Thursday, January 31, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -68


 ख़ालिस काफ़िर          
ख़ालिस काफ़िर ले दे के भारत में या नेपाल में ही बाक़ी बचे हुए हैं. 
कुफ़्र और शिर्क इंसानी तहज़ीब की दो क़ीमती विरासतें है. 
इनके पास दुन्या की क़दीम तरीन किताबें हैं,  
जिन से इस्लाम ज़दा मुमालिक महरूम हो गए हैं. 
इनके पास बेश क़ीमती चारों वेद मौजूद हैं, 
जो कि मुख़्तलिफ़ चार इंसानी मसाइल का हल हुवा करते थे, 
इन्हीं वेदों की रौशनी में 18 पुराण हैं. 
माना कि ये मुबालिग़ा आराइयों से लबरेज़ है, 
मगर तमाज़त और ज़हानत के साथ, जिहालत से बहुत दूर हैं.  
इसके बाद इनकी शाख़ें 108 उप निषद मौजूद हैं, 
रामायण और महा भारत जैसी क़ीमती गाथाएँ, 
गीता जैसी सबक आमोज़ किताबें, अपनी असली हालत में मौजूद हैं. 
ये सारी किताबें तख़लीक़ हैं, तसव्वर की बुलंद परवाज़ें हैं, 
जिनको देख कर दिमाग़ हैरान हो जाता है. 
और अपनी धरोहर पर रश्क होता है. 
जब बड़ी बड़ी क़ौमों के पास कोई रस्मुल ख़त भी नहीं था, 
तब हमारे पुरखे ऐसे ग्रन्थ रचा करते थे. 

अरबों का कल्चर भी इसी तरह मालामाल था 
और कई बातों में वह आगे था, 
जिसे इस्लाम की आमद ने धो दिया. 
बढ़ते हुए कारवाँ की गाड़ियाँ बैक गेर में चली गई.
माज़ी में इंसानी दिमाग़ को रूहानी मरकज़ियत देने के लिए मफ़रूज़ा मअबूदों, 
देवी देवताओं और राक्षसों के किरदार उस वक़्त के इंसानों के लिए अलहाम ही थे. तहजीबें बेदार होती गईं और ज़ेहनों में बलूग़त आती गई, 
काफ़िर अपने ग्रंथो को एहतराम के साथ ताक़ पर रखते गए. 
ख़ुशी भरी हैरत होती है कि आज भी उनके वच्चे अपने पुरखों की रचनाओं को पौराणिक कथा के रूप में पहचानते हैं.
उनकी किताबें धार्मिक से पौराणिक हो गई हैं.

 क़ुरआन इन ग्रंथों के मुकाबले में अशरे-अशीर भी नहीं. 
ये कोई तख़लीक़ ही नहीं है बल्कि तख़लीक़ के लिए एक बद नुमा दाग़ है. 
मुसलमान इसकी पौराणिक कथा की जगह, 
मुल्लाओं की बखानी हुई पौराणिक हक़ीक़त की तरह जानते हैं 
और इन देव परी की कहानियों पर यक़ीन और अक़ीदा रखते है. 
यह मुसलमान कभी बालिग़ हो ही नहीं सकते. 
एक वक़्त इस्लामी इतिहास में ऐसा आ गया था कि इंगलिशतान 
अरबों के क़ब्ज़े में होने को था कि बच गया. 
इतिहास कर "वर्नियर" लिखता है 
"अगर कहीं ऐसा हो जाता तो आज आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पैग़ामबर मुहम्मद के फ़रमूदात पढ़ाए जा रहे होते."
अरब भी मुहम्मद को देखने और सुनने के बाद कहते थे कि 
"इसका क़ुरआन शायर के परेशान ख़यालों का पुलिंदा है" 
इस हक़ीक़त को जिस क़द्र जल्दी मुसलमान समझ लें, इनके हक़ में होगा .
एक ही हल है कि मुसलमान को तर्क-इस्लाम करके, 
अपने बुनयादी कल्चर को संभालते हुए मोमिन बन जाने की सलाह है. 
जिसकी तफ़सील हम बार बार अपने मज़ामीन में दोहराते है. 
कोई भी ग़ैर मुस्लिम नहीं चाहता कि  मुसलमान इस्लाम का दामन छोड़े. 
अरब तरके-इस्लाम करके बेदार हुए तो योरप और अमरीका 
के हाथों से तेल का ख़ज़ाना निकल जाएगा, 
भारत के मालदार लोगों के हाथों से नौकर चाकर, मजदूर, मित्री और एक बड़ा कन्ज़ियूमर तबक़ा सरक जाएगा. 
तिजारत और नौकरियों में दूसरे लोग कमज़ोर हो जाएँगे, 
गोया सभी चाहते है कि दुन्या की 20% आबादी सोलवीं सदी में अटकी रहे.  
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Wednesday, January 30, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -67


 अन्दर से फूटी हुई चाहत     
हर शै की तरह इंसानी ज़ेहन भी इर्तेकई मरहलों के हवाले रहता है 
जिसके तहत अभी इंसानी मुआशरे को ख़ुदा की ज़रुरत है. 
कुछ लोग बहुत ही सादा लौह होते हैं, 
उन्हें अपने वजूद के सुपुर्दगी में मज़ा आता है. 
जैसे की एक हिन्दू धर्म पत्नि अपने पति को ही देवता मान कर 
उसके चरणों में पड़ी रहने में राहत महसूस करती है. 
हमारे एक डाक्टर दोस्त हैं, जो बहुत ही सीधे सादे नेक दिल इंसान हैं, 
वह अपने हर काम का अंजाम ईश्वर की मर्ज़ी पर डाल के बहुत सुकून महसूस करते हैं, उनको देख कर बड़ा रश्क आता है कि वह मुझ से बेहतर ज़िंदगी ग़ुज़ारते हैं, 
कभी कभी अन्दर का कमज़ोर इंसान भटक कर कहता है कि 
किसी न किसी ख़ुदा को मान कर ही जीना चाहिए. 
किसी का क्या नुक़सान है कि कोई अपना ख़ुदा रख्खे. 
ये फ़ितरते इंसानी ही नहीं, बल्कि फ़ितरते हैवानी भी है. 
एक कुत्ता अपने मालिक के क़दमों पर लोट पोट कर कितना ख़ुश होता है. 
बहुत से हैवान इंसान की पनाह में रहक़र ही अमाँ पाते हैं. 
अपने पूज्य, अपने माबूद, अपने देव और अपने मालिक के तरफ़ 
ये क़दम इंसान या हैवान के दिल के अन्दर से फूटा हुवा जज़बा है, 
न कि इनके ऊपर लादा गया लदान. 
ये किसी ख़ारजी तहरीक या तबलीग़ का नतीजा नहीं, 
इसके पीछे कोई डर, खौ़फ़ नहीं, कोई लालच या सियासत नहीं है. 
इसको मनवाने के लिए कोई क़ुरआनी अल्लाह की आयतें नहीं 
जिसके एक हाथ में दोज़ख़ की आग और दूसरे हाथ में जन्नत का ग़ुलदस्ता रहता है. 
अन्दर से फूटी हुई ये चाहत क़ुरआनी अल्लाह की तरह हमारे वजूद की घेरा बंदी नहीं करतीं. आपका ख़ुदा  किसी को मुतास्सिर न करे, शौक से पूजिए 
जब तक कि आप अपने सिने बलूग़त में न आ जाएं, 
आप की समझ में ज़िंदगी के राज़ ओ नयाज़ न झलकें. 
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Tuesday, January 29, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -66


