि 
आप अपने ज़ेहनों में इन अक़्ली गद्दा रूहानियत फ़रोशों 
की दूकानों से ख़रीदा हुवा सौदा सजाए हुए हैं ?
या बेदारी की तरफ़ आने के लिए तैयार हैं ?
इन के मुरत्तब किए हुए ख़ुदाओं में से जो किसी एक को नहीं मानता, 
यह उसे कहते हैं जानवर हैं.  
अब रावी आपको फिर डर्बिन की तरफ़ ले जाता है, इसकी तलाश में आपको आंशिक रूप में कुछ न कुछ सच्चाई नज़र आएगी. हो सकता है इंसान की शाख़ जीव जंतु से कुछ अलग हो मगर इंसान हैवानी हालात से दो चार होते हुए ही यहाँ तक पहुंचा है. पाषाण युग तक इंसान यक़ीनी तौर पर हैवानो का हम सफ़र रहा है, 
इसके बावजूद तब तक आदमी सिर्फ़ आदमी ही था. 
उस वक़्त तक इंसानी ज़ेहन में किसी अल्लाह का तसव्वर क्यों नहीं आया ? 
उस वक़्त किसी ख़ुदा के खौ़फ़ से नहीं बल्कि वजूद के  
बक़ा पर तवज्जो हुवा करती थी. 
यह ख़ुदा फ़रोश इंसान के लिए ख़ुदा को इतना ही फ़ितरी और लाज़िम मानते हैं तो उस वक़्त ख़ुद ख़ुदा ने अपनी ज़ात को क्यों नहीं मनवा लिया.  
जैसा कि मैंने अर्ज़ किया कि अहद ए संग के क़ब्ल आदमी हैवानों का हम सफ़र था, इसके बाद इसको पहाड़ियों, खोहों, दरख़्तों और ज़मीनी पैदावारों ने कुछ राहत पहुंचाई. प्रकृतिक हलचल से भी कुछ नजात मिली, इंसान इंसानी क़बीलों में रहने लगा जिसकी वजह से इसमें कुछ हिम्मत और ताक़त आई. इसके बावजूद इसे जान तोड़ मेहनत और अपनी सुरक्षा से छुटकारा नहीं मिला. वह इतना थक कर चूर हो जाता कि उसे और कुछ सोचने का मौक़ा ही न मिलता. उस वक़्त तक किसी ख़ुदा का विचार इसके दिल में नहीं आया. 
वह रचना कालिक सीढ़ियाँ चढ़ता गया, चहार दीवारियाँ इंसान को सुरक्षित करती गईं, ज़मीनी फ़सलें तरतीब पाने लगीं, जंगली जानवर मवेशी बनकर क़ाबू में आने लगे. राहत की सासें जब उसे मयस्सर हुईं तो ज़ेहनों को कुछ सोचने का मौक़ा मिला. 
इंसानी क़बीलों के कुछ अय्यारों ने इस को भापा और ख़ुदाओं का रूहानी जाल बिछाना शुरू किया. इस कोशिश में वह बहुत कामयाब हुए. होशियार ओझों के यह फार्मूले ज़ेहनी ख़ूराक के साथ साथ मनोरंजन के साधन भी साबित हुए. 
इस तरह लोगों के मस्तिष्क में ख़ुदा का बनावटी वजूद दाखिल हुवा जोकि रस्म ओ रिवाज बनता हुवा वज्द और जुनून की कैफ़ियत अख़्तियार कर गया.  
दुन्या भर की ज़मीनों पर ख़ुदा अंकुरित हुवा, 
कहीं देव और देवियाँ उपजीं, कहीं पैग़मबर और अवतार हुए, तो कहीं निरंकार. 
इंसान ज़हीन होता गया, नफ़ा और नुक़सान विकसित हुए, 
फ़ायदे मंद चीज़ों को पूजने की तमीज़ आई, 
जिससे डरा उसे भी पूजना प्रारम्भ कर दिया. 
छोटे और बड़े ख़ुदा बनते गए या यूं कहे कि 
आने वाली महा शक्ति के कल पुर्ज़े ढलना शुरू हुए, 
जो बड़ी ताक़त बनी, 
उसका ख़ुदा तस्लीम होता गया. 
*** 

Friday, February 15, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -76


 ज़िंदगी जीने की चीज़ है   

मुहम्मद की सोहबत में मुसलमान होकर रहने से बेहतर था कि 
इंसान आलम-ए-कुफ्र में रहता. 
मुहम्मद हर मुसलमान के पीछे पड़े रहते थे, 
न ख़ुद कभी इत्मीनान से बैठे और न अपनी उम्मत को चैन से बैठने दिया. 
इनके चमचे हर वक़्त इनके इशारे पर तलवार खींचे खड़े रहते थे 
" या रसूल्लिल्लाह ! हुक्म हो तो गर्दन उड़ा दूं"
आज भी मुसलमानों को अपनी आक़बत पर ख़ुद एतमादी नहीं है. 
वह हमेशा ख़ुद को अल्लाह का मुजरिम और ग़ुनाहगार ही माने रहता है. 
उसे अपने नेक आमाल पर कम और अल्लाह के करम पर ज्यादह भरोसा रहता है. 
मुहम्मद की दहकाई हुई क़यामत की आग ने मुसलमानो की शख़्सियत कुशी कर राखी है. 
क़ुदरत की बख़्शी  हुई तरंग को मुसलमानों से इस्लाम ने छीन लिया है.
सजदे में जाकर मेरी बातों पर ग़ौर करो, 
अगर तुम्हारी आँख खुले तो, 
सजदे से सर उठाकर अपनी नमाज़ की नियत को तोड़ दो 
और ज़िदगी की रानाइयों पर भी एक नज़र डालो. 
ज़िंदगी जीने की चीज़ है, 
इसे मुहम्मदी जंजीरों से आज़ाद करो.  
***

Thursday, February 14, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -75


अज़ीम इन्सान
समाज की बुराइयाँ, हाकिमों की ज्यादतियां और रस्म ओ रिवाज की ख़ामियाँ देख कर कोई साहिबे दिल और साहिबे जिगर उठ खड़ा होता है, वह अपनी जान को हथेली पर रख कर मैदान में उतरता है. वह कभी अपनी ज़िदगी में ही कामयाब हो जाता है, कभी वंचित रह जाता है और मरने के बाद अपने बुलंद मुक़ाम को छूता है,
ईसा की तरह.
मौत के बाद वह महात्मा, ग़ुरू और पैग़मबर बन जाता है.
इसका मुख़ालिफ़ समाज इसके मौत के बाद इसको ग़ुणांक में रुतबा देने लगता है,
इसकी पूजा होने लगती है,
अंततः इसके नाम का कोई धर्म, कोई मज़हब या कोई पन्थ बन जाता है.
धर्म के शरह और नियम बन जाते हैं,
फिर इसके नाम की दुकाने खुलने लगती हैं
और शुरू हो जाती है ब्यापारिक लूट.
अज़ीम इन्सान की अज़मत का मुक़द्दस खज़ाना,
बिल आख़ीर उसी घटिया समाज के लुटेरों के हाथ लग जाता है.
इस तरह से समाज पर एक और नए धर्म का लदान हो जाता है.
हमारी कमजोरी है कि हम अज़ीम इंसानों की पूजा करने लगते हैं,
जब कि ज़रुरत है कि हम अपनी ज़िंदगी उसके पद चिन्हों पर चल कर ग़ुजारें.
हम अपने बच्चों को दीन पढ़ाते हैं,
जब कि ज़रुरत है  उनको आला और जदीद तरीन अख़लाक़ी क़द्रें पढ़ाएँ.
मज़हबी तालीम की अंधी अक़ीदत,
जिहालत का दायरा हैं.
इसमें रहने वाले आपस में ग़ालिब ओ मगलूब और ज़ालिम ओ मज़लूम रहते हैं.
***

