Saturday, December 29, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -43


 मुहम्मद का ज़ेह्नी मेयार 

"क़ुरआन  में कीड़े निकलना भर मेरा मक़सद नहीं है बहुत सी अच्छी बातें हैं, इन पर मेरी नज़र क्यूँ नहीं जाती?" 
अकसर ऐसे सवाल आप की नज़र के सामने मेरे ख़िलाफ़ कौधते होंगे. 
बहुत सी अच्छी बातें, बहुत ही पहले कही गई हैं, एक से एक अज़ीम हस्तियां और नज़रियात इसलाम से पहले इस ज़मीन पर आ चुकी हैं 
जिसे कि क़ुरआनी अल्लाह तसव्वुर भी नहीं कर सकता. 
अच्छी और सच्ची बातें फ़ितरी होती हैं जिनहें आलमीं सचचाइयाँ भी कह सकते हैं. क़ुरआन  में कोई एक बात भी इसकी अपनी सच्चाई या इंफ़रादी सदाक़त नहीं है. हजारों बकवास और झूट के बीच अगर किसी का कोई सच आ गया हो तो उसको क़ुरआन  का नहीं कहा जा सकता,
"माँ बाप की ख़िदमत करो" 
अगर क़ुरआन कहता है तो इसकी अमली मिसाल श्रवण कुमार इस्लाम से सदियों पहले क़ायम कर चुका है. 
मौलाना कूप मंदूकों का मुतालिआ क़ुरआन तक सीमित है 
इस लिए उनको हर बात क़ुरआन में नज़र आती है. 
यही हाल अशिक्षित मुसलमानों का है. 
क़ुरान कि एक आयत मुलाहिज़ा हो 
''अल्लाह की आयातों को झुटलाने वाले लोग कभी भी जन्नत में न जावेंगे जब तक कि ऊँट सूई के नाके से न निकल जाए.''
अलएराफ़ 7 आयत (40)
''ऊँट सूई के नाके से निकल सकता है मगर दौलत मंद जन्नत में कभी दाखिल नहीं हो सकता''
ईसा की नकल में मुहम्मद की कितनी फूहड़ मिसाल है जहाँ अक़्ल का कोई नामो निशान नहीं है. शर्म तुम को मगर नहीं आती. 
मुसलमानों तुम ही अपने अन्दर थोड़ी ग़ैरत लाओ.
ईसा कहता है - - -
''ऐ अंधे दीनी रहनुमाओं! तुम ढोंगी हो, मच्छर को तो छान कर पीते हो और ऊँट को निगल जाते हो.'' 
मुवाज़ना करें मुस्लिम अपने कठमुल्ल्ले सललललाहो अलैहे वसल्लम को शराब में टुन्न रहने वाले ईसा से.

Friday, December 28, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 42


ख़ैराती उम्मत                 

इस्लाम की बहुत बड़ी कमज़ोरी है दुआ माँगना. 
इस बेबुन्याद ज़रीया की बहुत अहमियत है. 
हर मौक़ा वह ख़ुशी का हो या सदमें का, दुआ के लिए हाथ फैले राहते हैं. 
बादशाह से लेकर रिआया तक सब अपने अल्लाह से जायज़, नाजायज़ हुसूल के लिए उसके सामने हाथ फैलाए रहते हैं. 
जो मांगते मांगते अल्लाह से मायूस हो जाता है, 
वह इंसानों के सामने हाथ फैलाने लगता है. 
मुसलमानों में भिखारियों की कसरत, इसी दुआ के तुफ़ैल में है 
कि भिखारी भी भीख देने वाले को दुआ देता है, 
देने वाला भी उसको इस ख़याल से भीख दे देता है कि 
मेरी दुआ क़ुबूल नहीं हो रही, 
शायद इसकी ही दुआ क़ुबूल हो जाए. 
दुआओं की बरकत का यक़ीन भी मुसलमानों को मुफ़्त खो़र बनाए हुए है. 
कितना बड़ा सानेहा है कि मेहनत काश मजदूर को भी 
यह दुआओं का मंतर ठग लेता है. 
कोई इनको समझाने वाला नहीं कि ग़ैरत के तक़ाज़े को 
दुआओं की बरकत भी मंज़ूर नहीं होना चाहिए. 
ख़ून पसीने से कमाई हुई रोज़ी ही पायदार होती है. 
यही क़ुदरत को भी गवारा है न कि वह मंगतों को पसंद करती है.
***

Thursday, December 27, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 41


 क़ुरआन  नज़र ए आतिश     
         
अमरीका के फ्लोरिडा चर्च की तरफ़ से एलान है कि 
वह 11-9 को क़ुरआन  को नज़र ए आतिश करेंगे. 
मुसलमानों के लिए ये वक़्त है ख़ुद से मुहासबा तलबी का, 
अपने ओलिमा की ज़ेहनी ग़ुलामी छोड़ कर इस बात पर नज़रे-सानी करने का है 
कि वह अब अपना फ़ैसला ख़ुद करें, 
मगर ईमानदारी के साथ. 
मुसलमानों को चाहिए कि क़ुरआन का मुतालेआ करें, न कि तिलावत. 
देखें कि ज़माना हक़ पर है या क़ुरआन ? 
मैं कुछ आयतें आपको पढ़ने का मशविरा दे रहा हूँ - - -
सूरह        आयत

