Tuesday, November 20, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -2


मेरा इख़्तिसार (संक्षिप्त) 

ख़ुश हाल किसान का पोता और बदहाल मज़दूर का बेटा , 
मैं एक साधारण परिवार से हूँ .  
दस साल की उम्र तक स्कूल का मुंह नहीं देखा था, 
मामा ने मोहल्ले में जूनियर हाई स्कूल खोला , 
पांचवीं पास बच्चे उन्हें कक्षा 6 के लिए मिल गए , 
बाहर  बरांडे में मोहल्ले के अनपढ़ और लाख़ैरे बच्चे बैठने लगे, 
उनमें से एक भी था. 
पढ़ाई की ललक दिल में थी मामा ने मुझे समझा और 
कक्षा ६ में मुझे बैठने की इजाज़त दे दी .  
मुझे तालीम का सिरा मिल गया था, 
मैं दर्जा नौ में आते आते क्लास टॉप कर गया. 
और पांच साल में ही हाई स्कूल कर लिया . 
बदहाली ने आगे पढ़ने न दिया, 
पांच साल ग़ुरबत से लड़ने की नाकाम कोशिश की , 
उसके बाद तरक़्क़ी का सिरा मेरे हाथ लगा , 
पुवर फंड लेकर पढ़ने वाले तालिब इल्म ने लाखों रुपए इनकम टैक्स भरे .  
बड़ी ईमानदारी की रोज़ी कमाई . 
साठ साल की उम्र आते आते अपनी माली तरक़्क़ी से भी मेरा मन भर गया . 
मैं सोलह साल की नाबालिग़ उम्र तक मज़हबी रहा, 
उसके बाद मज़हब को मैंने अपनी आँखों से देखना शुरू किया , 
मैं ने पाया कि धर्म व् मज़हब में जितना झूट और फ़रेब है, उतना और कहीं नहीं . 
कारोबार से फ़ारिग़ होने के बाद मैंने अपना समय सच्चाई को पाने के 
लिए वक़्फ़ कर दिया,
सालों साल से दिल में जमा उदगार फटने लगा . 
मैं बीस साल से अपनी तहरीर से इंसानी ज़ेहन खोल रहा हूँ ,
जिसमें शेर व् शायरी भी एक माध्यम है . 
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