मुज़ब्ज़ब मुसलमान       
भारत के मुस्तक़बिल क़रीब में मुसलमानों की हैसियत बहुत ही तशवीश नाक होने का अंदेशा है. अभी फ़िलहाल जो रवादारी बराए जम्हूरियत बरक़रार है, 
बहुत दिन चलने वाली नहीं. इनकी हैसियत बरक़रार रखने में वह हस्तियाँ है जिनको इस्लाम मुसलमान मानता ही नहीं और उन पर मुल्ला फ़तवे की तीर चलाते रहते हैं. 
उनमे मिसाल के तौर पर डा. ए पी. जे अब्दुल  कलाम, 
तिजारत में अज़ीम प्रेम जी, सिप्ला के हमीद साहब वग़ैरह, 
फ़िल्मी  दुन्या के दिलीप कुमार, आमिर ख़ान, शबाना आज़मी. और ए. आर. रहमान, फ़नकारों में जो अब नहीं रहे, फ़िदा हुसैन, बिमिल्ला ख़ान जैसे कुछ लोग हैं. 
आम आदमियों में सैनिक अब्दुल हमीद जैसी कुछ फ़ौजी हस्तियाँ भी हैं 
जो इस्लाम को फूटी आँख भी नहीं भाते. 
मैंने अपने कालेज को एक क्लास रूम बनवा कर दिया तो कुछ इस्लाम ज़दा कहने लगे की यही पैसा किसी मस्जिद की तामीर में लगाते तो क्या बात थी, 
वहीं उस कालेज के एक टीचर ने कहा तुमने मुसलमानों को सुर्ख़रू कर दिया, 
अब हम भी सर उठा कर बातें कर सकते है.
कौन है जो सेंध लगा रहा है आम मुसलमानों के हुकूक़ पर?
कि सरकार को सोचना पड़ता है कि इनको मुलाज़मत दें या न दें?
आर्मी को सोचना पड़ता है कि इनको कैसे परखा जाय?
कंपनियों को तलाश करना पड़ता कि इनमें कोई जदीद तालीम का बंदा है भी?
बनिए और बरहमन की मुलाज़मत को इनके नाम से एलर्जी है.
इसकी वजेह इस्लाम है और इसके ग़द्दार एजेंट जो तालिबानी ज़ेहन्यत रखते हैं.
यह भी हमारी ग़लतियों से ख़ता के शिकार हैं. 
हमारी ग़लती ये है कि हम भारत में मदरसों को फलने फूलने का अवसर दिए हुए है जहाँ वही पढ़ाया जाता है जो क़ुरआन में है.
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Monday, January 28, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -65


 महा मानव         
मैं अपने नज़रयाती मुआमले में कुछ में कठोर हूँ, 
इसके बावजूद मेरी आँखों में आँसू उस वक़्त ज़रूर छलक जाते हैं 
जब मैं स्टेज पर इंसानियत को सुर्ख़रू होते हुए देखता हूँ, 
मसलन हिन्दू -मुस्लिम दोस्ती की नज़ीर हो, 
या फिर फ़र्ज़ के सवाल पर इंसानियत के लिए मौत को मुँह जाना. 
मेरे लम्हात में ऐसे पल भी आते हैं कि विदा होती हुई बेटी को 
जब माँ लिपटा कर रोती है तो मेरे आँसू नहीं रुकते, 
गोकि मैंने अपनी बेटियों को क़ह्क़हों के साथ रुख़सत किया. 
इंसान की मामूली भूल चूक को भी मैं नज़र अंदाज़ कर देता हूँ. 
क्यूंकि उम्र के आगो़श में बहुत सी लग़ज़िशें हो जाती हैं. 
मैं कि एक अदना सा इंसान, समझ नहीं पाता कि लोग छोटी छोटी और 
बड़ी बड़ी मान्यताएँ क्यूँ गढ़े हुए हैं और इन साँचों में क्यूँ ढले हुए है 
जब कि क़ुदरत उनका मार्ग  दर्शन हर मोड़ पर कर रही है.
बड़ी मान्यताओं में अल्लाह, ईश्वर और गाड वग़ैरा की मान्यताएँ हैं. 
अगर वह इनमें से कोई होता तो यक़ीनी तौर पर इंसान को छोड़ कर 
हर जीव किसी न किसी तरह से उसकी उपासना करता. 
हर जीव पेट भरने के बाद उमंग, तरंग और मिलन की राह पर चल पड़ता है, 
न कि क़ुदरत की उपासना की तरफ़. 
क़ुदरत का ये इशारा भी इंसान को जीने की राह दिखलाता है 
जिसे उल्टा ये अशरफ़ुल मख़लूक़ात तअने के तौर पर उलटी बात ही करता है - - - 
इंसान हो या हैवान?
अगर इन छोटी बड़ी मान्यताओं और क़दरों से इंसान मुक्त हो जाय 
तो वह मानव से महा मानव बन सकता है, 
जिस दिन इंसान महा मानव बन जायगा ये धरती जन्नत नुमा बन जायगी.
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Friday, January 25, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -64


तजावुज़ और जुमूद          
मैं इस्लाम का आम जानकर हूँ , इसका आलिम  फ़ाज़िल नहीं. 
इस की गहराइयों में जाकर देखा तो इसका मुंकिर हो गया, 
सिने बलूग़त में आकर जब इस पर नज़रे-सानी किया तो जाना कि 
इसमें तो कोई गहराई ही नहीं है. 
लिहाज़ा इसके अंबारी लिटरेचर से सर को बोझिल करना मुनासिब नहीं समझा.
 जिन पर नज़र गई तो पाया कि कालिमा ए हक़ के नाहक़ जवाज़ थे. 
हो सकता है कि कहीं पर मेरी अधूरी जानकारी दर पेश आ जाए 
मगर मेरी तहरीक में इसकी कोई अहमियत नहीं है, 
क्यूँ कि इनकी बहसें बाहमी इख़्तलाफ़ और तजावुज़ व जुमूद  के दरमियान हैं. 
टोपी लगा कर नमाज़ पढ़ी जाए, बग़ैर टोपी पहने भी नमाज़ जायज़ है - - ,  
ये इनके मौज़ूअ हुवा करते हैं. 
मेरा सवाल है नमाज़ पढ़ते ही क्यूँ हो? 
मेरा मिशन है मुसलमानों को इस्लामी नज़र बंदी से नजात दिलाना
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Thursday, January 24, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -63

जो सत्य नहीं वह मिथ्य है          
क़ुदरत ने ये भूगोल रूपी इमारत को वजूद में लाने का जब इरादा किया 
तो सब से पहले इसकी बुनियाद "सच और ख़ैर" की कंक्रीट से भरी. 
फिर इसे अधूरा छोड़ कर आगे बढ़ती हुई मुस्कुराई कि 
मुकम्मल इसको हमारी रख्खी हुई बुनियाद करेगी. 
वह आगे बढ़ गई कि उसको कायनात में अभी बहुत से भूगोल बनाने हैं. 
उसकी कायनात इतनी बड़ी है कि कोई बशर अगर लाखों रौशनी साल 
(light years ) की उम्र भी पाए तब भी उसकी कायनात के फ़ासले को 
किसी विमान से तय नहीं कर सकता, 
तय कर पाना तो दूर की बात है, 
अपनी उम्र को फ़ासले के तसव्वुर में सर्फ़ करदे 
तो भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाएगा  .
क़ुदरत तो आगे बढ़ गई इन दो वारिसों "सच और ख़ैर" के हवाले करके 
इस भूगोल को कि यही इसे बरक़रार रखेंगे जब तक ये चाहें. 
भूगोल की तरह ही क़ुदरत ने हर चीज़ को गोल मटोल पैदा किया  
कि ख़ैर के साथ पैदा होने वाली सादाक़त ही इसको जो रंग देना चाहे दे. 
क़ुदरत ने पेड़ को गोल मटोल बनाया कि इंसान की 
"सच और ख़ैर" की तामीरी अक़्ल इसे फर्नीचर बना लेगी, 
उसने पेड़ों में बीजों की जगह फर्नीचर नहीं लटकाए. 
ये ख़ैर का जूनून है कि वह क़ुदरत की उपज को इंसानों के लिए 
उसकी ज़रुरत के तहत लकड़ी की शक्ल बदले.
तमाम ईजादें ख़ैर (परोकार) का जज़्बा ही हैं कि आज इंसानी जिंदगी 
कायनात के दूसरे सय्यारों तक पहुँच गई है, 
ये जज़्बा ही एक दिन इंसानों को ही नहीं बल्कि हैवानों को भी उनके हुक़ूक़ दिलाएगा.
जो सत्य नहीं वह मिथ्य है. 
दुन्या हर तथा कथित धर्म अपने कर्म कांड और आडम्बर के साथ मिथ्य हैं  इससे मुक्ति पाने के बाद ही क़ुदरत का धर्म अपने शिखर पर आ जाएगा और ज़मीन पाक हो जाएगी.
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Wednesday, January 23, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -62