बकर   - 190-192-214-244-245-
इमरान- 167- 168-170
निसा   -75-77
मायदा- 35
इंफाल   -15-16-17-39- 43- 64 -67
तौबः 5 - 16- 29 -41- 45- 46 - 47 -53 - 84 - 86 -
मुहम्मद -   20 -21 -22
फ़त ह -    16-20-23
सफ़-   10-11
यह चंद आयतें बतौर नमूना हैं, 
वैसे पूरा का पूरा क़ुरआन ज़हर में बुझा हुआ है.
इन आयातों में जेहाद की तलक़ीन की गई है. 
देखिए कि किस हठ धर्मी के साथ दूसरों को क़त्ल कर देने के एह्कामात हैं. 
मुसलमान अल्लाह के हुक्म पर जहाँ भी उसको मौक़ा मिलता है, 
क़ुरआनी अल्लाह के मुताबिक़ ज़ुल्म ढाने लगता है. 
ऐसी क़ौम को जदीद इंसानी क़द्रें ही अब तक बचाए हुए हैं, 
वरना माज़ी के आईने को देख कर जवाब देने में अगर हैवानियत पहुंचे, 
तो मुसलमानों का सारी दुन्या से नाम ओ निशान ही ख़त्म हो जाय. 
स्पेन में आठ सौ साल हुक्मरानी के बाद जब मुसलमान अपने आमालों के भुगतान में आए तो दस लाख मुसलमान दहकती हुई मसनवी दोज़ख़ में झोंक दिए गए. 
अभी कल की बात है कि ईराक में दस लाख मुसलमान चीटियों की तरह मसल दिए गए. 
ऐसा चौदह सौ सालों से चला आ रहा है, जिसकी ख़बर आलिमान दीन आप को झूट  के रूप में देते हैं कि वह सब शहादत के सीगे में दाख़िल हो कर जन्नत नशीन हुए. 
इंसानों को यह सज़ाएँ क़ुरआनी आयतें दिलवाती हैं. 
इसकी ज़िम्मे दारी इस्लाम ख़ोर ओलिमा की हमेशा से रही है. 
आप लोग सिर्फ़ शिकारयों के शिकार हैं.
झूट को पामाल करने के लिए जब तक आप ज़माने के साथ न होंगे, 
ख़ुद को पायमाल करते रहेंगे. 
अगर आप थोड़े से भी इंसाफ़ पसंद हैं तो 
ख़ुद हाथ बढ़ा कर ऐसी मकरूह इबारत आग में झोंक देंगे.
***
मुहासबा=हिसाब-किताब  मुतालेआ= अद्धयन  तलक़ीन=प्रवचन  एह्कामात=आज्ञाएं मसनवी=कृतरिम .

Wednesday, December 26, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 40


जो हमें होना चाहिए, वह हूँ.

मेरा कोई धर्म नहीं, कोई मज़हब नहीं, कोई देश नहीं. 
मैं भारत माता का नहीं धरती माता का बेटा हूँ और अपनी माँ की औलाद हूँ. 
भारत हो या ईरान, सब अंतर राष्ट्रीय घेरा बंदीयां हैं,
इन अंतर राष्ट्रीय सीमा बंदीयों के खानों में क़ैद,
मैं अवाम हूँ. 
हुक्मरानों के एलान में क़ैद, 
हम देश प्रेमी है, या देश द्रोही  हैं  ?
या उनके मुताबिक अपराधी?
जो हमें होना चाहिए, मैं वह हूँ.??
इन सीमा बंदियों में रहने के लिए हम महज़ एक किराए दार मात्र हैं. 
इसी सीमा में हम और हमारा कुटुम्भ और क़बीला रहता है. 
इन्हीं हुक्मरानों ने हमारी सुरक्षा का वादा किया है, दूसरे हुक्मरानों से.??
मैं, अपने हम को लेकर, इस धरती के टुकड़े पर रहने का वादा कर लिया है. 
इस देश के लिए हमें Tex भरने में ईमान दार होना चाहिए, 
किसी देश प्रेमी की यह पहली शर्त है. 
और ज़रुरत पड़े तो इसके लिए हमें अपने जान माल को क़ुरबान  कर देना चाहिए. 
नक़ली देश प्रेम के नाम का नारा लगा कर लुटेरे अपनी तिजरियाँ भरते है 
और किसी मानव समूह को तबाह करने की साज़िश में क़हक़हे लगाते हैं.  
देश प्रेम नहीं कर्तव्य पालन की चाहत हमारे दिलों में होनी चाहिए.
और धरती प्रेम की आरज़ू.
तभी हम एक ईमान दार और नेक शहरी बन सकते हैं.
मेरी दिली चाहत है कि मैं धरती माता के उस हिस्से का वासी बन जाऊं 
जहाँ नवीन मानव मूल्य परवान चढ़ रहे हों. 
और ख़ुद को उस देश को अपने जान माल के साथ समर्पित करदूं.
 भौगोलिकता हमारी कमज़ोरी है,
भारत का बंदा नार्वे में तो सहज नहीं हो सकता. 
भौगोलिक स्तर पर वह देश मेरा प्रदेश है जिसे क़ुदरत ने भरपूर नवाज़ा है. 
और पाखंडी धूर्तों ने उसे लूटा है. 
मेरी दिली तमन्ना है कि धरती का यह भू भाग नार्वे और स्वीडन को पछाड़ कर 
पहले नंबर पर पहुंचे.
इसके लिए मैं अपने शारीर का हर एक अंग समर्पित कर चुका हूँ , 
जैसे कि जानवर समर्पित करते हैं.
***

Tuesday, December 25, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 38


 इंसान को मुकम्मल आज़ादी चाहिए 

वयस्क होने के बाद व्यक्ति को पूरी पूरी आज़ादी चाहिए. 
कुछ लोग वक़्त से पहले ही बालिग़ हो जाते हैं और कुछ को समय ज़्यादः लग जाता है. सिन ए बलूग़त (वयस्कावस्था) से पहले बच्चों को मानव मूल्यों के लिए टोकना चाहिए न कि अपनी धार्मिकता और मानसिकता को इन पर स्थापित करना चाहिए. मसलन बच्चों को हिंसा से रोकें मगर अहिंसा के पाठ न पढ़ाएँ. 
बड़े बड़े लेक्चर बच्चों को जबरन कंडीशंड कर देते हैं और उनकी अपनी सलाहियत और सोच पर अंकुश लगा देते हैं. 
लिंग भेद के लिए बच्चों को कम से कम टोकना चाहिए.
इससे बच्चों में हानि कारक आकर्षण आ जाता है 
जो कि मानव समाज में बहुधा पाया जाता है, 
पशु इससे बे ख़बर होते हैं. 
हमारी सभ्य दुन्या ने जिन्स (लिंगीय) के संबंध को बे मज़ा 
और अप्राकृतिक कर दिया है. 
लिंगीय सरलता को जटिल कर दिया है. 
इस में मान मर्यादा और अस्मत की ज़हरीली छोंक का समावेश कर दिया है. 
यहाँ तक कि इसे पाप और दाग़दार क़रार दे  दिया है. 
भाई बहन ही समाज इसे सात पुश्तों के गोत्र तक ले जाता है. 
इस लिंगीय सरलता को इतना कठिन बना दिया गया है कि 
यह समस्या घरों से लेकर समाज तक में ब्योवस्थित हो जाती है.
बड़ी बड़ी जंगें इस लिंगीय कर्म के कारण हुई हैं. 
एक बार दुन्या इस समस्या को आसान करके देखे तो लगेगा 
यह कोई समस्या ही नहीं है. 
बल्कि दोनों पक्ष लिंगीय की कामना को समर्थन और सम्मान देना चाहिए. 
हाँ मगर बिल जब्र की सूरत में, यह जुर्म ज़रूर है.
***