Tuesday, February 12, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -77


थोथी बहसें

आजकल हमारे टेलीविज़न चैनलों पर हिन्दू मुस्लिम की
"जुबानी जंगी बहसों"
का सिलसिला बहुत पसंद किया जाता है.
दोनों वर्ग के कागज़ी पहलवान इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है ,
ख़ास कर जब दोनों ओर के मुल्ला और पंडित इकठ्ठा होते है. 
यह दोनों नूरा कुश्ती किया करते है.
इसे जान साधारण आँख गड़ो कर देखते हैं और चैनलों की TRP
ऊंचाइयों पर चली जाती है.
दोनों तरफ़ के नेता और धर्म ग़ुरु कपट भरी बहसें करते हैं. 
इस्लाम की व्याख्या दोनों महानुभाव बहुत एहतियात के साथ करते हैं.
क़ुरआनी आयतें दोनों वर्गों के पास  प्रयक्ष रूप में होती हैं.
एक मिनट में वह क़ुरआनी आयतें पेश की जा सकती हैं
जिसमे मुहम्मदी अल्लाह खुलकर जिहाद का हुक्म देता है ,
बड़ी क्रूर तरीकों से मुसलमानो को जिहाद के लिए कहता है.
वह कहता है - - -
जिहाद तुम पर फ़र्ज़ कर दिया गया है और - - - 2=214
अल्लाह की राह में क़त्ताल  करो और  - - - 2=224-25
जिहाद में मरे हुए लोग मरे नहीं , वह ज़िंदा हैं और ख़ुश है - - - 3=70
 जिहादी सूरह - - - 4=75  , 77 ,
मैं  कुफ़्फ़ार के दिलों में रोब  डाल देता हूँ , सो तुम गर्दनों पर मारो, पूरा पूरा मारो  8=2
 जिहादी सूरह - - - 8 = 15-16-17
  जिहादी सूरह- - - 8=39-43 -64-67
घात लगा कर कफ़िरों के लिए बैठे रहो, उन्हें पकड़ो, बांधो और मारो सूरह तौबा 9=5
सूरह तौबा ऐसी सूरह है जिसे अल्लाह अपने नाम से शुरू नहीं करता बाक़ी सभी 113 सूरतें  बिस्मिल्लाह - - - से शुरू होती हैं. 
(इस सूरह में अल्लाह कफ़िरों के साथ अपने किए हुए समझौता को तोड़ता है ,  समजौता था
लकुम दीनकुम वले यदीन (यानि तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए और हमारा दीन हमारे लिए )
जिस को मौलाना अज्ञान जनता के सामने रख कर इस्लाम की मिसाल देते हैं,
वह यह नहीं बतलाते कि यह मुआहिदा सिर्फ़ चार महीन चला जिसे अल्लाह जैसी ज़ात ने इसे तोड़ा और नए फ़रमान जारी किए. और तौबा करता है.
 जिहादी सूरह- - - 9=5-16-29-31-39  -41,45, 47,53 ,74,86
जिहादी सूरह- - - 48 =15,16 ,20,23
जिहादी सूरह- - - 61 =10,11 - - 9=5-16-29-31-39 
इन क़ुरानी पैग़ाम को हर मुल्ला और पंडित जानते हैं
मगर इसका एलान नहीं कर सकते.
मुल्ला इस लिए इस पैग़ाम का ख़ुलासा नहीं करता कि
वह रंगे हाथोँ पकड़ा जायगा और ला जवाब हो जाएगा.
पंडित इस वजह से इन क़ुरानी पैग़ाम को इस्लाम के मुंह पर नहीं मारता
कि उसके अपने धर्म में इससे भी बड़े शैतानी पैग़ाम छिपे हुए हैं
और वह नर मुंड पहने हुए काली माँ, कैलंडर की तरह मंज़र ए आम पर नुमायां है.
दोनों धर्म एक दूसरे के पूरक हैं.
उर्दू कहानी कार मीर अम्मन एक कहानी  के किरदारों में एक ऐसे मंतर का इस्तेमाल करते हैं जो कि मरे हुए मुर्दे की आत्मा को,
किसी ज़िदा को मार कर उसमें डाल सकते हैं.
वह एक देव को मार कर उसकी आत्मा को एक तोते को मार कर
उसके मुर्दा शरीर में डाल देते हैं.
इस तरह देव की हक़ीक़त तोते में महफूज़ रहती है.
इस पसे मंज़र में पंडित जी तोते की गर्दन इस लिए नहीं मरोर सकते
कि तोते में उनके देव की आत्मा है, उसे मारने से ख़ुद उनका देव मर जाएगा.
इस तरह से मुल्ला और पंडित धर्म और मज़हब के विषैले जीव को मरने नहीं देते.
यह उनकी रोज़ी रोटी है.
इन बातों का हल यही है कि 
इंसान धर्मों से मुक्ति पाए.
 ***

Monday, February 11, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -74


अल्लाह हो असग़र  
             
नमाज़ ही शुरूआत अल्लाह हुअकबर से होती बह भी मुँह से बोलिए 
ताकि वह सुन सके? 
अल्लाह हुअकबर का लफ़्ज़ी मअनी है अल्लाह सबसे बड़ा है. 
तो सवाल उठता है कि अल्लाह होअसग़र कौन हैं? 
यानी छोटा अल्लाह ?
भगवान राम या कृष्ण कन्हैया, भगवन महावीर या महात्मा गौतम बुध? 
ईसाइयों का गाड, यहूदियों का याहू या ईरानी ज़र्थुर्ष्ट या ईरानियों का ख़ुदा? 
कोई अकेली लकीर को बड़ा या छोटा दर्जा नहीं दिया जा सकता 
जब तक की उसके साथ उससे फ़र्क़ वाली लकीर न खींची जाए. 
इसलिए इन नामों की हैसियत की निशान दही की गई है.
मुसलमानों को शायद ईसाई का गाड, यहूदियों का याहू और 
सवाल उठता है कि वह एक ही लकीर खींच कर अपनी डफ़ली बजाते है 
कि यही सबसे बड़ी लकीर है, अल्लाह हुअकबर . 
एक और बात जोकि मुसलमान शुऊरी तौर पर तस्लीम करता है कि 
शैतान मरदूद को उसके अल्लाह ने पावर दे रक्खा है कि 
वह दुन्या पर महदूद तौर पर ख़ुदाई कर सकता है. 
अल्लाह की तरह ही शैतान भी हर जगह मौजूद है, 
वह भी अल्लाह के बन्दों के दिलों पर हुकूमत कर सकता है, 
भले ही ग़ुमराह कंरने का. 
इस तरह शैतान को अल्लाह होअस्गर कहा जाए 
तो बात मुनासिब होगी मगर 
मुसलमान इस पर तीन बार लाहौल भेजेंगे. 
इस पहले सबक में मुसलामानों की ग़ुमराही बयान कर रहा हूँ, 
दूसरे दरजनों पहलू हैं जिन पर मुसलमान ला जवाब होगा.
***  

Sunday, February 10, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -73

 सिर्फ़ मोमिन 

मेरे भाइयो ! बहनों ! मेरे बुजुगो!! नौ जवानों!!!
मेरे मिशन को समझने की कोशिश करो. मैं आप में से ही एक बेदार फ़र्द हूँ जो आने वाले वक़्त की भनक पा चुका है कि अगर तुम न जगे तो पामाल हो जाओगे. 
मैं कहाँ तुमको ग़ुमराह कर रहा हूँ ?
तुम तो पहले से ही ग़ुमराह हो, 
मैं तो तुम से ज़रा सी तब्दीली की बात कह रह हूँ कि 
मुस्लिम से मोमिन बन जाओ, 
सब कुछ तुम्हारा जहाँ का तहाँ रहेगा, 
बस बदल जाएगा सोचने का ढंग. 
जब तुम मोमिन हो जाओगे तो तुम्हारे पीछे तुम्हारी तक़लीद में होंगे ग़ैर मुस्लिम भी. 
और इस तरह एक पाकीज़ा क़ौम वजूद में आएगी, 
जिसको ज़माना सर उठा कर देखेगा कि यह मोमिन है, 
पार दर्शी है, अनोखा है.
सिकंदर दुन्या को फ़तह करते करते फ़ना हो गया, 
हिटलर ग़ालिब होते होते मग़लूब हो गया, 
इस्लाम अब इसी मुक़ाम पर आ पहुंचा है, 
अल्लाह के नाम पर मुहम्मद ने इंसानियत को बहुत नुक़सान पहुँचाया है, 
उसका ख़ामयाज़ा आज एक बड़ा मानव समाज और पूरी दुन्या में भुगत रहा है, 
जो तुम्हारी आँखों के सामने है. 
यह ग़ुनह गार ओलिमा और उनके एजेंट ग़लत प्रोपेगंडा करते हैं 
कि इस्लाम योरोप और अमरीका में मक़बूल हो रहा है, 
यह इनकी रोटी रोज़ी का मामला है जिसके वह वफ़ा दार हैं 
मगर तुम्हारे लिए वह ग़द्दार हैं.
भूल कर मज़हब बदल कर हिन्दू, ईसाई या बहाई मत बन जाना, 
यह चूहेदानों की अदला बदली है. 
मज़हबी कट्टरता ही चूहे दान होती है. 
मेरे जज़बा ए मोमिन को समझो. 
मोमिन का दीन ही तुम्हारा दीन होगा. 
आने वाले वक़्त में.
***

Wednesday, February 6, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -72


 यूसुफ़ 
हज़रत इब्राहीम के पोते याक़ूब अपनी सभी बारह औलादों में 
अपने छोटे बेटे यूसुफ़ को सब से ज़्यादः चाहता है. 
यह बात यूसुफ़ के बाक़ी सभी भाइयों को खटकती है, 
इस लिए वह सब यूसुफ़ को ख़त्म कर देने के फ़िराक़ में रहते हैं. 
इस बात का ख़दशा याक़ूब को भी रहता है. 
एक दिन यूसुफ़ के सारे भाइयों ने साज़िश करके याक़ूब को राज़ी कर लिया  
कि वह यूसुफ़ को सैर व तफ़रीह के लिए बाहर ले जाएँगे, 
याक़ूब राज़ी हो गया. 
वह सभी यूसुफ़ को जंगल में ले जाकर एक अंधे कुँए में डाल देते हैं 
और यूसुफ़ का ख़ून आलूद कपड़ा लाकर याक़ूब के सामने रख कर कहते हैं कहते हैं कि यूसुफ़ को भेड़िए खा गए. 
याक़ूब यूसुफ़ की मौत को सब्र करके ज़ब्त कर जाता है.
उधर कुँए से यूसुफ़ की चीख़ पुकार सुन कर राहगीर ताजिर 
उसे कुँए से निकाल लेते हैं 
और बच्चे को माल ए तिजारत में शामिल कर के आगे बढ़ लेते हैं. 