 क़ाबिले-जुर्म आस्थाएँ        
जिस तरह आप कभी कभी ख़ुदाए बरतर की ज़ात में ग़र्क़ होकर 
कुछ जानने की कोशिश करते हैं, 
इसी तरह कभी मुहम्मद की ज़ात में ग़र्क़ होकर कुछ तलाश करने की कोशिश करें. अभी तक बहैसियत मुसलमान उनकी ज़ात में जो पाया है, 
शऊरी तौर पर देखा जाए तो वह सब दूसरों के मार्फ़त है.  
इनके क़ुरआन और इनकी हदीस में ही सब कुछ उजागर है. 
आपके लिए मुहम्मद की पैरवी कल भी ज़हर थी और आज भी ज़हर है. 
इंसानियत की अदालत में आज सदियों बाद भी इन पर मुक़दमा चलाया जा सकता है, जिसमे बहेस मुबाहिसे के लिए मुहज्ज़ब समाज के दानिशवरों को दावत दी जाय.
 इनका फ़ैसला यही होगा की इस्लाम और क़ुरआन पर यक़ीन रखना 
क़ाबिले जुर्म अमल होगा.
आज न सही एक दिन ज़रूर ऐसा वक़्त आएगा कि मज़हबी ज़ेहन रखने वाले 
तमाम मजहबों के अनुयाइयों को सज़ा भुगतना होगा 
जिसमे पेश पेश होंगे मुसलमान.
धर्म व् मज़हब द्वारा निर्मित ख़ुदा और भगवान दुर्गन्ध भरे झूट हैं, 
इसके विरोध में सच्चाई सुबूत लिए खड़ी है. 
मानव समाज अभी पूर्णतया बालिग़ नहीं हुवा है, 
यह अभी अर्ध विकसित है, 
इसी लिए झूट का बोल बाला है और सत्य का मुँह काला है. 
जब तक ये उलटी बयार बहती रहेगी, 
मानव समाज सच्ची खुशियों से बंचित रहेगा.   
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Monday, January 21, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -61


ना आक़बत अन्देश का ज़हरीला ये पैग़ाम         
  
*यहूदियों का ख़ुदा यहुवा हमेशा यहूदियों पर मेहरबान रहता है, 
गाड एक बाप की तरह हमेशा अपने ईसाई बेटों को मुआफ़ किए रहता है, 
ज़्यादह तर धार्मिक भगवान दयालु होते हैं, 
बस की एक मुसलमानों का अल्लाह है जो उन पर पैनी नज़र रखता है. 
वोह बार बार इन्हें धमकियाँ दिए रहता है. 
हर वक़्त याद दिलाता रहता है कि वह बड़ा अज़ाब देने वाला है. 
सख़्त बदला लेने वाला है. 
चाल चलने वाला वाला है. 
गर्दन दबोचने वाला है. क़हर ढाने वाला है. 
वह मुसलमानों को हर वक़्त डराए रहता है. 
उसे डरपोक बन्दे पसंद हैं, 
बसूरत दीगर उसकी राह में जेहादी उसकी पहली पसंद हैं.. 
वोह मुसलमानों को महदूद होकर जीने की सलाह देता है, 
जिस की वजह से हिदुस्तानी मुसलमान कशमकश की ज़िन्दगी जीने पर मजबूर हैं. 
इन्हें मुल्क में मशकूक नज़रों से देखा जाए तो क्यूँ न देखा जाए ? 
देखिए अल्लाह कहता है - - -
''मुसलमानों को चाहिए कुफ्फारों को दोस्त न बनाएं, मुसलमानों से तजाउज़ करके जो शख़्स ऐसा करेगा, वह शख़्स  अल्लाह के साथ किसी शुमार में नहीं मगर अल्लाह तुम्हें अपनी ज़ात से डराता है." 
सूरह आले इमरान 3  आयत (28)
इस क़ुरआनी आयात को सुनने के बाद भारत की काफ़िर हिन्दू अक्सरीयत आबादी मुस्लिम अवाम को दोस्त कैसे बना सकती है? 
ऐसी क़ुरआनी आयतों के पैरोकारों को हिन्दू अपना दुश्मन मानें तो क्यूँ न मानें? दुन्या के तमाम ग़ैर मुस्लिम मुमालिक में बसे हुए मुसलमानों के साथ किस दर्जा ना आक़बत अन्देशाना और ज़हरीला ये पैग़ाम है इसलाम का. 
मुस्लिम ख़वास और मज़हबी रहनुमा कहते हैं कि उनके बुजुर्गों ने पाकिस्तान न जाकर हिंदुस्तान जैसे सैकुलर मुल्क में रहना पसंद किया, इस लिए उन्हें सैकुलर हुक़ूक़ मिलने चाहिएं. सैकुलरटी की बरकतों के दावे दार ये लोग सैकुलर भी हैं और ऐसी आयात वाली क़ुरआन के पुजारी भी. 
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Saturday, January 19, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -60


 मुनाफ़िक़-ए-इंसानियत

मुसलमानों में दो तबके तअलीम याफ़्ता कहलाते हैं, 
पहले वह जो मदरसे से फ़ारिग़ुल तअलीम हुवा करते हैं और 
समाज को दीन की रौशनी (दर अस्ल अंधकार) में डुबोए रहते हैं, 
दूसरे वह जो इल्म जदीद पाकर अपनी दुन्या संवारने में मसरूफ़ हो जाते हैं. 
मैं यहाँ दूसरे तबक़े को ज़ेरे-बहस लाना चाहूँगा. 
इनमें जूनियर क्लास के टीचर से लेकर यूनिवर्सिटीज़ के प्रोफ़सर्स तक और इनसे भी आगे डाक्टर, इंजीनियर और साइंटिस्ट तक होते हैं. 
इब्तेदाई तअलीम में इन्हें हर विषय से वाक़िफ़ कराया जाता है 
जिस से इनको ज़मीनी हक़ीक़तों की जुग़राफ़ियाई और साइंसी मालूमात होती है. 
ज़ाहिर है इन्हें तालिब इल्मी दौर में बतलाया जाता है कि 
यह ज़मीन फैलाई हुई चिपटी रोटी की तरह नहीं बल्कि गोल है. 
ये अपनी मदार पर घूमती रहती है, न कि साक़ित है. 
सूरज इसके गिर्द तवाफ़ नहीं करता बल्कि ये सूरज के गिर्द तवाफ़ करती है. 
दिन आकर सूरज को रौशन नहीं करता बल्कि 
इसके सूरज के सामने आने पर दिन हो जाता है. 
आसमान कोई बग़ैर ख़म्बे वाली छत नहीं बल्कि 
ला महदूद है और इंसान की हद्दे नज़र है. 
इनको लैब में ले जाकर इन बातों को साबित कर के समझाया जाता है 
ताकि इनके दिमाग़ से धर्म और मज़हब के अंध विश्वास ख़त्म हो जाएँ.
इल्म की इन सच्चाइयों को जान लेने के बाद भी यह लोग जब 
अपने मज़हबी जाहिल समाज का सामना करते हैं तो इन के असर में आ जाते हैं. 
चिपटी ज़मीन और बग़ैर ख़म्बे की छतों वाले वाले आसमान की झूटी आयतों को कठ मुल्लों के पीछे नियत बाँध कर क़ुरआनी झूट को ओढ़ने बिछाने लगते हैं. 
सानेहा ये है कि यही हज़रात अपने क्लास रूम में पहुँच कर 
फिर साइंटिस्ट सच्चाइयां पढ़ाने लगते हैं. 
ऐसे लोगों को मुनाफ़िक़ कहा गया है, 
यह तबका मुसलमानों का उस तबक़े से जो ओलिमा कहे जाते हैं, 
दस ग़ुना क़ौम का मुजरिम है. 
सिर्फ़ ये लोग अपनी पाई हुई तअलीम का हक़ अदा करें तो 
सीधी-सादी अवाम बेदार हो सकती है. 
मुनाफ़िक़ ने हमेशा इंसानियत को नुक़सान पहुँचाया है.
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Friday, January 18, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -59


बारीक बीन अँधा   
         
मुसलमानों! 
अल्लाह तअला न बारीक बीन है न बाख़बर, 
न वह बनिए की तरह है कि सब का हिसाब किताब रखता है, 
वह अगर है तो एक निज़ाम बना कर क़ुदरत के हवाले कर दिया है, 
अगर नहीं है तो भी क़ुदरत का निज़ाम ही कायनात में लागू है. 
हर अच्छे बुरे का अंजाम मुअय्यन है, 
इस ज़मीन की रफ़्तार अरबों बरस से मुक़र्रर है कि है कि 
वह एक मिनट के देर के बिना साल में एक बार अपनी धुरी पर 
अपना चक्कर पूरा करती है. 
क़ुदरत गूँगी, बहरी है और अंधी है 
उससे निपटने के लिए इंसान हर वक़्त उसके मद्दे मुक़ाबिल रहता है. 
अगर वह मुक़ाबिला न करता होता तो अपना वजूद गवां बैठता, 
आज जानवरों की तरह सर्दी, गर्मी और बरसात की मार झेलता होता, 
बड़ी बड़ी इमारतों में ए सी में न बैठा होता.
मुसलमान उसका मुक़ाबिला नहीं करता बल्कि उसको पूजता है, 
यही वजेह है कि वह ज़वाल पज़ीर है.
***