Monday, December 24, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -37


बेचारे मुसलमान 

मुसलमान बड़े सब्र आज़मा दौर से ग़ुज़र रहे हैं. 
उन के सच्चे रहनुमाओं को उपाधियाँ दे दी जाती हैं 
और उनको ऐसा बदनाम किया जाता है कि जैसे ज़हरीला सांप हों. 
उसकी अकेली आवाज़ दस आवाजों के बीच दब कर रह जाती है. 
मुस्लिम समाज की अच्छाईयाँ भी अकसरियत की ढिंढोरा बुरा बना देती है. अकसरियत की बुरायाँ तरक्क़ी पा रही हैं, उनको टोकने वाला कोई नहीं. 
आज कल मुस्लिम औरतों के लिए अकसरियत सूखी जा रही है. 
औरतों के मुआमले में अगर देखा जाए तो मुस्लिम समाज सुर्खरू हैं 
और हिन्दू समाज ज़र्दरू. 
मुस्लिम समाज में बेवाओं और तलाक शुदा को फ़ौरन अपना लिया जाता है. 
शादी के लिए उसे तरजीह दी जाती है. 
हिन्दू अपनी बेवा माँ बहन और बेटियों को पंडों के हरम (आश्रम) में जमा करा देता है. इस समाज में तलाक़ की नौबत ही नहीं आती, 
बहू को स्वाहः कर दिया जाता है. 
कंजूस समाज अबला को पालने को राज़ी नहीं होता. 
मुस्लिम समाज में माँ के पैर के नीचे जन्नत है. बेटियाँ अल्लाह की रहमत हैं.
शराब हिन्दू समाज का बड़ा मसअला है, लाखों औरतें और बच्चे इसका शिकार हैं. मुस्लिम समाज के लिए शराब कोई मसअला ही नहीं, शराब हराम जो ठहरी. 
हज़ारो नंग धुडंग नागा मख़लूक़ हिन्दू ही होती है, 
मुसलमानों में नंग्नता का तसव्वुर भी नहीं है. 
यह चंद मिसालें हैं,
 लिखने को बहुत कुछ है 
मगर बात दूर तक चली जाएगी. 
मुसलमान बुनयादी तौर पर उन कट्टर मनुवादियों का शिकार हैं 
जिनके चंग़ुल से यह निकल गए. 
उप महाद्वीप की लग भग 50% आबादी इनकी ग़ुलामी से मुक्त हो गई है और मुसलसल इनके हाथों से निकलती चली जा रही है. 
भारत के मुसलमानों का जुर्म क्या है ? 
वह अरब के लड़ाके क़बीलों का अंश नहीं, मूलतः भारतीय हैं.
मुस्लिम कलचर और मुस्लिम पद्धति के अंतर्गत हैं 
जो कि कोई जुर्म नहीं. 
मगर 
इनको ख़ुद जागना होगा, यह इल्म जदीद को समझें, 
मदरसे से निकलकर बाहर खड़े हो जाएं जिसे ख़ुद मनुवाद चला रहा है 
कि मुसलमान इसमें मुब्तिला रहें. आगे न बढ़ जाएं.
मुसलमान "तअलीम ए नव" से जुड़ने के लिए आमादा हो जाएं. 
मुल्ला और मोलवी से फ़ासला अख़्तियार करें. 
तीन तलाक़ जैसी बुराई को ख़ुद हराम क़रार दें, 
न कि फ़लाने ढिमाके आकर इनकी ख़बर लें. 
बाक़ी मुआमले में मनुवादियों से कासों आगे हैं.
मगर 
तअलीम में किसी से भी कोसों पीछे.
***