ताजिर उसे मिस्र ले जाकर अज़ीज़ नामी जेलर के हाथों फ़रोख़्त कर देते हैं. 
निःसंतान जेलर अज़ीज़ इस ख़ूब सूरत बच्चे को अपना बेटा बनाने का फ़ैसला करता है मगर यूसुफ़ के जवान होते होते अज़ीज़ की बीवी ज़ुलेख़ा इसको चाहने लगती है. 
एक रोज़ ज़ुलेख़ा इसको अकेला पाकर इस की क़ुरबत हासिल करने की कोशिश करती है लेकिन यूसुफ़ बच बचा कर इसके जाल से निकलने की कोशिश करता है, 
तब ज़ुलेख़ा इसका दामन पकड़ लेती है जो कि कुरते से अलग होकर 
ज़ुलेख़ा के हाथ में आ जाता है. 
इसी वक़्त इसका शौहर अज़ीज़ घर में दाख़िल होता है, 
ज़ुलेख़ा अपनी चाल को उलट कर यूसुफ़ पर इलज़ाम लगा देती है 
कि यूसुफ़ उसकी आबरू रेज़ी पर आमादः होगया था. 
वह अज़ीज़ से यूसुफ़ को जेल में डाल देने की सिफ़ारिश भी करती है.
बात बढ़ती है तो मोहल्ले के कुछ बड़े बूढ़े बैठ कर मुआमले का फ़ैसला करते हैं 
और साबित करते हैं कि यूसुफ़ बच कर भागना चाहता था, 
इसी लिए कुरते का पिछला दामन ज़ुलेख़ा के हाथ लगा. 
मुखिया ज़ुलेख़ा को क़ुसूर वार ठहराते हैं 
और बाद में ज़ुलेख़ा भी अपनी ग़लती को तस्लीम कर लेती है. 
इससे मोहल्ले की औरतों में उसकी बदनामी होती है कि 
वह अपने ग़ुलाम  पर रीझ गई. 
जब ये बात ज़ुलेख़ा के कानों तक पहुंची तो उसने ऐसा किया कि 
मोहल्ले की जवान औरतों की दावत की 
और सबों को एक एक चाक़ू और एक एक नीबू थमा दिया 
फ़िर यूसुफ़ को आवाज़ लगाई. 
यूसुफ़ दालान में दाख़िल हुवा तो हुस्ने-यूसुफ़ देख कर औरतों ने 
चाकुओं से नीबू काटने के बजाएअपने अपने हाथों की उँगलियाँ काट लीं.

अपने तईं औरतों की दीवानगी देख कर यूसुफ़ को अंदेशा होता है कि 
वह कहीं किसी ग़ुनाह का शिकार न हो जाए, 
अज़ ख़ुद जेल ख़ाने में रहना बेहतर समझता है. 
जेल में उसके साथ दो ग़ुलाम क़ैदी और भी होते हैं जिनको वह 
ख़्वाबों की ताबीर बतलाता रहता है जो कि सच साबित होती हैं. 
कुछ ही दिनों बाद वह क़ैदी रिहा हो जाते हैं.

एक रात बादशाह ए मिस्र एक अजीब ओ ग़रीब ख़्वाब देखता है कि 
दर्याए नील से निकली हुई सात तंदुरुस्त गायों को सात लाग़र गाएँ खा गईं और सात हरी बालियों के साथ सात सूखी बालियाँ मौजूद हैं. 
सुब्ह को बादशाह ने ख़्वाब की चर्चा अपने दरबारियों में की मगर 
ख़्वाब की ताबीर बतलाने वाला कोई आगे न आ सका. 
ये बात उस ग़ुलाम  क़ैदी तक पहुँची जो कभी यूसुफ़ के साथ जेल में था. 
उसने दरबार में ख़बर दी कि जेल में पड़ा इब्रानी क़ैदी ख़्वाबों की सही सही ताबीर बतलाता है, उस से बादशाह के ख़्वाब की ताबीर पूछी जाए, 
यूसुफ़ को जेल से निकाल कर दरबार में तलब किया जाता है. 
ख़्वाब को सुन कर ख़्वाब की ताबीर वह इस तरह बतलाता है कि 
आने वाले सात साल फ़सलों के लिए ख़ुश गवार साल होंगे और 
उसके बाद सात साल ख़ुश्क साली के होंगे. 
सात सालों तक बालियों में से अगर ज़रुरत से ज़्यादः दाना न निकला जाए तो 
अगले सात साल भुखमरी से अवाम को बचाया जा सकता है.
फ़िरअना (फ़िरौन) इसकी बतलाई हुई ताबीर से ख़ुश होता है और यूसुफ़ को जेल से दरबार में बुला कर इसका ज़ुलैख़ा से मुतालिक़ मुक़दमा नए सिरे से सुनता है, 
पिछला दामन ज़ुलैख़ा के हाथ में रह जाने की बुनियाद पर 
यूसुफ़ बा इज़्ज़त बरी हो जाता है. 

यूसुफ़ को इस मुक़दमे से और ख़्वाब की ताबीर से इतनी इज़्ज़त मिलती है कि 
वह बादशाह के दरबार में वज़ीर हो जाता है.
बादशाह के ख़्वाब के मुताबिक़ सात साल तक मिस्र में बेहतर फ़सल होती है 
जिसको यूसुफ़ स्टोर करता रहता है, 
इसके बाद सात सालों की क़हत साली आती है तो 
यूसुफ़ अनाज के तक़सीम का काम अपने हाथों में ले लेता है. 
क़हत की मार यूसुफ़ के मुल्क कन्नान तक पहुँचती है और 
अनाज के लिए एक दिन यूसुफ़ का सौतेला भाई भी उसके दरबार में आता है 
जिसको यूसुफ़ तो पहचान लेता है मगर वज़ीर ए खज़ाना को पहचान पाना उसके भाई के लिए ख़्वाब ओ ख़याल की बात थी. 
यूसुफ़ भाई की ख़ास ख़ातिर करता है और 
उसके घर की जुग़राफ़िया उसके मुँह से उगलुवा लेता है. 
वक़्त रुख़सत यूसुफ़ अपने भाई को दोबारा आने और गल्ला ले जाने की दावत देता है और ताक़ीद करता है कि वह अपने छोटे भाई को ज़रूर ले आए.
(दर अस्ल छोटा भाई यूसुफ़ का चहीता था, इसका नाम था बेन्यामीन). 
यूसुफ़ ने वह रक़म भी अनाज की बोरी में रख दी जो ग़ल्ले की क़ीमत ली गई थी. 
यूसुफ़ का सौतेला भाई जब अनाज लेकर कन्नान बाप याक़ूब के पास पहुँचा तो 
वज़ीर ख़ज़ाना ए मिस्र की मेहर बानियों का क़िस्सा सुनाया और कहा कि 
चलो खाने का इंतेज़ाम हो गया और साथ में यह भी बतलाया कि 
अगली बार छोटे बेन्यामीन को साथ ले जाएगा, 
बेन्यामीन का नाम सुन कर याक़ूब चौंका, 
कहा कहीं यूसुफ़ की तरह ही तुम इसका भी हश्र तो नहीं करना चाहते? 
मगर बाद में वह राज़ी हो गया. 