Thursday, January 17, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 58


 सिर्फ़ इंसानियत. 
पाकिस्तान अपने आप में एक क़ैद ख़ाना बन गया है 
और हर पाकिस्तानी उम्र क़ैद की सज़ा पाने वाला एक क़ैदी है. 
जहाँ पर क़ैदियों की ज़रा सी ज़बानी लग़ज़िश भी ख़ताए-अज़ीम होती है.
एक ईसाई बच्ची को इस बात पर सज़ा दे दी गई 
कि वह इस्लामी शरीअत की समझ नहीं रखती थी.
बुत शिकन मुसलमान हर ख़ाम माल के बने बुतों को तोड़ने में 
बहादुरी की पहचान रखते हैं, 
मगर वही  मुसलमान हवा के बने बुत अल्लाह से, उनकी हवा खिसकती है. 
ख़ुद तो ख़ुद किसी दूसरे के लिए भी वह साहिबे ईमान होते हैं, 
क्यूँ कि उस से भी हवा के बुत की बुराई उन्हें बर्दाश्त नहीं.
वह एक तरफ़ कहते है अल्लाह सब का है मगर दूसरी तरफ़ बन्दा 
जब अपने अल्लाह पर एहतेजाज करता है तो वह 
उससे अपने थमाए हुए अल्लाह को छीन लेता हैं.
ऐसा मुल्क जहाँ आज इक्कीसवीं सदी में इंसान को इतना 
अख़्तियार नहीं कि वह अपने ख़ालिक़ की तख़लीक़ है, 
वह अपने बाप को कुछ भी कह सकता है अगर उसकी हक़ तलफ़ी हो रही हो.
दूसरी तरफ़ इनके ज़ेहनी दीवालिया पन देखिए कि 
"मिस्टर 10% के दलाल" कहे जाने वाले ज़रदारी को अपने सर पर बिठाए हुए हैं . इनकी जिहादी फ़ौज अब भारत के हाथों रुसवा होने की बजाए 
पूरी दुन्या के हाथों ज़िल्लत उठाएगी. 
छींक आने पर नाक काटने वाले शरीअत के शैदाई नई 
क़द्रों के सामने नाक रगड़ेंगे मगर इनके ग़ुनाहों की सज़ा कम न होगी. 
अब वह वक़्त ज्यादः दूर नहीं कि इंसान का मज़हब इंसानियत होगा, 
सिर्फ़ इंसानियत. 
***

Wednesday, January 16, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 57


क़ौम का दोहरा चरित्र 

कितनी बड़ी विडंबना है कि एक तरफ़ तो हम नफ़रत का पाठ पढ़ाने वालों को सम्मान देकर सर आँखों पर बिठाते हैं, उनकी मदद सरकारी कोष से करते हैं, 
उनके हक़ में हमारा कानून भी है, मगर जब उनके पढ़े पाठों का रद्दे अमल होता है तो उनको अपराधी ठहराते हैं. ये हमारे मुल्क और क़ौम का दोहरा मेयार है. 
धर्म अड्डों, धर्म ग़ुरुओं को खुली छूट कि वोह किसी भी अधर्मी और विधर्मी को एलान्या गालियाँ देता रहे भले ही सामने वाला विशुद्ध मानव मात्र हो या योग्य कर्मठ पुरुष हो अथवा चिन्तक नास्तिक हो. 
इनको कोई अधिकार नहीं की यह अपनी मान हानि का दावा कर सकें. 
मगर उन मठाधिकारियों को अपने छल बल के साथ न्याय का संरक्षण मिला हुवा है. 
ऐसे संगठन, और संसथान धर्म के नाम पर लाखों के वारे न्यारे करते हैं, 
अय्याशियों के अड्डे होते हैं और अपने स्वार्थ के लिए देश को खोखला करते हैं. 
इन्हीं के साथ साथ हमारे मुल्क में एक क़ौम  है मुसलमानों की जिसको दुनयावी दौलत से ज़्यादः आसमानी दौलत की चाह है. यह बात उन के दिलो दिमाग़ में सदियों से इस्लामी ओलिमा (धर्म ग़ुरु) भर रहे हैं, जिनका ज़रीआ मुआश (भरण-पोषण) इस्लाम प्रचार है. 
हिंदुत्व की तरह ये भी हैं. मगर इनका पुख़्ता  माफ़िया बना हुवा है. 
इनकी भेड़ें न सर उठा सकती हैं न कोई इन्हें चुरा सकता है. 
बाग़ियों को फ़तवा की तौक़ पहना कर बेयारो-मददगार कर दिया जाता है. 
कहने को हिदू बहु-संख्यक भारत में हैं मगर क्षमा करें धन लोभ और धर्म पाखण्ड ने उनको कायर बना रखा है, 10% मुसलमान  उन पर भारी है, तभी तो गाँव गाँव, शहर शहर मदरसे खुले हुए हैं जहाँ तालिबानी की तलब और अलक़ायदा के क़ायदे बच्चों को पढ़ाए जाते हैं. भारत में जहाँ एक ओर पाखंडियों, और लोभियों की खेती फल फूल रही है वहीं दूसरी और तालिबानियों और अलक़ायदयों की फ़सल तैयार हो रही है. 
सियासत दान देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने में बद मस्त हैं. 
क्या दुन्या के मान चित्र पर कभी कोई भारत था? क्या आज कहीं कोई भारत है? 
धर्म और मज़हब की अफ़ीम खाए हुए, लोभ और अमानवीय मूल्यों को मूल्य बनाए हुए क्या हम कहीं से देश भक्त भारतीय भी हैं? नक़ली नारे लगाते हुए, ढोंग का परिधान धारण किए हुए हम केवल स्वार्थी ''मैं'' हूँ. 
हम तो मलेशिया, इंडोनेशिया तक भारत थे, थाई लैंड, बर्मा, श्री लंका और काबुल कंधार तक भारत थे. कहाँ चला गया भारत? अगर यही हाल रहा तो पता नहीं कहाँ जाने वाला है भारत. भारत को भारत बनाना है तो अतीत को दफ़्न करके वर्तमान को संवारना होगा, धर्म और मज़हब की गलाज़त को कोडों से साफ़ करना होगा. मेहनत कश अवाम को भारत का हिस्सा देना होगा न कि गरीबी रेखा के पार रखना और कहते रहना की रूपिए का पंद्रह पैसा ही गरीबों तक पहुँच पाता है. 
***

Tuesday, January 15, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 56


 मुहम्मदुर रसूलिल्लाह        
(मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं)  

मुहम्मद की फ़ितरत का अंदाज़ा क़ुरआनी आयतें निचोड़ कर निकाला जा सकता है कि वह किस क़द्र ज़ालिम ही नहीं कितने मूज़ी तअबा शख़्स थे. 
क़ुरआनी आयतें जो ख़ुद मुहम्मद ने वास्ते तिलावत बिल ख़ुसूस महफ़ूज़ कर दीं, 
इस एलान के साथ कि ये बरकत का सबब होंगी न कि इसे समझा जाए. 
अगर कोई समझने की कोशिश भी करता है तो उनका अल्लाह रोकता है 
कि ऐसी आयतें मुशतबह मुराद (संदिग्ध) हैं 
जिनका सही मतलब अल्लाह ही बेहतर जानता है. 
इसके बाद जो अदना (सरल) आयतें हैं और साफ़ साफ़ हैं 
वह अल्लाह के किरदार को बहुत ही ज़ालिम, जाबिर, 
बे रहम, मुन्तक़िम और चालबाज़ साबित करती है. 
अल्लाह इन अलामतों का ख़ुद एलान करता है कि अगर 
''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' (मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं) को मानने वाले न हुए तो 
अल्लाह इतना ज़ालिम और इतना क्रूर है कि इंसानी खालें जला जला कर उनको नई करता रहेगा, 
इंसान चीख़ता चिल्लाता रहेगा और तड़पता रहेगा मगर उसको मुआफ़ करने का उसके यहाँ कोई जवाज़ नहीं है, कोई सुनवाई नहीं है. 
मज़े की बात ये कि दोबारा उसे मौत भी नहीं है कि 
मरने के बाद नजात की कोई सूरत हो सके, 
उफ़! इतना ज़ालिम है मुहमदी अल्लाह? 
सिर्फ़ इस ज़रा सी बात पर कि उसने इस ज़िन्दगी में 
''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' क्यूं नहीं कहा. 
हज़ार नेकियाँ करे इंसान, 
क़ुरआन गवाह है कि सब हवा में ख़ाक की तरह उड़ जाएँगी, 
अगर बन्दे ने ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' नहीं कहा, 
क्यों कि हर अमल से पहले ईमान शर्त है 
और ईमान है ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' . 
इस क़ुरआन का ख़ालिक़ कौन है जिसको मुसलमान सरों पर रखते हैं ? 
मुसलमान अपनी नादानी और नादारी में यक़ीन करता है कि 
उसके अल्लाह की मर्ज़ी है, जैसा रख्खे. 
वह जिस दिन बेदार होकर क़ुरआन को ख़ुद पढ़ेगा तब समझेगा 
कि इसका ख़ालिक़ तो दग़ाबाज़ ख़ुद साख़्ता अल्लाह का बना हुवा रसूल मुहम्मद है. 
उस वक़्त मुसलमानों की दुन्या रौशन हो जाएगी.
***