Sunday, December 23, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -36


 मैजिक आई         
   
अल्ताफ़ हुसैन 'हाली'(हलधर) कहते हैं अँधेरा जितना गहरा होता है, मैजिक आई उतनी ही चका चौंध और मोहक़ लगती है. हाली साहब सर सय्यद के सहायकों में एक थे, रेडियो कालीन युग था जब रेडियो में एक मैजिक आई हुवा करती थी, श्रोता गण कान गाने पर और आँखें मैजिक आई पर गड़ोए रहते थे. 
हाली का अँधेरे से अभिप्राय था निरक्षरता. 
कहते हैं कि चम्मच से खाने पर भी मुल्लाओं का कटाक्ष होता है, 
जब कि यह साइंसटिफ़िक है, क्यूँकि इंसान की त्वचा बीमारी के कीटाणुओं को आमंत्रित करती है. 
सर सय्यद को मुल्लाओं ने काफ़िर होने का फ़तवा दे दिया था. 
पता नहीं मौलाना हाली को बख़्शा या नहीं.
क़ुरआन का स्पाट तर्जुमा और उस पर बेबाक तबसरा पहली बार शायद भारतीय माहौल में मैंने किया है. 
मेरे विश्वास पात्र सरिता मैगज़ीन के संपादक स्वर्गीय विश्व नाथ जी को मैंने अपनी लेखनी की एक झलक दिखलाई, उन्हों ने कहा इतना तो मैं भी समझता हूँ जो तुम समझते हो मगर इसका फ़ायदा क्या? 
मुफ़्त में अंगार हाथ में ले रहे हो. 
और मेरे लेख की पंक्तियाँ उन्हें अंगार लगीं, सरिता में जगह देने से इंकार कर दिया. 
क़ुरआन को नग्नावस्था में देखने के बाद होशयार की रालें टपक पड़ती हैं कि एक अनपढ़, अगर इतना बड़ा पैग़म्बर बन सकता है तो मैं क्यूँ नहीं? 
न बड़ा तो मिनी पैग़म्बर ही सही. 
गोया चौदह सौ सालों से मुहम्मद की नक़्ल में जगह जगह मिनी पैग़म्बर कुकुर मुत्ते की तरह पैदा हो रहे हैं. इसी सिलसिले के ताज़े और कामयाब पैग़म्बर मिर्ज़ा ग़ुलाम  अहमद क़ादियानी हुए हैं. 
यह मुहम्मद की ही भविष्य वाणी के फल स्वरुप हैं कि 
'' ईसा एक दिन मेहदी अलैहिस्सलाम बन कर आएँगे और दज्जाल को क़त्ल कर के इस्लाम का राज क़ायम करेंगे .'' 
मिर्ज़ा ने मुहम्मद की कल्पनाओं का फ़ायदा उठाया, और बन बैठे
''मेंहदी अलैहिस्सलाम'' 
क़दियानियों की मस्जिदें तक क़ायम हो गईं, वह भी पाकिस्तान लाहोर में. उसमें इस्लामी कल्चर के मुवाफ़िक़ क़त्ल ओ ग़ारत गरी भी होने लगी. पिछले दिनों 72 अहमदिए शहीद हुए. 
उस शहादत की याद आती है जब मुहम्मद का वंश कर्बला में अपने कुकर्मों का परिणाम लिए इस ज़मीन से उठ गया था, वह भी 72 थे.
उम्मी (निरक्षर) मुहम्मद सदियों पहले अंध वैश्वासिक युग में हुए. 
उन्होंने इर्तेक़ा (रचना क्रिया) के पैरों में ज़ंजीर डाल कर युग को और भी सदियों पीछे ढकेल दिया. 
इस्लाम से पहले अरब योरोप से आगे था, ख़ुद इसे योरोपियन दानिश्वर तस्लीम करते हैं और अनजाने में मुस्लिम आलिम भी, मगर मुहम्मद ने सिर्फ़ अरब का ही नहीं दुन्या के कई टुकड़ों का सर्व नाश कर दिया.
युग का अँधेरा दूर हो गया है, धरती के कई हिस्सों पर रातें भी दिन की तरह रौशन हो गई मगर मुहम्मद का नाज़िला ( प्रकोपित) अंधकार मय इस्लाम अपनी मैजिक आई लिए मुसलमानों को सदियों पुराने तमाशे दिखा रहाहै.
***
37 - अकेला चना 
मैं एक मिटटी से वापस आ रहा था, साथ में मेरे एक ख़ासे पढ़े लिखे रिश्तेदार भी थे. चलते चलते उन्हों ने एक झाड़ से कुछ पत्तियां नोच लीं, उसमें से कुछ ख़ुद रख लीं और कुछ मुझे थमा दीं. मैं ने सवाल्या निशान से जब उनको देखा तो समझाने लगे कि मिटटी से लौटो तो हमेशा हरी पत्ती के साथ घर में दाख़िल हुवा करो. 
मैंने सबब दरयाफ़्त किया कि इस से क्या होता है? 
तो बोले इस से होता कुछ नहीं है, ये मैं भी जनता हूँ मगर ये एक समाज़ी दस्तूर है, इसको निभाने में हर्ज क्या है? घर में घुसो तो औरतें हाथ में हरी पत्ती देखकर मुतमईन हो जाती हैं, वर्ना बुरा मानती है. 
ये है क़बीलाई ज़िंदगी की ज़ेह्नी ग़ुलामी का एक नमूना. 
ये बीमारी नस्ल दर नस्ल हमारे समाज में चली आ रही है. 
ऐसे बहुतेरे रस्म ओ रिवाज को हमारा समाज सदियों से ढोता चला आ रहा है. 
तअलीम  के बाद भी इन मामूली अंध विशवास से लोग उबार नहीं पा रहे.
दूसरी मिसाल इसके बर अक्स मैं अपनी तहरीर कर रहा हूँ कि मेरी शरीक-हयात दुल्हन के रूप में अपने घर से रुख़सत होकर मेरे घर नक़ाब के अंदर दाख़िल हुईं, दूसरे दिन उनको समझा बुझा कर नक़ाब को अपने घर से रुख़सत कर दिया, 
कि दोबारा उन पर उसकी साया तक नहीं पड़ी. 
मेरे इस फ़ैसले से नई नवेली दुल्हन को भी फ़ितरी राहत महसूस हुई, 
मगर वक़्ती तौर पर उनको इसकी मुख़ालिफ़त भी झेलनी पड़ी, 
बिल आख़िर मेरी भावजों को इससे हौसला मिला, उन्हों ने भी आख़िर नक़ाब तर्क कर दिया. इसका देर पा असर ये हुवा कि पैंतीस साल बाद हमारे बड़े ख़ान दान ने आख़िर कार नक़ाब को ख़ैर बाद कर बिया.
इन दो मिसालों से मैं बतलाना चाहता हूँ कि अकेला चना भाड़ तो नहीं फोड़ सकता मगर आवाज़ बुलंद कर सकता है. बड़े से बड़े मिशन की कामयाबी के लिए पहला क़दम तो उठाना ही पड़ेगा. इंसान अपने अंदर छिपी सलाहियतों से ख़ुद पहचानने से बचता राहता है.
*** 

Saturday, December 22, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -35


ख़ुद में तलाश 

आज हर तरफ़ आध्यात्म की सौदागरी हो रही है. 
हर पांचवां आदमी चार को बाबाओं की तरफ़ घसीटता नज़र आ रहा है. 
ऊपर से आधुनिक ढ़ंग के संचार का चारों ओर जाल बिछा हुवा है. 
हर कैडर के इंसानी दिमाग की घेरा बंदी हो रही है. 
हर तबक़े के लिए रूहानी मरज़ की दवा ईजाद हो चुकी है. 
ओशो अपने आश्रम में कहीं सेक्स की आज़ादी दे रहे है 
तो दूसरी तरफ़ योगी उस के बर अक्स लोगों को सेक्स से 
दूर रहने के तरीक़े बतला रहे हैं. 
बीच का तबक़ा जो इन दो पाटों में फंसा हुवा है 
वह भगवानो की लीला ही देख कर 
या लिंग की पूजा करके ही सेक्स की प्यास बुझा लेता है.
और भी गम है ज़माने में लताफत से सिवा. 
बीमारियाँ इंसान का एक बड़ा मसअला बनी हुई हैं. 
जिसके लिए औसत आदमी डाक्टर के बजाए पीर फ़क़ीर 
और बाबाओं के फंदे में खिंचे चले आते है. 
समस्या समाधान के लिए लोग एक दूसरों पर आधारित रहते है.
अस्ल में यह मसअले समाज के मंद बुद्धि लोगों के हैं.
समझदार लोग तो ख़ुद अपने आप में बैठ कर समस्या का समाधान तलाश करते है, किसी से दिमाग़ी क़र्ज़ नहीं लेते और न किसी का शिकार होते हैं. 
हमारे मसाइल का हम से अच्छा कौन साधक हो सकता है. 
***

Friday, December 21, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में 33



नक़्श ए फ़रियादी

नक़्श फ़रियादी है किसकी शोखिए तहरीर का ,
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर ए तहरीर का .