कुछ दिनों के बाद याक़ूब के कुछ बेटे बेन्यामीन को साथ लेकर मिस्र अनाज लेने के लिए पहुँचते हैं. 
यूसुफ़ अपने भाई बेन्यामीन को अन्दरूने-महल ले जाता है और 
इसे लिपटा कर खूब रोता है और अपनी पहचान को ज़ाहिर कर देता है. 
वह आप बीती भाई को सुनाता है और मंसूबा बनाता है कि तुम पर चोरी का इलज़ाम लगा कर वापस नहीं जाने देंगे, 
गरज़ ऐसा ही किया. 
बग़ैर बेन्यामीन के यूसुफ़ के सौतेले भाई याक़ूब के पास वापस पहुँचे तो 
उस पर फ़िर एक बार क़यामत टूटी. 
उसने सोचा कि यूसुफ़ की तरह ही बेन्यामीन को भी इन लोगों ने मार डाला.
कुछ दिनों बाद यूसुफ़ सब को मुआफ़ कर देता है और 
बादशाह के हुक्म से सब भाइयों, माओं और बाप को मिस्र बुला भेजता है. 
याक़ूब के बेटे याक़ूब को और यूसुफ़ की माँ को लेकर यूसुफ़ के पास पहुँचते हैं, 
यूसुफ़ अपने माँ बाप को तख़्त शाही पर बिठाता है, 
उसके सभी ग्यारह भाई उसके सामने सजदे में गिर जाते हैं, 
तब यूसुफ़ अपने बाप को बचपन में देखे हुए अपने ख्व़ाब को याद दिलाता है कि 
मैं ने चाँद और सूरज के साथ ग्यारह सितारे देखे थे 
जो कि उसे सजदा कर रहे थे, उसकी ताबीर आप के सामने है.'' 
(सूरह यूसुफ़)
***

Tuesday, February 5, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -71

 इब्राहीम के जुर्म

हज़रात इब्राहीम ग़रीबुल वतनी की हालत में अपनी बीवी सारा को 
किसी मजबूरी के तहत अपनी बहन बतला कर मिसरी बादशाह 
फ़िरौन की पनाह में रहा करते थे. 
तौरेत के मुताबिक़ सारा हसीन थी और बादशाह कि मंजूरे नज़र हो कर उसके हरम में पनाह पा गई थी. 
सच्चाई खुलने पर हरम से बाहर की गई, साथ में इब्राहीम और उनका भतीजा लूत भी. 
उसके बाद दोनों चचा भतीजों ने मवेशी पालन का पेशा अपनाया 
और कामयाब गडरिए हुए.
बनी इस्राईल की शोहरत, तारीख़ में फ़िरअना के वज़ीर यूसुफ़ की ज़ात से हुई. 
युसूफ़ इतना मशहूर हुवा कि इसके बाप दादों का नाम तारीख़ में दर्ज हुवा. 
युसुफ़ के वजूद ने याक़ूब, इशाक, इस्माईल, और इब्राहीम जैसे 
मामूली लोगों का नामो निशान भी कहीं तारीख़ में न होता.
मानव की रचना कालिक अवस्था में इब्राहीम को जो होना चाहिए था वोह थे, 
न इतने सभ्य कि उन्हें पैग़ाबर कहा जाए, 
ना ही इतने बुरे कि जिन्हें अमानुष कहा जाय. 
मानवीय कमियाँ थीं उनमें कि अपनी बीवी को बहन बना कर बादशाह के शरण में गए और अपनी धर्म पत्नी को उसके हवाले किया. 
दूसरा उनका जुर्म ये था कि अपनी दूसरी गर्भ वती पत्नी हाजरा को पहली पत्नी सारा के कहने पर घर से निकल बाहर कर दिया था, जो कि रो धो कर सारा से माफ़ी मांग कर वापस घर आई. तीसरा जुर्म था कि इस्माईल के पैदा हो जाने के बाद हाजरा को एक बार फ़िर मय इस्माईल के घर से दूर मक्का के पास एक मरु खंड में मरने के लिए छोड़ आए. 
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Monday, February 4, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -70


 इम्कानी अज़ाब 

कोई वलीद नाम का शख़्स था जिसने मुहम्मद के हाथों पर हाथ रख कर बैत की थी और इस्लाम क़ुबूल किया था. वह अपने घर वापस जा रहा था कि उसे कोई शनासा मिल गया और तहक़ीक़ की. वलीद ने जवाब दिया कि तुमने ठीक ही सुना है. 
मैं डर रहा हूँ कि मरने के बाद कोई ख़राबी न दर पेश हो. 
शनासा ने कहा बड़े शर्म की बात है कि तुम ने अपना और अपने बुज़ुर्गों के दीन को छोड़ कर एक सौदाई की बातों पर यक़ीन कर लिया. 
वलीद ने कहा मुमकिन है उसकी बातें सच हों और मैं जहन्नम में जा पडूँ?
शनासा बोला भाई मैं तुम्हारे वह इम्कानी अज़ाब अपने सर लेने का वादा कर रहा हूँ, बशर्ते तुम मुझे कुछ मॉल दो. 
वलीद इस बात पर राज़ी हो गया मगर कुछ मोल भाव के बाद. 
वलीद ने शनासा से इसकी तहरीर लिखवाई और दो लोगों की गवाही कराई फिर तय शुदा रक़म अदा करके अपने पुराने दीन पर लौट आया ये बात जब मुहम्मद के इल्म में आई तो क़ुरआनी आयत नाज़िल हुई.
आप उस वक़्त के इस वाकए से तब के लोगों का ज़ेहनी मेयार को समझ सकते हैं.
कुछ वलीद जैसे गाऊदियों ने इस्लाम क़ुबूल किया, फिर माले-ग़नीमत के लुटेरों ने. इसके बाद जंगी मज़लूमों ने इसे क़ुबूल किया.
 क़ुरआन खोखला पहले भी था और आज भी है.
वलीद जैसे सादा लौह कल भी थे और आज भी हैं.
देखना है तो टेली विज़न पर बाबाओं, बापुओं, स्वामियों 
और पीरों की सजी हुई महफ़िल देख सकते हैं.
शनासा जैसे होशियार और होश मंद भी हमेशा रहे ही हैं.
ज़रुरत है क़ौम को चीन जैसे इन्क़लाब की, 
जो अवाम की ज़ेहनी मरम्मत गोलियों की चन्द आवाज़ से करें, 
वर्ना हमारा मुल्क इसी कश मकश की हालत में पड़ा रहेगा.
***

Friday, February 1, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -69


 अब्रहा सललललाहे अलैहे वसल्लम 

इस्लाम नाज़िल होने से तक़रीबन अस्सी साल पहले का वक़ेआ है कि अब्रहा नाम का कोई हुक्मरां मक्के में काबा पर अपने हाथियों के साथ हमला वर हुवा था.   किंवदंतियाँ हैं कि उसकी हाथियों को अबाबील परिंदे अपने मुँह से कंकड़याँ ढो ढो कर लाते और हाथियों पर बरसते, नतीजतन हाथियों को मैदान छोड़ कर भागना पड़ा और अब्रहा पसपा हुवा. 
यह वक़ेआ ग़ैर फ़ितरी सा लगता है मगर दौरे जिहालत में अफ़वाहें सच का मुक़ाम पा जाती हैं.
वाजः हो कि अल्लाह ने अपने घर की हिफ़ाज़त तब की जब ख़ाना ए काबा में 360 बुत विराजमान थे. इन सब को मुहम्मद ने उखाड़ फेंका, अल्लाह को उस वक़्त परिंदों की फ़ौज भेजनी चाहिए था जब उसके मुख़्तलिफ़ शकले वहां मौजूद थीं. 
अल्लाह मुहम्मद को पसपा करता. 
अगर बुत परस्ती अल्लाह को मंज़ूर न होती तो मुहम्मद की जगह 
अब्रहा सललललाहे अलैहे वसल्लम होता.
यह मशकूक वक़ेआ भी क़ुरआनी सच्चाई बन गया और झूट को तुम अपनी नमाज़ों में पढ़ते हो?  
सूरह  फ़ील  
***

Thursday, January 31, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -68


 ख़ालिस काफ़िर          
ख़ालिस काफ़िर ले दे के भारत में या नेपाल में ही बाक़ी बचे हुए हैं. 
कुफ़्र और शिर्क इंसानी तहज़ीब की दो क़ीमती विरासतें है. 
इनके पास दुन्या की क़दीम तरीन किताबें हैं,  
जिन से इस्लाम ज़दा मुमालिक महरूम हो गए हैं. 
इनके पास बेश क़ीमती चारों वेद मौजूद हैं, 
जो कि मुख़्तलिफ़ चार इंसानी मसाइल का हल हुवा करते थे, 
इन्हीं वेदों की रौशनी में 18 पुराण हैं. 
माना कि ये मुबालिग़ा आराइयों से लबरेज़ है, 
मगर तमाज़त और ज़हानत के साथ, जिहालत से बहुत दूर हैं.  
इसके बाद इनकी शाख़ें 108 उप निषद मौजूद हैं, 
रामायण और महा भारत जैसी क़ीमती गाथाएँ, 
गीता जैसी सबक आमोज़ किताबें, अपनी असली हालत में मौजूद हैं. 
ये सारी किताबें तख़लीक़ हैं, तसव्वर की बुलंद परवाज़ें हैं, 
जिनको देख कर दिमाग़ हैरान हो जाता है. 
और अपनी धरोहर पर रश्क होता है. 
जब बड़ी बड़ी क़ौमों के पास कोई रस्मुल ख़त भी नहीं था, 
तब हमारे पुरखे ऐसे ग्रन्थ रचा करते थे. 