Monday, January 14, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 55


 नास्तिकता

खौ़फ़, लालच और अय्यारी ने God, अल्लाह या भगवान को जन्मा.
इनकी बुन्याद पर बड़े बड़े धर्म और मज़हब फले फूले, 
अय्यारों ने अवाम को ठगा. 
इन ठगों को धर्म ग़ुरु कहा जाता है. 
कभी कभी यह निःस्वार्थ होते हैं मगर इनके वारिस चेले यक़ीनन फित्तीन होते है.
कुछ हस्तियाँ इन से बग़ावत करके धर्मों की सीमा से बाहर निकल आती हैं , 
मगर वह काल्पनिक ख़ुदा के दायरे में ही रहती हैं, इन्हें संत और सूफ़ी कहा जाता है. 
संत और सूफ़ी कभी कभी मन को शांति देते है.
कभी कदार मै भी इन की महफ़िल में बैठ कर झूमने लगता हूँ. 
देखा गया है कि इनकी मजारें और मूर्तियाँ स्थापित हो जाती है 
और आस्था रूपी धंधा शुरू हो जाता है.
कुछ मानव मात्र इन से बेगाना होकर, मानव की ज़रूरतों को समझते हैं , 
उनके लिए ज़िंदगी को आसान बनाने का जतन किया, 
ऐसे महा पुरुष मूजिद (ईजाद करने वाला) और साइंस दां होते हैं . 
उन्हें नाम नमूद या दौलत की कोई चिंता नहीं, 
अपने धुन के पक्के, वर्षों सूरज की किरण भी नहीं देखते, 
अपना नाम भी भूल जाते हैं.
यह महान मानव संसाधनों के आविष्कारक होते हैं.
इनकी ही बख़्शी  हुई राहों पर चल कर दुन्या बरक़रार रहती है.
आधी दुन्या हवा के बुत God या अल्लाह को पूजती है, 
एक चौथाई दुन्या मिटटी पत्थर और धात की बनी मूर्तियाँ पूजती है, 
और एक चौथाई दुन्या ला मज़हब अथवा नास्तिक है. 
नास्तिकता भी एक धर्म है, 
निज़ाम ए हयात है 
या जीवन पद्धति कहा जाए. 
यह नवीन लाइफ़ स्टाइल है.
उपरोक्त धर्म और अर्ध धर्म हमें थपकियाँ देकर अतीत में सुलाए रहते हैं 
और साइंस दान भविष्य की चिंता में हमे जगाए रहते हैं. 
वास्तविकता को समझिए 
नास्तिकता को पहचानिए 
कि इसकी कोई पहचान नहीं.
यह मानव मात्र है.
***

Saturday, January 12, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 54


 अंडे में इनक़्लाब

इंसानी ज़ेहन जग चुका है और बालिग़ हो चुका है. 
इस सिने बलूग़त की हवा शायद ही आज किसी टापू तक भले न पहुँची हो, 
रौशनी तो पहुँच ही चुकी है, 
यह बात दीगर है कि नस्ल-इंसानी चूज़े की शक्ल बनी हुई 
अन्डे के भीतर बेचैन कुलबुलाते हुए, अंडे के दरकने का इन्तेज़ार कर रही है. 
मुल्कों के हुक्मरानों ने हुक्मरानी के लिए सत्ता के नए नए चोले गढ़ लिए हैं. 
कहीं पर दुन्या पर एकाधिकार के लिए सिकंदारी चोला है 
तो कहीं पर मसावात का छलावा. 
धरती के पसमांदा टुकड़े बड़ों के पिछ लग्गू बने हुए है. 
हमारे मुल्क भारत में तो कहना ही क्या है! 
क़ानूनी किताबें, जम्हूरी हुक़ूक़, मज़हबी जूनून, धार्मिक आस्थाएँ, 
आर्थिक लूट की छूट एक दूसरे को मुँह बिरा रही हैं. 
90% अन्याय का शिकार जनता अन्डे में क़ैद बाहर निकलने को बेक़रार है, 
10% मुर्गियां इसको सेते रहने का आडम्बर करने से अघा ही नहीं रही हैं. 
गरीबों की मशक़्क़त ज़हीन बनियों के ऐश आराम के काम आ रही है, 
भूखे नंगे आदि वासियों के पुरखों के लाशों के साथ दफ़न दौलत 
बड़ी बड़ी कंपनियों के जेब में भरी जा रही है और अंततः 
ब्लेक मनी होकर स्विज़र लैंड के हवाले हो रही है. 
हजारों डमी कंपनियाँ जनता का पैसा बटोर कर चम्पत हो जाती हैं. 
किसी का कुछ नहीं बिगड़ता. 
लुटी हुई जनता की आवाज़ हमें ग़ैर कानूनी लग रही हैं 
और मुट्ठी भर सियासत दानों, पूँजी पतियों, धार्मिक धंधे बाजों 
और समाज दुश्मनों की बातें विधिवत बन चुकी हैं. 
कुछ लोगों का मानना है कि आज़ादी हमें नपुंसक संसाधनों से मिली, 
जिसका नाम अहिंसा है. 
सच पूछिए तो आज़ादी भारत भूमि को मिली, भारत वासियों को नहीं. 
कुछ सांडों को आज़ादी मिली है और गऊ माता को नहीं. 
जनता जनार्दन को इससे बहलाया गया है. 
इंक़्लाब तो बंदूक की नोक से ही आता है, अब मानना ही पड़ेगा, 
वर्ना यह सांड फूलते फलते रहेंगे. 
स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वह चीन गए थे वहां उन्हों ने देखा कि हर बच्चा ग़ुलाब के फूल जैसा सुर्ख़ और चुस्त है. जहाँ बच्चे ऐसे हो रहे हों वहां जवान ठीक ही होंगे. कहते है चीन में रिश्वत लेने वाले को, रिश्वत देने वाले को 
और बिचौलिए को एक साथ गोली मारदी जाती है. 
भारत में गोली किसी को नहीं मारी जाती, चाहे वह रिश्वत में भारत को ही लगादे. दलितों, आदि वासियों, पिछड़ों, गरीबों और सर्व हारा से अब सेना निपटेगी. 
नक्सलाईट का नाम देकर 90% भारत वासियों का सामना भारतीय फ़ौज करेगी, कहीं ऐसा न हो कि इन 10% लोगों को फ़ौज के सामने जवाब देह होना पड़े 
कि इन सर्व हारा की हत्याएं हमारे जवानों से क्यूं कराई गईं? 
और हमारे जवानों का ख़ून इन मजलूमों से क्यूं कराया गया? 
मज़लूम  जिन अण्डों में हैं उनके दरकने के आसार भी ख़त्म हो चुके हैं. 
कोई चमत्कार ही उनको बचा सकता है.  
***