ग़ालिब के दीवान का यह पहला शेर है, 
जिसमे उन्होंने अपने मिज़ाज के एतबार से हम्द (ईश गान) का इशारा किया है. 
अजीब ओ ग़रीब और अनबूझे ख़ुदा की तरफ़ सिर्फ़ नज़रें उठाई हैं, 
न उसकी तारीफ़ की है, न हम्द, 
बल्कि एक हैरत का इज़हार है. 
यही अब तक के ख़ुदाओं की हक़ीक़त है. 
उसको लोग अपने हिसाब से शक्ल देकर इंसान को सिर्फ़ ग़ुमराह कर रहे हैं .
ग़ालिब कहता है कि वह कौन सी ताक़त है कि 
मख़लूक का हर नक़्श (आकृति) फ़रियादी है 
और अपनी तशकील ओ तामीर की तहरीरी, तकमीली, तजस्सुस लिए हुए है 
कि वह क्या है ? 
क्यों है ? 
कौन है उसका ख़ालिक़ और मालिक ?
गोया ग़ालिब अब तक के ख़ुदाओं को इंकार करते हुए 
उनके लिए एक सवालिया निशान ही छोड़ता है. 
वह क़ुदरत को पूजने का ढोंग नहीं करता बल्कि 
उसको अपने महबूब की तरह शोख़ और शरीर बतलाता है, 
जो बराबरी का दर्जा रखता है. 
अगर क़ुदरत को इसी हद तक तस्लीम करके जिया जाए तो 
इंसान का वर्तमान सार्थक बन सकता है और इंसान का मुस्तक़्बिल भी. 
ग़ालिब शेर के दूसरे मिसरे में मअनी पिरोता है कि 
हर वजूद का लिबास काग़ज़ी यानी आरज़ी है. 
यही वजूद का सच है बाक़ी तमाम बातें ख़ारजी हैं .
ब्रिज मोहन चकबस्त ग़ालिब के फ़लसफ़े को और ख़ुलासा करते हुए कहते हैं - - -
ज़िन्दगी क्या है अनासिर में ज़हूर ए तरतीब,
मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परीशाँ होना.
***

Thursday, December 20, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -32


 नाक़िस अक़ीदे 
            
फ़ितरी (लौकिक) सत्य ही, बिना किसी संकोच के सत्य है. 
ग़ैर फ़ितरी या अलौकिक  सत्य पूरा का पूरा असत्य है. 
धर्म और मज़हब की आस्था और अक़ीदा कल्पित मन गढ़ंत का रूप मात्र हैं. 
इस रूप पर अगर कोई व्यक्तिगत रूप में विश्वास करे तो करे, 
इसमें उसका नफ़ा और नुक़सान निहित है, 
मगर इसे प्रसार और प्रचार बना कर आर्थिक साधन बनाए 
तो ये जुर्म के दायरे में आता है. 
व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था व्यक्ति तक सीमित रहे तो उसे इसकी आज़ादी है, 
मगर दूसरों में प्रवाहित किया जाय तो आस्थावान दुष्ट और साज़िशी है. 
ऐसे धूर्तों को जेल की सलाखों के अंदर होना चाहिए. 
देश का ऐसा संविधान बने कि सिने-बलूग़त और प्रौढ़ता तक बच्चों को कोई धार्मिक या दृष्टि कौणिक यहाँ तक कि विषय विशेष की तअलीम देने पर प्रतिबंध हो ताकि व्यस्क होने पर वह अपना हक़ सुरक्षित पाए. 
हमारा समाज ठीक इसके उल्टा है. 
बच्चों के बालिग़ होने तक उसको हिन्दू और मुसलमान बना देता है. 
यह तरबियत और संस्कार उसके हक़ में ज़ह्र है. 
मुसलमानों को इसकी ताक़ीद है कि बच्चा अगर कलिमा गो न हुवा 
तो माँ बाप को जहन्नम में दाख़िल कर दिया जायगा. 
इस क़ौम की पामाली इस नाक़िस अक़ीदे के तहत भी है.
***

Wednesday, December 19, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 31


शैतानुर अज़ीम     
     
अल्लाह ने मिटटी और गारे का एक पुतला बनाया और अपने सबसे 
बड़े फ़रिश्ते को हुक्म दिया कि इसको सजदा कर. 
फ़रिश्ते ने लाहौल (धिक्कार) पढ़ी और कहा मैं अग्नि निर्मित 
और इस माटी के माधो को सजदा करूँ ?
अल्लाह को ग़ुस्सा आया और फ़रिश्ते को इब्लीस मरदूद क़रार दे दिया 
और जन्नत से बाहर का रास्ता दिखलाया। 
जाते जाते इब्लीस शैतान ने अल्लाह को गच्चा देते हुए 
उसके कुछ अख़्तियार ले ही गया.
अपनी हिकमत ए अमली के बदौलत वह बन्दों का ख़ुदाए सानी बन गया 
अर्थात अल्लाहु असग़र, गोया मिनी शैतान. 
शैतान अल्लाह की तरह हर जगह विराजमान है, 
कुरआन की हर सूरह में शैतानुर रजीम का नाम पहले आता है, 
बिस्म अल्लाह का नाम बाद में (एक को छोड़ कर) 
इस्लाम में शैतान पेश पेश है और अल्लाह पस्त पस्त. 
इंसान के हर अमल में शैतान का दख़्ल है. 
करम अच्छे हों या बुरे, 
नतीजा ख़राब है तो शैतान के नाम 
अगर अच्छे रहे तो अअल्लाह के नाम .
(इस बे ईमानी को हज़रत ए इंसान ख़ुद तस्लीम करते हैं.) 
अल्लाह की तरह शैतान किसी की जान नहीं लेता, 
यह उसकी ख़ैर है .
शैतान ने ही इंसान को इल्म जदीद, मन्तिक़ और साइंस की ऐसी घुट्टी पिलाई कि वह सय्यारों पर पहुँच गया है. 
और अल्लाह के बन्दे याहू ! याहू !! रटने में लगे हैं. 
शैतान ही इंसान को नई तलाश में गामज़न रखता है, 
अक़ीदे जिसे वुस्वुसा, ग़ुनाह और ग़ुमराही कहते हैं।
अल्लाह की बख़्शी हुई ऊबड़ खाबड़ ज़मीन को शैतानी बरकतों ने 
पैरिस, लन्दन, न्यूयार्क, टोटियो, दुबई और बॉम्बे का रूप दे दिया है। 
***