अरबों का कल्चर भी इसी तरह मालामाल था 
और कई बातों में वह आगे था, 
जिसे इस्लाम की आमद ने धो दिया. 
बढ़ते हुए कारवाँ की गाड़ियाँ बैक गेर में चली गई.
माज़ी में इंसानी दिमाग़ को रूहानी मरकज़ियत देने के लिए मफ़रूज़ा मअबूदों, 
देवी देवताओं और राक्षसों के किरदार उस वक़्त के इंसानों के लिए अलहाम ही थे. तहजीबें बेदार होती गईं और ज़ेहनों में बलूग़त आती गई, 
काफ़िर अपने ग्रंथो को एहतराम के साथ ताक़ पर रखते गए. 
ख़ुशी भरी हैरत होती है कि आज भी उनके वच्चे अपने पुरखों की रचनाओं को पौराणिक कथा के रूप में पहचानते हैं.
उनकी किताबें धार्मिक से पौराणिक हो गई हैं.

 क़ुरआन इन ग्रंथों के मुकाबले में अशरे-अशीर भी नहीं. 
ये कोई तख़लीक़ ही नहीं है बल्कि तख़लीक़ के लिए एक बद नुमा दाग़ है. 
मुसलमान इसकी पौराणिक कथा की जगह, 
मुल्लाओं की बखानी हुई पौराणिक हक़ीक़त की तरह जानते हैं 
और इन देव परी की कहानियों पर यक़ीन और अक़ीदा रखते है. 
यह मुसलमान कभी बालिग़ हो ही नहीं सकते. 
एक वक़्त इस्लामी इतिहास में ऐसा आ गया था कि इंगलिशतान 
अरबों के क़ब्ज़े में होने को था कि बच गया. 
इतिहास कर "वर्नियर" लिखता है 
"अगर कहीं ऐसा हो जाता तो आज आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पैग़ामबर मुहम्मद के फ़रमूदात पढ़ाए जा रहे होते."
अरब भी मुहम्मद को देखने और सुनने के बाद कहते थे कि 
"इसका क़ुरआन शायर के परेशान ख़यालों का पुलिंदा है" 
इस हक़ीक़त को जिस क़द्र जल्दी मुसलमान समझ लें, इनके हक़ में होगा .
एक ही हल है कि मुसलमान को तर्क-इस्लाम करके, 
अपने बुनयादी कल्चर को संभालते हुए मोमिन बन जाने की सलाह है. 
जिसकी तफ़सील हम बार बार अपने मज़ामीन में दोहराते है. 
कोई भी ग़ैर मुस्लिम नहीं चाहता कि  मुसलमान इस्लाम का दामन छोड़े. 
अरब तरके-इस्लाम करके बेदार हुए तो योरप और अमरीका 
के हाथों से तेल का ख़ज़ाना निकल जाएगा, 
भारत के मालदार लोगों के हाथों से नौकर चाकर, मजदूर, मित्री और एक बड़ा कन्ज़ियूमर तबक़ा सरक जाएगा. 
तिजारत और नौकरियों में दूसरे लोग कमज़ोर हो जाएँगे, 
गोया सभी चाहते है कि दुन्या की 20% आबादी सोलवीं सदी में अटकी रहे.  
***

Wednesday, January 30, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -67


 अन्दर से फूटी हुई चाहत     
हर शै की तरह इंसानी ज़ेहन भी इर्तेकई मरहलों के हवाले रहता है 
जिसके तहत अभी इंसानी मुआशरे को ख़ुदा की ज़रुरत है. 
कुछ लोग बहुत ही सादा लौह होते हैं, 
उन्हें अपने वजूद के सुपुर्दगी में मज़ा आता है. 
जैसे की एक हिन्दू धर्म पत्नि अपने पति को ही देवता मान कर 
उसके चरणों में पड़ी रहने में राहत महसूस करती है. 
हमारे एक डाक्टर दोस्त हैं, जो बहुत ही सीधे सादे नेक दिल इंसान हैं, 
वह अपने हर काम का अंजाम ईश्वर की मर्ज़ी पर डाल के बहुत सुकून महसूस करते हैं, उनको देख कर बड़ा रश्क आता है कि वह मुझ से बेहतर ज़िंदगी ग़ुज़ारते हैं, 
कभी कभी अन्दर का कमज़ोर इंसान भटक कर कहता है कि 
किसी न किसी ख़ुदा को मान कर ही जीना चाहिए. 
किसी का क्या नुक़सान है कि कोई अपना ख़ुदा रख्खे. 
ये फ़ितरते इंसानी ही नहीं, बल्कि फ़ितरते हैवानी भी है. 
एक कुत्ता अपने मालिक के क़दमों पर लोट पोट कर कितना ख़ुश होता है. 
बहुत से हैवान इंसान की पनाह में रहक़र ही अमाँ पाते हैं. 
अपने पूज्य, अपने माबूद, अपने देव और अपने मालिक के तरफ़ 
ये क़दम इंसान या हैवान के दिल के अन्दर से फूटा हुवा जज़बा है, 
न कि इनके ऊपर लादा गया लदान. 
ये किसी ख़ारजी तहरीक या तबलीग़ का नतीजा नहीं, 
इसके पीछे कोई डर, खौ़फ़ नहीं, कोई लालच या सियासत नहीं है. 
इसको मनवाने के लिए कोई क़ुरआनी अल्लाह की आयतें नहीं 
जिसके एक हाथ में दोज़ख़ की आग और दूसरे हाथ में जन्नत का ग़ुलदस्ता रहता है. 
अन्दर से फूटी हुई ये चाहत क़ुरआनी अल्लाह की तरह हमारे वजूद की घेरा बंदी नहीं करतीं. आपका ख़ुदा  किसी को मुतास्सिर न करे, शौक से पूजिए 
जब तक कि आप अपने सिने बलूग़त में न आ जाएं, 
आप की समझ में ज़िंदगी के राज़ ओ नयाज़ न झलकें. 
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Tuesday, January 29, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -66


मुज़ब्ज़ब मुसलमान       
भारत के मुस्तक़बिल क़रीब में मुसलमानों की हैसियत बहुत ही तशवीश नाक होने का अंदेशा है. अभी फ़िलहाल जो रवादारी बराए जम्हूरियत बरक़रार है, 
बहुत दिन चलने वाली नहीं. इनकी हैसियत बरक़रार रखने में वह हस्तियाँ है जिनको इस्लाम मुसलमान मानता ही नहीं और उन पर मुल्ला फ़तवे की तीर चलाते रहते हैं. 
उनमे मिसाल के तौर पर डा. ए पी. जे अब्दुल  कलाम, 
तिजारत में अज़ीम प्रेम जी, सिप्ला के हमीद साहब वग़ैरह, 
फ़िल्मी  दुन्या के दिलीप कुमार, आमिर ख़ान, शबाना आज़मी. और ए. आर. रहमान, फ़नकारों में जो अब नहीं रहे, फ़िदा हुसैन, बिमिल्ला ख़ान जैसे कुछ लोग हैं. 
आम आदमियों में सैनिक अब्दुल हमीद जैसी कुछ फ़ौजी हस्तियाँ भी हैं 
जो इस्लाम को फूटी आँख भी नहीं भाते. 
मैंने अपने कालेज को एक क्लास रूम बनवा कर दिया तो कुछ इस्लाम ज़दा कहने लगे की यही पैसा किसी मस्जिद की तामीर में लगाते तो क्या बात थी, 
वहीं उस कालेज के एक टीचर ने कहा तुमने मुसलमानों को सुर्ख़रू कर दिया, 
अब हम भी सर उठा कर बातें कर सकते है.
कौन है जो सेंध लगा रहा है आम मुसलमानों के हुकूक़ पर?
कि सरकार को सोचना पड़ता है कि इनको मुलाज़मत दें या न दें?
आर्मी को सोचना पड़ता है कि इनको कैसे परखा जाय?
कंपनियों को तलाश करना पड़ता कि इनमें कोई जदीद तालीम का बंदा है भी?
बनिए और बरहमन की मुलाज़मत को इनके नाम से एलर्जी है.
इसकी वजेह इस्लाम है और इसके ग़द्दार एजेंट जो तालिबानी ज़ेहन्यत रखते हैं.
यह भी हमारी ग़लतियों से ख़ता के शिकार हैं. 
हमारी ग़लती ये है कि हम भारत में मदरसों को फलने फूलने का अवसर दिए हुए है जहाँ वही पढ़ाया जाता है जो क़ुरआन में है.
***