Thursday, January 10, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 53


आदमी को मयस्सर नहीं इंसाँ होना

कोई ताक़त तो है जो संसार को संचालित करती है, 
वह भी इस बारीकी के साथ कि यह धरती अपनी धुरी पर वर्षों से क्षण भर के अंतर बिना चक्कर लगा रही है. 
इस अनबूझी ताक़त का नाम कल्पित रख लिया जाता है, 
चाहे वह अकेला हो या कोई समूह में. 
यहाँ तक तो बात ठीक ही लगती है कि इस पहेली का कोई हल मिला, 
अब इस पर माथा पच्ची ख़त्म हो. 
यह कल्पित प्राणी जब पूज्य बन जाता है, माबूद बन जाता है, अल्लाह बन जाता है, 
या भगवानो का रूप तो झगड़ा वहीं से शुरू हो जाता है. 
किस महा पुरुष ने बतलाया कि वह ताक़त अल्लाह है? 
मुहम्मद ने, 
जो कल्पित अल्लाह के क़ानून क़ायदे तय करते हैं. 
ख़ुद बयक वक़्त नौ पत्नियाँ और 26 लौंडियों के अकेले उप भोगता होते हैं 
और हर जगह, हर वक़्त हर औरत को उपभोग करने को तैयार रहते हैं. 
(दुखतर जान की मिसाल मौजूद) 
जिस क़ौम  का पयंबर ऐसा हो उस क़ौम  की हालत कैसी होगी ? 
दुन्या में फैले हुए मुसलमान देखे जा सकते हैं. 
इस बात पर हिन्दुओं के ठहाके उनकी खिसयाहट में बदल जाएँगे, 
जब उनको याद दिलाया जाएगा कि उनके पूज्य देवता और भगवान् 60-60 हज़ार पत्नियों और उप पत्नियों के मालिक हुवा करते थे. 
भारत उपमहाद्वीप की विडंबना यह है कि यहाँ मानव, मानव नहीं, 
हिन्दू और मुसलमान पैदा होता है. 
मानव जाति को हिन्दू और मुसलमान तो बनाया जा सकता है 
मगर हिन्दू और मुसलमान को मानव बनाना बड़ा मुश्किल है.
बसकि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को मयस्सर नहीं इंसाँ होना.
*** 

Wednesday, January 9, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 52



 अद्ल 
अद्ल के अर्थ हैं न्याय इंसाफ़, सत्यानिष्ट, सत्य पौरुष. 
अद्ल शब्द ज़ेहन में आते ही शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ जाती है. 
मैं कलम उठाता हूँ तो अद्ल की तलवार सामने आकर खड़ी हो जाती हैं. 
अद्ल से ज़रा हट कर सोचते ही अद्ल मेरे मुंह पर तमाचा रसीद कर देती है 
कि तुझे अदालत में आना है. आदिल बन. 
मेरी बातों में लोग तरह तरह की गुंजाइशें गढ़ लेते हैं , 
हिन्दू मुझ पर फब्तियां कस देते हैं 
और मुसलमान तो ख़ैर लअनत की धिक्कार बरसाते ही रहते हैं. 
हिन्दी के साथ साथ ज़्यादःपोस्टें मेरी उर्दू में होती हैं 
जोकि शायद पाकिस्तानियों के काम भी आती हों, 
ख़ुशी की बात है कि वह मुझे हज़्म करते हैं. 
डर के मारे कोई कमेन्ट नहीं करते मगर मेरी कद्र करते है. 
कोई अनुचित भाषा उनकी मेरे लिए नहीं होती, 
शायद उनको मेरी ज़रुरत है. 
कुछ दिनों से मैंने अपने हिन्दू भाइयों को जागृत करना शुरू किया है तो 
मेरे कुछ दोस्तों को रास नहीं आ रहा. 
दोनों कौमें सच को न पसंद करके धार्मिक मिथ्य को ज़्यादः पसंद करती हैं. 
अद्ल मुझे धक्का दिए रहता है कि आगे बढ़.
ग़ालिब कहता है ,
 मरे काशी में, तो काबे में गाड़ो बरहमन को ,
वफ़ा दारी बशर्त ए उस्त्वारी अस्ल ईमां है.
***

Tuesday, January 8, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 51


नमाज़ी इंक़लाब            

आजकल चार छः औसत पढ़े लिखे मुसलमान जब किसी जगह इकठ्ठा होते हैं तो उनका मौजूअ ए गूफ़्तुगू होता है 
'मुसलामानों पर आई हुई आलिमी आफतें' 
बड़ी ही संजीदगी और रंजीदगी के साथ इस पर बहेस मुबाहिसे होते हैं. 
सभी अपनी अपनी जानकारियाँ और उस पर रद्दे अमल पेश करते हैं. 
अमरीका और योरोप को और उनके पिछ लग्गुओं को जी भर के कोसा जाता है. 
भग़ुवा होता जा रहा हिंदुस्तान को भी सौतेले भाई की तरह मुख़ातिब करते हैं 
और इसके अंजाम की भरपूर आगाही भी देते हैं. 
सच्चे क़ौमी रहनुमा जो मुस्लिमों में है, उनको 'साला गद्दार है', 
कहक़र मुख़ातिब करते हैं. 
वह मुख़्तलिफ़ होते हुए भी अपने मिल्ली रहनुमाओं का ग़ुन गान ही करते है.
अमरीकी पिट्ठू अरब देशों को भी नहीं बख़्शा जाता. 
बस कुछ नर्म गोशा होता है तो पाकिस्तान के लिए.
इसके बाद वह मुसलामानों की पामाली की वजह एक दूसरे से 
उगलवाने की कोशिश करते हैं, 
वह इस सवाल पर एक दूसरे का मुँह देखते हैं कि 
कोई सच बोलने की जिसारत करे. 
सच बोलने की मजाल किसकी है? 
इसकी तो सलाहियत ही इस क़ौम में नहीं. 
बस कि वह सारा इलज़ाम ख़ुद पर आपस में बाँट लेते हैं, 
कि हम मुसलमान ही ग़ुमराह हो गए हैं. 
माहौल में कभी कभी बासी कढ़ी की उबाल जैसी आती है. 
क़ुरआन और हदीसों की बे बुन्याद अज़मतों के अंबार लग जाते हैं, 
गोया दुन्या भर की तमाम ख़ूबियाँ इनमें छिपी हुई हैं. 
माज़ी को ज़िंदा करके अपनी बरतरी के बखान होते हैं. 
इस महफ़िल में जो ज़रा सा इस्लामी लिटरेचर का कीड़ा होता है, 
वह माहौल पर छा जाता है.
फिर वह माज़ी के घोड़ो से उतरते हैं, 
हाल के हालात पर आने के बाद सर जोड़ कर बैठते हैं कि 
आख़िर इस मसअले  का हल क्या है? 
हल के तौर पर इनको, इनकी ग़ुमराही याद आती है 
और सामने इनके खड़ी होती है 
'नमाज़', 
ज़ोर होता है कि हम लोग अल्लाह को भूल गए हैं, 
अपनी नमाज़ों से गाफ़िल हो गए है. 
उन पर कुछ दिनों के लिए नमाज़ी इंक़लाब आता है और 
उनमें से कुछ लोग आरज़ी तौर पर नमाज़ी बन जाते है.
असलियत ये है कि आज मुसलमान जितना दीन के मैदान में डटा हुवा है 
उतना कभी नहीं था. 
इनकी पस्मान्दगी की वजह इनकी नमाज़ और इनका दीन ही है. 
मुसलमान अपने चूँ चूँ के मुरब्बे की आचार दानी को उठा कर 
अगर ताक़ पर रख दें, तो वह किसी से पीछे नहीं रहेगे.
***

Monday, January 7, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 50



 कट्टरता बेवक़ूफ़ी होती है               
मुस्लिम अपनी आस्था के तहत ऊपर की दुन्या में मिलने वाली जन्नत के लिए 
इस दुन्या की ज़िंदगी को संतोष के साथ ग़ुज़ार देंगे. 
ग़ैर मुस्लिमों को मज़दूर, मिस्त्री, राज, नाई, भिश्ती और 
मुलाज़िम सस्ते दामों में मिलते रहेंगे.
मुस्लिम कट्टरता बेवक़ूफ़ी होती है जो इन्सान को एक बार में ही क़त्ल करके 
हमेशा के लिए उसके फ़ायदे से बंचित कर देती है , 
इसके बर अक्स हिन्दू कट्टरता बुद्धिमान होती है 
जो इन्सान को दास बना कर रखती है , 
न मरने देती है न मुटाने देती है. 
यह मानव समाज को धीरे धीरे अछूत बना कर, उनका एक वर्ग बना देती है 
और ख़ुद स्वर्ण हो जाती है. 
पाँच हज़ार साल से भारत के मूल बाशिदे और आदि वासी इसकी मिसाल हैं.
इन दोनों कट्टरताओं को मज़हब और धर्म पाले रहते है, 
जिनको मानना ही मानव समाज की हत्या या फिर उसकी ख़ुद कुशी है.
इसके आलावा क़ुरआन के मुख़ालिफ़ कम्युनिस्ट और पश्चिमी देश भी है 
जो पूरे क़ुरआन को ही जला देने के हक़ में है, 
इन देशों में धर्म ओ मज़हब की अफ़ीम नहीं बाक़ी बची है, 
इस लिए वह पूरी मानवता के हितैषी हैं.
भारतीय मुसलमानो के दाहिने खाईं है, तो बाएँ पहाड़. 
उसका मदद गार कोई नहीं है, 
बैसे भी मदद मोहताजों को चाहिए. 
वह मोहताज नहीं, अभी भी ताक़त हासिल कर सकते है, 
उन्हें बेदारी की ज़रुरत है, 
हिम्मत करके मुस्लिम से हट कर मोमिन हो जाएँ..
***    