Tuesday, December 18, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 30


 बागड़ बिल्ला 

नट खट बातूनी बच्चे से तंग आकर देर रात को माँ कहती है, 
बेटे सो जाओ नहीं तो बागड़ बिल्ला आ जाएगा. 
माँ की बात झूट होते हुए भी झूट के नफ़ी पहलू से अलग है. 
यह सिर्फ़ मुसबत पहलू के लिए है कि बच्चा सो जाए ताकि उसकी नींद पूरी हो सके, 
मगर यह झूट बच्चे को डराने के लिए है.
क़ुरआन का मुहम्मदी अल्लाह बार बार कहता है, 
"मैं डराने वाला हूँ "
ऐसे ही माँ बच्चे को डराती है.
लोग लोग उस अल्लाह से डरें जब तक कि सिने बलूग़त न आ जाए, 
यह बात किसी फ़र्द या क़ौम  के ज़ेहनी बलूग़त पर मुनहसर करती है कि 
वह बागड़ बिल्ला से कब तक डरे.
यह डराना एक बुराई, जुर्म और ग़ुनाह बन जाता है कि 
बच्चा बागड़ बिल्ला से डर कर किसी बीमारी का शिकार हो जाए, 
डरपोक तो वह हो ही जाएगा माँ की इस नादानी से. 
डर इसकी तमाम उम्र का मरज़ बन जाता है.
मुसलमान अपने बागड़ बिल्ला से इतना डरता है कि 
वह कभी बालिग़ ही नहीं होगा.
मूर्तियाँ जो बुत परस्त पूजते हैं, 
वह भी बागड़ बिल्ला ही हैं 
लेकिन उनको अधिकार है कि सिने- बलूग़त आने पर 
वह उन्हें पत्थर मात्र कह सकें, 
उन पर कोई फ़तवा नहीं, 
मगर मुसलमान अपने हवाई बुत को कभी बागड़ बिल्ला नहीं कह सकता.
***

Monday, December 17, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 29


अल्लाह बनाम क़ुदरत 

अल्लाह कुछ और नहीं यही क़ुदरत है, कहीं और नहीं, 
सब तुम्हारे सामने यहीं मौजूद है. 
अल्लाह के नाम से जितने नाम सजे हुए हैं, 
सब तुम्हारा वह्म हैं और साज़िश्यों की तलाश हैं. 
क़ुदरत जितना तुम्हारे सामने मौजूद है उससे कहीं ज़्यादः 
तुम्हारे नज़र और ज़ेहन से ओझल है. 
उसे साइंस तलाश कर रही है. 
जितना तलाशा गया है वही सत्य है,
बाक़ी सब इंसानी कल्पनाएँ हैं .
आदमी आम तौर पर अपने पूज्य की दासता चाहता है, 
ढोंगी पूज्य पैदा करते रहते हैं और हम उनके जाल में फंसते रहते हैं. 
हमें दासता ही चाहिए तो अपनी ज़मीन की दासता करें, इसे सजाएं, संवारें. 
इसमें ही हमारे पीढ़ियों का भविष्य निहित है. 
मन की अशांति का सामना एक पेड़ की तरह करें जो झुलस झुलस कर धूप में खड़ा रहता है, वह मंदिर और मस्जिद की राह नहीं ढूंढता, 
आपकी तरह ही एक दिन मर जाता है .
हमें ख़ुदाई हक़ीकत को समझने में अब देर नहीं करनी चाहिए, 
वहमों के ख़ुदा इंसान को अब तक काफ़ी बर्बाद कर चुके हैं, 
अब और नहीं. 
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Sunday, December 16, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -28


क़ुदरत के क़ानून 

क़ुदरत के कुछ अटल क़ानून हैं. 
इसके कुछ अमल हैं और हर अमल का रद्दे अमल, 
इस सब का मुज़ाहिरा और नतीजा है सच, 
जिसे क़ुदरती सच भी कहा जा सकता है.
क़ुदरत का क़ानून है 2+2=4 इसके इस अंजाम 4 के सिवा 
न पौने चार हो सकता है न सवा चार. 
क़ुदरत जग जाहिर (ज़ाहिर) है और तुम्हारे सामने मौजूद है.
क़ुदरत को पूजने की कोई लाजिक नहीं हो सकती, कोई जवाज़ नहीं, 
मगर तुम इसको इससे हट कर पूजना चाहते हो, 
इस लिए होशियारों ने इसका ग़ायबाना बना दिया है. 
उन्हों ने क़ुदरत को माफ़ौक़ुल फ़ितरत (अलौकिक) शक्ल देकर 
अल्लाह और भगवन वग़ैरा बना दिया है. 
तुम्हारी चाहत की कमज़ोरी का फ़ायदा ये समाजी कव्वे उठाया करते है. 
तुम्हारे झूठे पैग़मबरों ने क़ुदरत की वल्दियत भी पैदा कर रखा है 
कि सब उसकी क़ुदरत है.  
दर असल दुन्या में हर चीज़ क़ुदरत की ही क़ुदरत है, 
जिसे समझाया जाता है कि इंसानी ज़ेहन रखने वाला, 
उस अल्लाह की क़ुदरत है.
क़ुदरत कहाँ कहती है कि तुम मुझको तस्लीम करो, पूजो और मुझसे डरो? 
क़ुदरत का कोई अल्लाह नहीं और अल्लाह की कोई क़ुदरत नहीं. 
दोनों का दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं. 
क़ुदरत ख़ालिक़ भी है और मख़लूक़ भी. 
वह मंसूर की माशूक भी है और राबिया बसरी का आशिक़ भी. 
भगवानों, रहमानों और शैतानों का उस के साथ दूर का भी रिश्ता नहीं है. 
देवी देवता और अवतार पयंबर तो उससे नज़रें भी नहीं मिला सकते. 
क़ुदरत के अवतार बने जो पयंबर हैं, सब झूटे हैं.
उसके मद्दे मुक़ाबिल खड़े हुए उसके खोजी हमारे साइंसटिस्ट हैं, 
जिनकी शान है उनकी फ़रमाए हुए मज़ामीन और उनके नतायज 
जो मख़लूक़ को सामान ए ज़िंदगी देते हैं. 
मजदूरों को मशीने देते है और किसानो को नई नई भरपूर फ़सलें. 
यही मेहनत कश इस कायनात को सजाने और संवारने में लगे हुए हैं. 
सच्चे फ़रिश्ते यही हैं.
तुम अपने गरेबान में मुँह डाल कर देखो कि कहीं तुम भी तो 
इन अल्लाह फ़रोशो के शिकार तो नहीं?
क़ुदरत को सही तौर पर समझ लेने के बाद, 
इसके हिसाब से ज़िंदगी बसर करना ही जीने का सलीक़ा है.
***