Monday, January 28, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -65


 महा मानव         
मैं अपने नज़रयाती मुआमले में कुछ में कठोर हूँ, 
इसके बावजूद मेरी आँखों में आँसू उस वक़्त ज़रूर छलक जाते हैं 
जब मैं स्टेज पर इंसानियत को सुर्ख़रू होते हुए देखता हूँ, 
मसलन हिन्दू -मुस्लिम दोस्ती की नज़ीर हो, 
या फिर फ़र्ज़ के सवाल पर इंसानियत के लिए मौत को मुँह जाना. 
मेरे लम्हात में ऐसे पल भी आते हैं कि विदा होती हुई बेटी को 
जब माँ लिपटा कर रोती है तो मेरे आँसू नहीं रुकते, 
गोकि मैंने अपनी बेटियों को क़ह्क़हों के साथ रुख़सत किया. 
इंसान की मामूली भूल चूक को भी मैं नज़र अंदाज़ कर देता हूँ. 
क्यूंकि उम्र के आगो़श में बहुत सी लग़ज़िशें हो जाती हैं. 
मैं कि एक अदना सा इंसान, समझ नहीं पाता कि लोग छोटी छोटी और 
बड़ी बड़ी मान्यताएँ क्यूँ गढ़े हुए हैं और इन साँचों में क्यूँ ढले हुए है 
जब कि क़ुदरत उनका मार्ग  दर्शन हर मोड़ पर कर रही है.
बड़ी मान्यताओं में अल्लाह, ईश्वर और गाड वग़ैरा की मान्यताएँ हैं. 
अगर वह इनमें से कोई होता तो यक़ीनी तौर पर इंसान को छोड़ कर 
हर जीव किसी न किसी तरह से उसकी उपासना करता. 
हर जीव पेट भरने के बाद उमंग, तरंग और मिलन की राह पर चल पड़ता है, 
न कि क़ुदरत की उपासना की तरफ़. 
क़ुदरत का ये इशारा भी इंसान को जीने की राह दिखलाता है 
जिसे उल्टा ये अशरफ़ुल मख़लूक़ात तअने के तौर पर उलटी बात ही करता है - - - 
इंसान हो या हैवान?
अगर इन छोटी बड़ी मान्यताओं और क़दरों से इंसान मुक्त हो जाय 
तो वह मानव से महा मानव बन सकता है, 
जिस दिन इंसान महा मानव बन जायगा ये धरती जन्नत नुमा बन जायगी.
***

Friday, January 25, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -64


तजावुज़ और जुमूद          
मैं इस्लाम का आम जानकर हूँ , इसका आलिम  फ़ाज़िल नहीं. 
इस की गहराइयों में जाकर देखा तो इसका मुंकिर हो गया, 
सिने बलूग़त में आकर जब इस पर नज़रे-सानी किया तो जाना कि 
इसमें तो कोई गहराई ही नहीं है. 
लिहाज़ा इसके अंबारी लिटरेचर से सर को बोझिल करना मुनासिब नहीं समझा.
 जिन पर नज़र गई तो पाया कि कालिमा ए हक़ के नाहक़ जवाज़ थे. 
हो सकता है कि कहीं पर मेरी अधूरी जानकारी दर पेश आ जाए 
मगर मेरी तहरीक में इसकी कोई अहमियत नहीं है, 
क्यूँ कि इनकी बहसें बाहमी इख़्तलाफ़ और तजावुज़ व जुमूद  के दरमियान हैं. 
टोपी लगा कर नमाज़ पढ़ी जाए, बग़ैर टोपी पहने भी नमाज़ जायज़ है - - ,  
ये इनके मौज़ूअ हुवा करते हैं. 
मेरा सवाल है नमाज़ पढ़ते ही क्यूँ हो? 
मेरा मिशन है मुसलमानों को इस्लामी नज़र बंदी से नजात दिलाना
***

Thursday, January 24, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -63

जो सत्य नहीं वह मिथ्य है          
क़ुदरत ने ये भूगोल रूपी इमारत को वजूद में लाने का जब इरादा किया 
तो सब से पहले इसकी बुनियाद "सच और ख़ैर" की कंक्रीट से भरी. 
फिर इसे अधूरा छोड़ कर आगे बढ़ती हुई मुस्कुराई कि 
मुकम्मल इसको हमारी रख्खी हुई बुनियाद करेगी. 
वह आगे बढ़ गई कि उसको कायनात में अभी बहुत से भूगोल बनाने हैं. 
उसकी कायनात इतनी बड़ी है कि कोई बशर अगर लाखों रौशनी साल 
(light years ) की उम्र भी पाए तब भी उसकी कायनात के फ़ासले को 
किसी विमान से तय नहीं कर सकता, 
तय कर पाना तो दूर की बात है, 
अपनी उम्र को फ़ासले के तसव्वुर में सर्फ़ करदे 
तो भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाएगा  .
क़ुदरत तो आगे बढ़ गई इन दो वारिसों "सच और ख़ैर" के हवाले करके 
इस भूगोल को कि यही इसे बरक़रार रखेंगे जब तक ये चाहें. 
भूगोल की तरह ही क़ुदरत ने हर चीज़ को गोल मटोल पैदा किया  
कि ख़ैर के साथ पैदा होने वाली सादाक़त ही इसको जो रंग देना चाहे दे. 
क़ुदरत ने पेड़ को गोल मटोल बनाया कि इंसान की 
"सच और ख़ैर" की तामीरी अक़्ल इसे फर्नीचर बना लेगी, 
उसने पेड़ों में बीजों की जगह फर्नीचर नहीं लटकाए. 
ये ख़ैर का जूनून है कि वह क़ुदरत की उपज को इंसानों के लिए 
उसकी ज़रुरत के तहत लकड़ी की शक्ल बदले.
तमाम ईजादें ख़ैर (परोकार) का जज़्बा ही हैं कि आज इंसानी जिंदगी 
कायनात के दूसरे सय्यारों तक पहुँच गई है, 
ये जज़्बा ही एक दिन इंसानों को ही नहीं बल्कि हैवानों को भी उनके हुक़ूक़ दिलाएगा.
जो सत्य नहीं वह मिथ्य है. 
दुन्या हर तथा कथित धर्म अपने कर्म कांड और आडम्बर के साथ मिथ्य हैं  इससे मुक्ति पाने के बाद ही क़ुदरत का धर्म अपने शिखर पर आ जाएगा और ज़मीन पाक हो जाएगी.
***

Wednesday, January 23, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -62

 क़ाबिले-जुर्म आस्थाएँ        
जिस तरह आप कभी कभी ख़ुदाए बरतर की ज़ात में ग़र्क़ होकर 
कुछ जानने की कोशिश करते हैं, 
इसी तरह कभी मुहम्मद की ज़ात में ग़र्क़ होकर कुछ तलाश करने की कोशिश करें. अभी तक बहैसियत मुसलमान उनकी ज़ात में जो पाया है, 
शऊरी तौर पर देखा जाए तो वह सब दूसरों के मार्फ़त है.  
इनके क़ुरआन और इनकी हदीस में ही सब कुछ उजागर है. 
आपके लिए मुहम्मद की पैरवी कल भी ज़हर थी और आज भी ज़हर है. 
इंसानियत की अदालत में आज सदियों बाद भी इन पर मुक़दमा चलाया जा सकता है, जिसमे बहेस मुबाहिसे के लिए मुहज्ज़ब समाज के दानिशवरों को दावत दी जाय.
 इनका फ़ैसला यही होगा की इस्लाम और क़ुरआन पर यक़ीन रखना 
क़ाबिले जुर्म अमल होगा.
आज न सही एक दिन ज़रूर ऐसा वक़्त आएगा कि मज़हबी ज़ेहन रखने वाले 
तमाम मजहबों के अनुयाइयों को सज़ा भुगतना होगा 
जिसमे पेश पेश होंगे मुसलमान.
धर्म व् मज़हब द्वारा निर्मित ख़ुदा और भगवान दुर्गन्ध भरे झूट हैं, 
इसके विरोध में सच्चाई सुबूत लिए खड़ी है. 
मानव समाज अभी पूर्णतया बालिग़ नहीं हुवा है, 
यह अभी अर्ध विकसित है, 
इसी लिए झूट का बोल बाला है और सत्य का मुँह काला है. 
जब तक ये उलटी बयार बहती रहेगी, 
मानव समाज सच्ची खुशियों से बंचित रहेगा.   
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Monday, January 21, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -61