Saturday, January 5, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 49


सोया हुवा समाज           
      
गीता की तरह अगर हम क़ुरआन सार निकलना चाहें तो वो ऐसे होगा - - -
अवाम को क़यामत आने के यक़ीन में लाकर, दोज़ख का खौफ़ और 
जन्नत की लालच पैदा करना, 
फिर उसके बाद मन मानी तौर पर उन भेड़ों को हाँकना''
क़यामत के उन्वान को लेकर मुहम्मद जितना बोले हैं उतना दुन्या में शायद किसी उन्वान पर बोला हो. 
इस्लाम को अपना लेने के बाद मुसलमानों मे एक वाहियात इंफ़्रादियत आ गई है 
 मुहम्मद की इस 'बड़ बड़' को ज़ुबानी रट लेने की, 
जिसे हफ़िज़ा कहा जाता है. 
लाखों ज़िंदगियाँ इस ग़ैर तामीरी काम में लग कर अपनी फ़ितरी ज़िन्दगी से ना आशना और महरूम रह जाती हैं और दुन्या के लिए कोई तामीरी काम नहीं कर पातीं. 
अरब इस हाफ़िज़े के बेसूद काम को लगभग भूल चुके हैं और तमाम हिंदो-पाक के मुसलमानों में रायज, यह रवायती ख़ुराफ़ात अभी बाक़ी है. 
वह मुहम्मद को सिर्फ़ इतना मानते हैं कि उन्हों ने कुफ्र और शिर्क को ख़त्म करके वहदानियत (एक ईश्वर वाद) का पैग़ाम दिया. 
मुहम्मद वहाँ आक़ाए दो जहाँ नहीं हैं. 
यहाँ के मुसलमान उनको ग़ुमराह और वहाबी कहते हैं.
तुर्की में इन्केलाब आया, कमाल पाशा ने तमाम कट्टर पंथियों के मुँह में लगाम और नाक में नकेल डाल दीं, जिन्हों ने दीन के हक़ में अपनी जानें क़ुरबान करना चाहा उनको लुक़्मए अज़ल हो जाने दिया, नतीजतन आज योरोप में अकेला मुस्लिम मुल्क है जो योरोप के शाने बशाने चल रहा है. 
कमाल पाशा ने बड़ा काम ये किया की इस्लाम को अरबी जुबान से निकाल कर टर्किश में कर दिया जिसके बेहतरीन नतायज निकले, 
कसौटी पर चढ़ गया क़ुरआन. 
कोई टर्किश हाफ़िज़ ढूंढे से नहीं मिलेगा टर्की में. 
काश भारत में ऐसा हो सके, 
क़ौम का आधा इलाज यूँ ही हो जाए.
हमारे मुल्क का बड़ा सानेहा ये मज़हब और धर्म है, 
इसमें मुदाख़लत न हिदू भेड़ें चाहेगी और न इस्लामी भेड़ें, 
इनके क़साई इनके नजात दिहन्दा बन कर इनको ज़िबह करते रहेंगे. 
हमारे हुक्मरान अवाम की नहीं अवाम की 'ज़ेहनी पस्ती' की हिफ़ाज़त करते हैं. मुसलमान को कट्टर मुसलमान और हिन्दू को कट्टर हिन्दू बना कर इनसे इंसानियत का जनाज़ा ढुलवाते हैं.
***

Friday, January 4, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 48



 फ़िर्क़े और बिरादरी                 
क़बले-इस्लाम अरब में मुख़्तलिफ़ फ़िरक़े हुवा करते थे जिसके बाक़ियात 
ख़ास कर उप महाद्वीप में आज भी पाए जाते हैं. 
इनमें क़ाबिले ज़िक्र नीचे दिए जाते हैं ---
1- काफ़िर ---- यह क़दामत पसंद होते थे जो 
पुरखों के प्रचीनतम धर्म को अपनाए रहते थे. 
सच पूछिए तो यही इंसानी आबादी हर पैग़मबर और रिफ़ार्मर का रा-मटेरियल हुवा करते हैं. 
बाक़ियात में इसका नमूना आज भी भारत में मूर्ति पूजक और भांत भांत अंध विश्वाशों में लिप्त हिन्दू है.
ऐसा लगता है चौदह सौ साला पुराना अरब पूर्व में भागता हुआ भारत में आकर ठहर गया हो और थके मांदे इस्लामी तालिबान, अल क़ायदा और जैशे मुहम्मद उसका पीछा कर रहे हों.
2- मुशरिक ---- जो अल्लाह वाहिद (एकेश्वर) के साथ साथ 
दूसरी सहायक हस्तियों को भी ख़ातिर में लाते हैं. 
मुशरिकों का शिर्क जनता की ख़ास पसंद है. 
इसमें हिदू मुस्लिम सभी आते है, गोकि मुसलमान को मुशरिक कह दो तो 
मारने मरने पर तुल जाएगा मगर वह बहुधा ख्वाजा अजमेरी का मुरीद होता है, 
पीरों का मुरीद होता है जो की इस्लाम के हिसाब से शिर्क है. 
आज के समाज में रूहानियत के क़ायल हिन्दू हों या 
मुसलमान थोड़े से मुशरिक ज़रूर होते हैं.
3- मुनाफ़िक़ ---- वह लोग जो बज़ाहिर कुछ, और बबातिन कुछ और, 
दिन में मुसलमानों के साथ और रात में काफ़िरों के. 
ऐसे लोग हमेशा रहे हैं जो दोहरी ज़िंदगी का मज़ा लूटते रहे हैं. 
मुसलमानों में हमेशा से कसरत से मुनाफ़िक़ पाए जाते हैं.
4- मुंकिर ----- मुंकिर का लफ्ज़ी मतलब है, इंकार करने वाला 
जिसका इस्लामी करन करने के बाद इस्तेलाही मतलब किया गया है कि 
इस्लाम क़ुबूल करने के बाद उस से फिर जाने वाला मुंकिर होता है. 
बाद में आबाई मज़हब इस्लाम को तर्क करने वाला भी मुंकिर कहलाया.
5-मजूसी ----- आग, सूरज और चाँद तारों के पुजारी. ज़रथुष्टि की उम्मत.
6-मुल्हिद ---(नास्तिक) हर दौर में ज़हीनों को ढोंगियों ने उपाधियाँ दीं हैं. 
मुझे इन पर फ़ख़्र है कि इंसान की यह ज़ेहनी परवाज़ बहुत पुरानी है.
7- इनके आलावा यहूदी और ईसाई क़ौमे तो मद्दे मुक़ाबिल इस्लाम थीं ही 
जो क़ुरआन में छाई हुई हैं.
इस के बाद शिया सुन्नी जैसे 72 मुसलमानी फ़िरक़े इस्लाम की देन हैं 
***

Thursday, January 3, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 47


क़ुदरत की बनावट        

क़ुदरत को अगर ख़ुदा का नाम दिया जाए तो इसका भी कोई जिस्म होगा 
जैसे कि इंसान का एक जिस्म है. 
क़ुरआन और तौरेत की कई आयतों के मुताबिक़ ख़ुद बख़ुद 
इलाही मुजस्सम साबित होता है. 
इंसान के जिस्म में एक दिमाग़ है .
 दिमाग़ रखने वाला ख़ुदा झूठा साबित हो चुका  है. 
क़ुदरत (बनाम ख़ुदा) के पास कोई दिमाग़ नहीं है बल्कि एक बहाव है, 
इसके अटल उसूलों के साथ. 
इसके बहाव से मख़लूक़ को कभी सुख होता है कभी दुःख. 
ज़रुरत है क़ुदरत के जिस्म की बनावट को समझने की 
जैसे कि मेडिकल साइंस ने इंसानी जिस्म को समझा है 
और लगातार समझने की कोशिश कर रहा है. 
इनके ही कारनामों से इंसान क़ुदरत के सैकड़ों कह्र से नजात पा चुका है. 
मलेरिया, ताऊन, चेचक जैसी कई बीमारियों से 
और बाढ़, अकाल जैसी आपदाओं से नजात पा रहा है. 
जंगलों और ग़ुफाओं की रिहाइश गाह आज हमें पुख़ता मकानों तक लेकर आ गई हैं. हमें ज़रुरत है क़ुदरत बनाम ख़ुदा के जिस्मानी बहाव को समझने की, 
नाकि उसकी इबादत करने की. 
इस रास्ते पर हमारे जदीद पैग़म्बर साइंस दान गामज़न हैं. 
यही पैग़म्बरान वक़्त एक दिन इस धरती को जन्नत बना देंगे.
इनकी राहों में दीन धरम के ठेकेदार रोड़े बिखेरे हुए हैं. 
जगे हुए इंसान ही इन मज़हब फ़रोशों को सुला सकते है.
जागो, आँखें खोलो, अल्लाह के फ़रमान पर ग़ौर करो 
और मोमिन के मशविरे पर, 
फ़ैसला करो कि कौन तुमको ग़ुमराह कर रहा है - - -
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Wednesday, January 2, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 46