Saturday, December 15, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -27


ईमान      

सिने बलूग़त से पहले मैं ईमान का मतलब माली लेन देन की पुख़्तगी को समझता रहा, मगर जब मुस्लिम समाज में प्रचलित शब्द "ईमान" को जाना तो मालूम हुवा कि 
"कलमाए शहादत", पर यक़ीन रखना ही इस्लामी इस्तेलाह (परिभाषा) में ईमान है, 
जिसका माली लेन देन से कोई वास्ता नहीं. 
कलमाए शहादत का निचोड़ है अल्लाह, रसूल, क़ुरआन और इनके फ़रमूदात पर आस्था के साथ यक़ीन रखना, ईमान कहलाता है. 
सिने बलूग़त आने पर एहसास ने इस पर अटल रहने से बग़ावत करना शुरू कर दिया 
कि इन की बातें माफ़ौक़ुल फ़ितरत (अप्राकृतिक और अलौकिक) हैं. 
मुझे इस बात से मायूसी हुई कि लेन देन का पुख़्ता होना ईमान नहीं है 
जिसे आज तक मैं समझरहा था. 
बस्ती के बड़े बड़े मौलानाओं की बेईमानी पर मैं हैरान हो जाता कि 
ये कैसे मुसलमान हैं? 
मुश्किल रोज़ बरोज़ बढ़ती गई कि इन बे-ईमानियों पर ईमान रखना होगा.? 
धीरे धीरे अल्लाह, रसूल और क़ुरआनी फ़रमानों का मैं मुंकिर होता गया और 
ईमाने-अस्ल मेरा ईमान बनता गया कि क़ुदरती सच ही सच है. 
ज़मीर की आवाज़ ही हक़ है.
हम ज़मीन को अपनी आँखों से गोल देखते है जो सूरज के गिर्द चक्कर लगाती है, 
इस तरह दिन और रात हुवा करते हैं. 
अल्लाह, रसूल, क़ुरान और इनके फ़रमूदात पर यक़ीन करके इसे रोटी की तरह चिपटी माने, और सूरज को रात के वक़्त अल्लाह को सजदा करने चले जाना, 
अल्लाह का उसको मशरिक की तरफ़ से वापस करना - - -  
ये मुझको क़ुबूल न हो सका. 
मेरी हैरत की इन्तहा बढ़ती गई कि मुसलमानों का ईमान कितना कमज़ोर है. 
कुछ लोग दोनों बातो को मानते हैं, 
इस्लाम के रू से वह लोग मुनाफ़िक़ हुए यानी दोग़ले. 
दोग़ला बनना भी मुझे मंज़ूर न हुवा.
मुसलमानों! 
मेरी इस उम्रे-नादानी से सिने-बलूग़त के सफ़र में आप भी शामिल हो जाइए और 
मुझे अक़ली पैमाने पर टोकिए, जहाँ मैं ग़लत लगूँ. 
इस सफ़र में मैं मुस्लिम से मोमिन हो गया, जिसका ईमान, 
सदाक़त पर अपने अक़ले-सलीम के साथ सवार है. 
आपको दावते-ईमान है कि आप भी मोमिन बनिए 
और आने वाले बुरे वक़्त से नजात पाइए. 
आजके परिवेश में देखिए कि मुसलमान ख़ुद मुसलमानों का दुश्मन बना हुआ है, 
वह भी पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईराक़ और दीगर मुस्लिम मुमालिक में
आपस में मद्दे-मुक़ाबिल है. 
बाक़ी जगह ग़ैर मुस्लिमो को वह अपना दुश्मन बनाए हुए है. 
क़ुरान के नाक़िस पैग़ाम अब दुन्या के सामने अपने असली रूप में 
हाज़िर और नाज़िल हैं. 
इंसानियत की राह में हक़ परस्त लोग इसको क़ायम नहीं रहने देंगे, 
वह सब मिलकर इस ग़ुमराह कुन इबारत को ग़ारत कर देंगे, 
उसके फ़ौरन बाद आप का नंबर होगा. 
जागिए मोमिन हो जाने का क़स्द करिए, 
 मोमिन बनना इतना आसान भी नहीं, 
सच बोलने और सच जीने में लोहे के चने चबाने पड़ते हैं. 
मोमिन बन जाने के सब आसान हो जाता है, 
इसके बाद तरके-इस्लाम का एलान कर दीजिए.
***