ना आक़बत अन्देश का ज़हरीला ये पैग़ाम         
  
*यहूदियों का ख़ुदा यहुवा हमेशा यहूदियों पर मेहरबान रहता है, 
गाड एक बाप की तरह हमेशा अपने ईसाई बेटों को मुआफ़ किए रहता है, 
ज़्यादह तर धार्मिक भगवान दयालु होते हैं, 
बस की एक मुसलमानों का अल्लाह है जो उन पर पैनी नज़र रखता है. 
वोह बार बार इन्हें धमकियाँ दिए रहता है. 
हर वक़्त याद दिलाता रहता है कि वह बड़ा अज़ाब देने वाला है. 
सख़्त बदला लेने वाला है. 
चाल चलने वाला वाला है. 
गर्दन दबोचने वाला है. क़हर ढाने वाला है. 
वह मुसलमानों को हर वक़्त डराए रहता है. 
उसे डरपोक बन्दे पसंद हैं, 
बसूरत दीगर उसकी राह में जेहादी उसकी पहली पसंद हैं.. 
वोह मुसलमानों को महदूद होकर जीने की सलाह देता है, 
जिस की वजह से हिदुस्तानी मुसलमान कशमकश की ज़िन्दगी जीने पर मजबूर हैं. 
इन्हें मुल्क में मशकूक नज़रों से देखा जाए तो क्यूँ न देखा जाए ? 
देखिए अल्लाह कहता है - - -
''मुसलमानों को चाहिए कुफ्फारों को दोस्त न बनाएं, मुसलमानों से तजाउज़ करके जो शख़्स ऐसा करेगा, वह शख़्स  अल्लाह के साथ किसी शुमार में नहीं मगर अल्लाह तुम्हें अपनी ज़ात से डराता है." 
सूरह आले इमरान 3  आयत (28)
इस क़ुरआनी आयात को सुनने के बाद भारत की काफ़िर हिन्दू अक्सरीयत आबादी मुस्लिम अवाम को दोस्त कैसे बना सकती है? 
ऐसी क़ुरआनी आयतों के पैरोकारों को हिन्दू अपना दुश्मन मानें तो क्यूँ न मानें? दुन्या के तमाम ग़ैर मुस्लिम मुमालिक में बसे हुए मुसलमानों के साथ किस दर्जा ना आक़बत अन्देशाना और ज़हरीला ये पैग़ाम है इसलाम का. 
मुस्लिम ख़वास और मज़हबी रहनुमा कहते हैं कि उनके बुजुर्गों ने पाकिस्तान न जाकर हिंदुस्तान जैसे सैकुलर मुल्क में रहना पसंद किया, इस लिए उन्हें सैकुलर हुक़ूक़ मिलने चाहिएं. सैकुलरटी की बरकतों के दावे दार ये लोग सैकुलर भी हैं और ऐसी आयात वाली क़ुरआन के पुजारी भी. 
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Saturday, January 19, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -60


 मुनाफ़िक़-ए-इंसानियत

मुसलमानों में दो तबके तअलीम याफ़्ता कहलाते हैं, 
पहले वह जो मदरसे से फ़ारिग़ुल तअलीम हुवा करते हैं और 
समाज को दीन की रौशनी (दर अस्ल अंधकार) में डुबोए रहते हैं, 
दूसरे वह जो इल्म जदीद पाकर अपनी दुन्या संवारने में मसरूफ़ हो जाते हैं. 
मैं यहाँ दूसरे तबक़े को ज़ेरे-बहस लाना चाहूँगा. 
इनमें जूनियर क्लास के टीचर से लेकर यूनिवर्सिटीज़ के प्रोफ़सर्स तक और इनसे भी आगे डाक्टर, इंजीनियर और साइंटिस्ट तक होते हैं. 
इब्तेदाई तअलीम में इन्हें हर विषय से वाक़िफ़ कराया जाता है 
जिस से इनको ज़मीनी हक़ीक़तों की जुग़राफ़ियाई और साइंसी मालूमात होती है. 
ज़ाहिर है इन्हें तालिब इल्मी दौर में बतलाया जाता है कि 
यह ज़मीन फैलाई हुई चिपटी रोटी की तरह नहीं बल्कि गोल है. 
ये अपनी मदार पर घूमती रहती है, न कि साक़ित है. 
सूरज इसके गिर्द तवाफ़ नहीं करता बल्कि ये सूरज के गिर्द तवाफ़ करती है. 
दिन आकर सूरज को रौशन नहीं करता बल्कि 
इसके सूरज के सामने आने पर दिन हो जाता है. 
आसमान कोई बग़ैर ख़म्बे वाली छत नहीं बल्कि 
ला महदूद है और इंसान की हद्दे नज़र है. 
इनको लैब में ले जाकर इन बातों को साबित कर के समझाया जाता है 
ताकि इनके दिमाग़ से धर्म और मज़हब के अंध विश्वास ख़त्म हो जाएँ.
इल्म की इन सच्चाइयों को जान लेने के बाद भी यह लोग जब 
अपने मज़हबी जाहिल समाज का सामना करते हैं तो इन के असर में आ जाते हैं. 
चिपटी ज़मीन और बग़ैर ख़म्बे की छतों वाले वाले आसमान की झूटी आयतों को कठ मुल्लों के पीछे नियत बाँध कर क़ुरआनी झूट को ओढ़ने बिछाने लगते हैं. 
सानेहा ये है कि यही हज़रात अपने क्लास रूम में पहुँच कर 
फिर साइंटिस्ट सच्चाइयां पढ़ाने लगते हैं. 
ऐसे लोगों को मुनाफ़िक़ कहा गया है, 
यह तबका मुसलमानों का उस तबक़े से जो ओलिमा कहे जाते हैं, 
दस ग़ुना क़ौम का मुजरिम है. 
सिर्फ़ ये लोग अपनी पाई हुई तअलीम का हक़ अदा करें तो 
सीधी-सादी अवाम बेदार हो सकती है. 
मुनाफ़िक़ ने हमेशा इंसानियत को नुक़सान पहुँचाया है.
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Friday, January 18, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -59


बारीक बीन अँधा   
         
मुसलमानों! 
अल्लाह तअला न बारीक बीन है न बाख़बर, 
न वह बनिए की तरह है कि सब का हिसाब किताब रखता है, 
वह अगर है तो एक निज़ाम बना कर क़ुदरत के हवाले कर दिया है, 
अगर नहीं है तो भी क़ुदरत का निज़ाम ही कायनात में लागू है. 
हर अच्छे बुरे का अंजाम मुअय्यन है, 
इस ज़मीन की रफ़्तार अरबों बरस से मुक़र्रर है कि है कि 
वह एक मिनट के देर के बिना साल में एक बार अपनी धुरी पर 
अपना चक्कर पूरा करती है. 
क़ुदरत गूँगी, बहरी है और अंधी है 
उससे निपटने के लिए इंसान हर वक़्त उसके मद्दे मुक़ाबिल रहता है. 
अगर वह मुक़ाबिला न करता होता तो अपना वजूद गवां बैठता, 
आज जानवरों की तरह सर्दी, गर्मी और बरसात की मार झेलता होता, 
बड़ी बड़ी इमारतों में ए सी में न बैठा होता.
मुसलमान उसका मुक़ाबिला नहीं करता बल्कि उसको पूजता है, 
यही वजेह है कि वह ज़वाल पज़ीर है.
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Thursday, January 17, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 58


 सिर्फ़ इंसानियत. 
पाकिस्तान अपने आप में एक क़ैद ख़ाना बन गया है 
और हर पाकिस्तानी उम्र क़ैद की सज़ा पाने वाला एक क़ैदी है. 
जहाँ पर क़ैदियों की ज़रा सी ज़बानी लग़ज़िश भी ख़ताए-अज़ीम होती है.
एक ईसाई बच्ची को इस बात पर सज़ा दे दी गई 
कि वह इस्लामी शरीअत की समझ नहीं रखती थी.
बुत शिकन मुसलमान हर ख़ाम माल के बने बुतों को तोड़ने में 
बहादुरी की पहचान रखते हैं, 
मगर वही  मुसलमान हवा के बने बुत अल्लाह से, उनकी हवा खिसकती है. 
ख़ुद तो ख़ुद किसी दूसरे के लिए भी वह साहिबे ईमान होते हैं, 
क्यूँ कि उस से भी हवा के बुत की बुराई उन्हें बर्दाश्त नहीं.
वह एक तरफ़ कहते है अल्लाह सब का है मगर दूसरी तरफ़ बन्दा 
जब अपने अल्लाह पर एहतेजाज करता है तो वह 
उससे अपने थमाए हुए अल्लाह को छीन लेता हैं.
ऐसा मुल्क जहाँ आज इक्कीसवीं सदी में इंसान को इतना 
अख़्तियार नहीं कि वह अपने ख़ालिक़ की तख़लीक़ है, 
वह अपने बाप को कुछ भी कह सकता है अगर उसकी हक़ तलफ़ी हो रही हो.
दूसरी तरफ़ इनके ज़ेहनी दीवालिया पन देखिए कि 
"मिस्टर 10% के दलाल" कहे जाने वाले ज़रदारी को अपने सर पर बिठाए हुए हैं . इनकी जिहादी फ़ौज अब भारत के हाथों रुसवा होने की बजाए 
पूरी दुन्या के हाथों ज़िल्लत उठाएगी. 
छींक आने पर नाक काटने वाले शरीअत के शैदाई नई 
क़द्रों के सामने नाक रगड़ेंगे मगर इनके ग़ुनाहों की सज़ा कम न होगी. 
अब वह वक़्त ज्यादः दूर नहीं कि इंसान का मज़हब इंसानियत होगा, 
सिर्फ़ इंसानियत. 
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Wednesday, January 16, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 57