 क़यामती साया           

आज इक्कीसवीं सदी में दुन्या के तमाम मुसलामानों पर मुहम्मदी अल्लाह का क़यामती साया ही मंडला रहा है. जो क़बीलाई समाज का मफ़रूज़ा ख़दशा हुवा करता था. अफ़ग़ानिस्तान दाने दाने को मोहताज है, ईराक अपने दस लाख बाशिदों को जन्नत नशीन कर चुका है, मिस्र, लीबिया और दीगर अरब रियासतों पर इस्लामी तानाशाहों की चूलें ढीली होती जा रही हैं. 
तमाम अरब मुमालिक अमरीका और योरोप के ग़ुलामी में जा चुके है, 
लोग तेज़ी से सर ज़मीन ए ईसाइयत की गोद में जा रहे हैं, 
कम्युनिष्ट रूस से आज़ाद होने वाली रियासतें जो इस्लामी थीं, 
दोबारा इस्लामी सफ़ में वापस होने से साफ़ इंकार कर चुकी हैं, 
11-9  के बाद अमरीका और योरोप में बसे मुसलमान मुजरिमाना वजूद ढो रहे हैं, 
अरब से चली हुई बुत शिकनी की आंधी हिदुस्तान में आते आते कमज़ोर पड़ चुकी है, सानेहा ये है कि ये न आगे बढ़ पा रही है और न पीछे लौट पा रही है, 
अब यहाँ बुत इस्लाम पर ग़ालिब हो रहे हैं, 
18  करोड़ बे कुसूर हिदुस्तानी बुत शिकनों के आमाल की सज़ा भुगत रहे हैं, 
हर माह के छोटे मोटे दंगे और सालाना बड़े फ़साद इनकी मुआशी हालत को बदतर कर देते हैं, और हर रोज़ ये समाजी तअस्सुब के शिकार हो जाते हैं, इन्हें सरकारी नौकरियाँ बमुश्किल मिलती है, बहुत सी प्राइवेट कारख़ाने और फ़र्में इनको नौकरियाँ देना गवारा नहीं करती हैं, 
दीनी तअलीम से लैस मुसलमान वैसे भी हाथी का छोत होते है, 
जो न जलाने के काम आते हैं न लीपने पोतने के, 
कोई इन्हें नौकरी देना भी चाहे तो ये उसके लायक़ ही नहीं होते. 
लेदे के आवां का आवां ही खंजर है.
दुन्या के तमाम मुसलमान जहाँ एक तरफ़ अपने आप में पस मानदा है, 
वहीं, दूसरी क़ौमों की नज़र में जेहादी नासूर की वजेह से ज़लील और ख़्वार है. 
क्या इससे बढ़ कर क़ौम पर कोई क़यामत आना बाक़ी रह जाती है? 
ये सब उसके झूठे मुहम्मदी अल्लाह और उसके नाक़िस क़ुरआन की बरक़त है. 
आज हस्सास तबा मुसलमान को सर जोड़कर बैठना होगा कि 
बुजुर्गों की नाक़बत अनदेशी ने अपने जुग़राफ़ियाई वजूद को क़ुरबान करके 
अपनी नस्लों को कहीं का नहीं रक्खा.
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Tuesday, January 1, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -45


 हयात ए बे असर          
दस्तूर ए क़ुदरत के मुताबिक़ हर सुब्ह कुछ बदलाव हुवा करता है. 
कहते हैं कि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है.
फ़िराक़ कहते हैं -
निज़ाम ए दह्र बदले, आसमान बदले ज़मीं बदले,
कोई बैठा रहे कब तक हयात ए बे असर लेकर.
मुसलमानों ! तुम क्या "हयात ए बे असरी" को जी रहे हो? 
हर रोज़ सुब्ह ओ शाम तुम कुछ नया देखते हो . 
इसके बावजूद तुम पर असर नहीं होता? 
इंसानी ज़ेहन भी इसी ज़ुमरे में आता है, जो कि तब्दीली चाहता है.
बैल गाड़ियाँ इस तबदीली की बरकत से आज तेज़ रफ़्तार रेलें बन गई हैं. 
तुम जब सोते हो तो इस नियत को बाँध कर सोया करो कि कल कुछ नया होगा, जिसको अपनाने में हमें कोई संकोच नहीं होगा.
तारीकयों से पहले सरे शाम चाहिए,
हर रोज़ आगाही से भरा जाम चाहिए.
मगर तुम तो सदियों पुरानी रातों में सोए हुए हो, 
जिसका सवेरा ही नहीं होने देते. 
दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है, तुमको ख़बर भी नहीं.
रात मोहलत है इक, जागने के लिए,
जाग कर सोए तो नींद आज़ार है.
उट्ठो आँखें खोलो. 
इस्लाम तुम पर नींद की अलामत है. 
इसे अपनाए हुए तुम कभी भी इंसानी बिरादरी की अगली सफ़ों में नहीं आ सकते. 
इस से अपना मोह भंग करो वर्ना तुम्हारी नस्लें तुमको कभी मुआफ़ नहीं करेगी.
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धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -44


 'मेहमान नाज़ेबा' 

अन्ना हज़ारे का इंक़्लाब आया और चार दिन में पूरे मुल्क को हिला कर चला गया. इस इंक़्लाब में गांधी के साथ कोई 'अबुल कलाम' नहीं था. 
मुसलामानों का कहीं दूर दूर तक अता पता नहीं था.  
शबाना आज़मी ज़रूर थी जिसको आलिमान इस्लाम "नचनियाँ,गवैया" 
और नापाक औरत से नवाज़ते हैं. शबाना एक अज़ीम फ़नकारा ही नहीं, 
एक अज़ीम इंसान भी है, जिसकी पहचान आक्सफोर्ड का एवार्ड है, जो इसे मिला. 
ऐसी ही कुछ फ़िल्मी हस्तियाँ हैं जिनका मेल भारतीयता से खाता है.
अन्ना की हवा में जो जमाअत इस्लामी ने हिस्सा लिया वह 'मेहमान नाज़ेबा' थे. 
उनकी तंजीम तो इस्लामी इंक़्लाब की मुंतज़िर है. 
वह इंसानी मसायल से बेबहरे है.
चाहते हैं कि देश में तमाम  रहनुमाओं की तस्वीरें उतार कर 
अल्लाह की तस्वीर लगा दी जाए, जैसे अभी मिस्र में देखा गया 
कि होस्नी मुबारक की तस्वीर हटा कर हवा का बुत, 
यानी अल्लाह का तोग़रा लगा दिया गया. 
बरेली के तथा कथित आला हज़रात ने उन मुसलामानों को कुफ़्र का फ़तवा दिया था जो गाँधी जी की अर्थी में शरीक हुए थे. 
फिर भी उनके नाम की आला हजरत एक्सप्रेस चलाई जा रही है 
और मुसलमान सुब्ह व शाम उसका ग़ुणगान करते हैं.
इस्लाम की घुट्टी मुसलमानों को दुन्या में कहीं सुर्ख रू नहीं होने देगी, 
ये जहाँ भी दूसरी क़ौमों के साथ रहते हैं अपने आप में ज़लील ख़्वार रहते हैं. 
जहाँ ये क़ाबिज़ हैं, हर रोज़ अपनी जेहादी मौत के नवाला आपस में होते रहते हैं. इस्लाम ने इंसानों को ऐसा ज़हरीला नशा पिलाया है 
जिसकी काट अभी तक तो पैदा नहीं हुई है.
फिर मैं कहूँगा कि मुसलमान इस्लाम से तौबा करके 
मुस्लिम से ईमान दार मोमिम हो जाएँ, एक एलान के साथ. 
उनका कुछ न छिनेगा,  न बदलेगा, न नाम, न तहज़ीब व तमद्दुन, 
न रख रखाव और न किसी दूसरे धर्म की पैरवी. 
धर्म के नए मानी हैं धाँधली जिस दिन इस बात को समझ कर कोई गाँधी, 
कोई अन्ना पैदा होंगा, उस दिन हिदुस्तान में मुकम्मल इंक़्लाब आएगा.
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