क़ौम का दोहरा चरित्र 

कितनी बड़ी विडंबना है कि एक तरफ़ तो हम नफ़रत का पाठ पढ़ाने वालों को सम्मान देकर सर आँखों पर बिठाते हैं, उनकी मदद सरकारी कोष से करते हैं, 
उनके हक़ में हमारा कानून भी है, मगर जब उनके पढ़े पाठों का रद्दे अमल होता है तो उनको अपराधी ठहराते हैं. ये हमारे मुल्क और क़ौम का दोहरा मेयार है. 
धर्म अड्डों, धर्म ग़ुरुओं को खुली छूट कि वोह किसी भी अधर्मी और विधर्मी को एलान्या गालियाँ देता रहे भले ही सामने वाला विशुद्ध मानव मात्र हो या योग्य कर्मठ पुरुष हो अथवा चिन्तक नास्तिक हो. 
इनको कोई अधिकार नहीं की यह अपनी मान हानि का दावा कर सकें. 
मगर उन मठाधिकारियों को अपने छल बल के साथ न्याय का संरक्षण मिला हुवा है. 
ऐसे संगठन, और संसथान धर्म के नाम पर लाखों के वारे न्यारे करते हैं, 
अय्याशियों के अड्डे होते हैं और अपने स्वार्थ के लिए देश को खोखला करते हैं. 
इन्हीं के साथ साथ हमारे मुल्क में एक क़ौम  है मुसलमानों की जिसको दुनयावी दौलत से ज़्यादः आसमानी दौलत की चाह है. यह बात उन के दिलो दिमाग़ में सदियों से इस्लामी ओलिमा (धर्म ग़ुरु) भर रहे हैं, जिनका ज़रीआ मुआश (भरण-पोषण) इस्लाम प्रचार है. 
हिंदुत्व की तरह ये भी हैं. मगर इनका पुख़्ता  माफ़िया बना हुवा है. 
इनकी भेड़ें न सर उठा सकती हैं न कोई इन्हें चुरा सकता है. 
बाग़ियों को फ़तवा की तौक़ पहना कर बेयारो-मददगार कर दिया जाता है. 
कहने को हिदू बहु-संख्यक भारत में हैं मगर क्षमा करें धन लोभ और धर्म पाखण्ड ने उनको कायर बना रखा है, 10% मुसलमान  उन पर भारी है, तभी तो गाँव गाँव, शहर शहर मदरसे खुले हुए हैं जहाँ तालिबानी की तलब और अलक़ायदा के क़ायदे बच्चों को पढ़ाए जाते हैं. भारत में जहाँ एक ओर पाखंडियों, और लोभियों की खेती फल फूल रही है वहीं दूसरी और तालिबानियों और अलक़ायदयों की फ़सल तैयार हो रही है. 
सियासत दान देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने में बद मस्त हैं. 
क्या दुन्या के मान चित्र पर कभी कोई भारत था? क्या आज कहीं कोई भारत है? 
धर्म और मज़हब की अफ़ीम खाए हुए, लोभ और अमानवीय मूल्यों को मूल्य बनाए हुए क्या हम कहीं से देश भक्त भारतीय भी हैं? नक़ली नारे लगाते हुए, ढोंग का परिधान धारण किए हुए हम केवल स्वार्थी ''मैं'' हूँ. 
हम तो मलेशिया, इंडोनेशिया तक भारत थे, थाई लैंड, बर्मा, श्री लंका और काबुल कंधार तक भारत थे. कहाँ चला गया भारत? अगर यही हाल रहा तो पता नहीं कहाँ जाने वाला है भारत. भारत को भारत बनाना है तो अतीत को दफ़्न करके वर्तमान को संवारना होगा, धर्म और मज़हब की गलाज़त को कोडों से साफ़ करना होगा. मेहनत कश अवाम को भारत का हिस्सा देना होगा न कि गरीबी रेखा के पार रखना और कहते रहना की रूपिए का पंद्रह पैसा ही गरीबों तक पहुँच पाता है. 
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Tuesday, January 15, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 56


 मुहम्मदुर रसूलिल्लाह        
(मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं)  

मुहम्मद की फ़ितरत का अंदाज़ा क़ुरआनी आयतें निचोड़ कर निकाला जा सकता है कि वह किस क़द्र ज़ालिम ही नहीं कितने मूज़ी तअबा शख़्स थे. 
क़ुरआनी आयतें जो ख़ुद मुहम्मद ने वास्ते तिलावत बिल ख़ुसूस महफ़ूज़ कर दीं, 
इस एलान के साथ कि ये बरकत का सबब होंगी न कि इसे समझा जाए. 
अगर कोई समझने की कोशिश भी करता है तो उनका अल्लाह रोकता है 
कि ऐसी आयतें मुशतबह मुराद (संदिग्ध) हैं 
जिनका सही मतलब अल्लाह ही बेहतर जानता है. 
इसके बाद जो अदना (सरल) आयतें हैं और साफ़ साफ़ हैं 
वह अल्लाह के किरदार को बहुत ही ज़ालिम, जाबिर, 
बे रहम, मुन्तक़िम और चालबाज़ साबित करती है. 
अल्लाह इन अलामतों का ख़ुद एलान करता है कि अगर 
''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' (मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं) को मानने वाले न हुए तो 
अल्लाह इतना ज़ालिम और इतना क्रूर है कि इंसानी खालें जला जला कर उनको नई करता रहेगा, 
इंसान चीख़ता चिल्लाता रहेगा और तड़पता रहेगा मगर उसको मुआफ़ करने का उसके यहाँ कोई जवाज़ नहीं है, कोई सुनवाई नहीं है. 
मज़े की बात ये कि दोबारा उसे मौत भी नहीं है कि 
मरने के बाद नजात की कोई सूरत हो सके, 
उफ़! इतना ज़ालिम है मुहमदी अल्लाह? 
सिर्फ़ इस ज़रा सी बात पर कि उसने इस ज़िन्दगी में 
''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' क्यूं नहीं कहा. 
हज़ार नेकियाँ करे इंसान, 
क़ुरआन गवाह है कि सब हवा में ख़ाक की तरह उड़ जाएँगी, 
अगर बन्दे ने ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' नहीं कहा, 
क्यों कि हर अमल से पहले ईमान शर्त है 
और ईमान है ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' . 
इस क़ुरआन का ख़ालिक़ कौन है जिसको मुसलमान सरों पर रखते हैं ? 
मुसलमान अपनी नादानी और नादारी में यक़ीन करता है कि 
उसके अल्लाह की मर्ज़ी है, जैसा रख्खे. 
वह जिस दिन बेदार होकर क़ुरआन को ख़ुद पढ़ेगा तब समझेगा 
कि इसका ख़ालिक़ तो दग़ाबाज़ ख़ुद साख़्ता अल्लाह का बना हुवा रसूल मुहम्मद है. 
उस वक़्त मुसलमानों की दुन्या रौशन हो जाएगी.
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Monday, January 14, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 55


 नास्तिकता

खौ़फ़, लालच और अय्यारी ने God, अल्लाह या भगवान को जन्मा.
इनकी बुन्याद पर बड़े बड़े धर्म और मज़हब फले फूले, 
अय्यारों ने अवाम को ठगा. 
इन ठगों को धर्म ग़ुरु कहा जाता है. 
कभी कभी यह निःस्वार्थ होते हैं मगर इनके वारिस चेले यक़ीनन फित्तीन होते है.
कुछ हस्तियाँ इन से बग़ावत करके धर्मों की सीमा से बाहर निकल आती हैं , 
मगर वह काल्पनिक ख़ुदा के दायरे में ही रहती हैं, इन्हें संत और सूफ़ी कहा जाता है. 
संत और सूफ़ी कभी कभी मन को शांति देते है.
कभी कदार मै भी इन की महफ़िल में बैठ कर झूमने लगता हूँ. 
देखा गया है कि इनकी मजारें और मूर्तियाँ स्थापित हो जाती है 
और आस्था रूपी धंधा शुरू हो जाता है.
कुछ मानव मात्र इन से बेगाना होकर, मानव की ज़रूरतों को समझते हैं , 
उनके लिए ज़िंदगी को आसान बनाने का जतन किया, 
ऐसे महा पुरुष मूजिद (ईजाद करने वाला) और साइंस दां होते हैं . 
उन्हें नाम नमूद या दौलत की कोई चिंता नहीं, 
अपने धुन के पक्के, वर्षों सूरज की किरण भी नहीं देखते, 
अपना नाम भी भूल जाते हैं.
यह महान मानव संसाधनों के आविष्कारक होते हैं.
इनकी ही बख़्शी  हुई राहों पर चल कर दुन्या बरक़रार रहती है.
आधी दुन्या हवा के बुत God या अल्लाह को पूजती है, 
एक चौथाई दुन्या मिटटी पत्थर और धात की बनी मूर्तियाँ पूजती है, 
और एक चौथाई दुन्या ला मज़हब अथवा नास्तिक है. 
नास्तिकता भी एक धर्म है, 
निज़ाम ए हयात है 
या जीवन पद्धति कहा जाए. 
यह नवीन लाइफ़ स्टाइल है.
उपरोक्त धर्म और अर्ध धर्म हमें थपकियाँ देकर अतीत में सुलाए रहते हैं 
और साइंस दान भविष्य की चिंता में हमे जगाए रहते हैं. 
वास्तविकता को समझिए 
नास्तिकता को पहचानिए 
कि इसकी कोई पहचान नहीं.
यह मानव मात्र है.
***