Friday, December 14, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 26


मैं ख़ुदा हूँ 

मैं ख़ुदा की तलाश में बहुत दूर तक निकल जाता हूँ ,
मुझे कुछ नहीं मिलता, सिवाय ख़ुद के. 
मैं ख़ुद को ही ख़ुदा पाता हूँ.
मुकम्मल और बा अख़्तियार ख़ुदा. 
इस बात का इक़रार एक ख़ुश गवार अहसास होता है, 
मगर इस बात का एलान हिमाक़त है, जैसा कि मंसूर ने किया. 
प्रचलित ख़ुदाओं की इबादत, भक्ति और कर्मकांड की पैरवी है, 
अपनी पसंद नहीं, बस नक़ल भर है, और ढोंग भी.
 ख़ुद में ख़ुदा बन कर ज़िंदगी बिताने में बड़ा आनंद है, बहुत मज़े हैं. 
सब से बड़ी नेमत यह है कि इस में आज़ादी का एहसास होता है. 
ख़ुद में ख़ुदा बन कर जीना बहुत ही आसान है, 
बस कि जो ख़ुद अपने लिए चाहो, वही दूसरों के लिए भी पसंद करो. 
इस में ज़रा सी भी लग़ज़िश, ख़ुदाई को शैतान बना देती है. 
ख़ुदा और शैतान ही व्यक्तित्व के दो आकार हैं.
 ख़ुदाई की हद है, शैतानियत की कोई हद नहीं. 
शैतानियत चंगेज़ भी बन सकता है और हिटलर भी , 
मगर अपने चुने हुए ख़ुदा की एक हद है, 
कि वह दूसरों में भी ख़ुद को पाता है.
वह अपनी ख़ुदाई का एलान भी नहीं कर सकता.  
इंसानी समाज का एक ही हल है कि वह ख़ुद को पहचाने और ख़ुदा बन जाए.
कण कण में भगवान है, यह ख़ुदा की अधूरी पहचान है. 
पूरी पहचान यह है कि जन जन में भगवान है.
***

Thursday, December 13, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 25


दर्जात-ए-इंसानी              
    
आम तौर पर दुन्या में तीन तरह के लोग होते हैं 
जिनको स्तरीय दृष्ट से परखा जा सकता है और दर्जात दिए जा सकते हैं.
अव्वल दर्जा लोग 
मैं दर्जा-ए-अव्वल में उन इंसान को शुमार करता हूँ जो सच बोलने में 
ज़रा भी देर न करते हों, 
उसका मुतालिआ (अध्यन) अश्याए क़ुदरत के बारे में फ़ितरी (लौकिक) हो 
(जिसमें ख़ुद इंसान भी एक अश्या है.) 
वह ग़ैर जानिबदार हो, अक़ीदा, आस्था और मज़हबी उसूलों से बाला तर हो, 
जो जल्द बाज़ी में किए गए "हाँ" को सोच समझ कर 'न' कहने पर 
एकदम न शरमाएं और मुआमला साज़ हों. 
जो पूरी कायनात के ख़ैर ख़्वाह हों, 
दूसरों को माली, जिस्मानी या ज़ेहनी नुक़सान, 
अपने नफ़ा के लिए न पहुंचाएं, 
जिनके हर अमल में इस धरती और इस पर बसने वाली मख़लूक़ का 
ख़ैर वाबिस्ता हो, 
जो बेख़ौफ़ और बहादर हों और इतना बहादर कि उसे दोज़ख़ में जलाने 
वाला नाइंसाफ़ अल्लाह भी अगर उसके सामने आ जाए तो 
उस से भी दस्त व गरीबानी के लिए तैयार रहें . 
ऐसे लोगों को मैं दर्जाए अव्वल का इंसान और उच्च  स्तरयीय शुमार करता हूँ. 
ऐसे लोग ही हुवा करते हैं साहिब-ए-ईमान और  ''मर्द -ए-मोमिन''. 
दोयम दर्जा लोग
मैं दोयम दर्जा उन लोगों को देता हूँ जो उसूल ज़दा यानी नियमों के मारे होते हैं. 
यह सीधे सादे अपने पुरखों की लीक पर चलने वाले लोग होते हैं. 
पक्के धार्मिक होते हुए भी अच्छे इंसान भी होते हैं. 
इनको इस बात से कोई मतलब नहीं कि इनकी धार्मिकता 
समाज के लिए अब ज़हर बन गई है, 
इनकी आस्था कहती है कि इनकी मुक्ति नमाज़ और पूजा पाठ से है. 
अरबी और संसकृति में इन से क्या पढ़ाया जाता है, 
इस से इनका कोई लेना देना नहीं.
 ये बहुधा ईमानदार और नेक लोग होते हैं. 
शिकारी इस भोली भाली अवाम के लोगों का ही शिकार करता है. 
धर्म ग़ुरुओं, ओलिमा और पूँजी पतियों की पहली पसंद होते है यह, 
देश की जम्हूरियत की बुनियाद इसी दोयम दर्जे के कन्धों पर रखी हुई है.
सोयम दर्जा लोग
हर क़दम में इंसानियत का ख़ून करने वाले, 
तलवार की नोक पर ख़ुद को मोह्सिन-ए-इंसानियत कहलाने वाले, 
दूसरों की मेहनत पर तकिया धरने वाले, 
लफ़फ़ाज़ी और ज़ोर-ए-क़लम की ग़लाज़त से पेट भरने वाले, 
इंसानी सरों के सियासी सौदागर, 
धार्मिक चोले धारण किए हुए स्वामी, ग़ुरू, बाबा लंबी दाढ़ी और बड़े बाल वाले, 
सब के सब तीसरे दर्जे के लोग हैं. 
इन्हीं की सरपरस्ती में देश के मुट्ठी भर सरमाया दार भी हैं,
 जो देश को लूट कर पैसे को विदेशों में छिपाते हैं. 
यही लोग जिनका कोई प्रति शत भी नहीं बनता, 
दोयम दर्जे को ब्लेक मेल किए हुए है 
और अव्वल दर्जा का मज़ाक़ हर मोड़ पर उड़ाने पर आमादा रहते है. 
सदियों से यह ग़लीज़ लोग 
इंसान और इंसानियत को पामाल किए हुए हैं.
***

Wednesday, December 12, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 24


ख़ुदा  कहता है मुझे पूजो नहीं, मुझ से लड़ो 

तू ऐसा बाप है जो अपने बेटे को कुश्ती के दाँव पेंच सिखलाता है,
ख़ुद उससे लड़ कर,
चाहता है कि मेरा बेटा मुझे परास्त कर दे.
तू अपने बेटे को डांटता है यहाँ तक कि गाली भी दे देता है,
ये कहते हुए कि ''अगर मेरी औलाद है तो मुझे चित करके दिखला'',
बेटा जब ग़ैरत में आकर बाप को चित कर देता है,
तब तू मुस्कुराता, पुलकित होता है और शाबाश कहता है.

प्रकृति पर विजय पाना ही मानव का लक्ष है,
उसको पूजना नहीं.
मेरा ख़ुदा कहता है तुम मुझे हल हथौड़ा लेकर तलाश करो,
माला और तस्बीह लेकर नहीं.
तुम खोजी हो तो एक दिन वह सब पा जाओगे जिसकी तुम कल्पना करते हो,
तुम एक एक इंच ज़मीन के लिए लड़ते हो,
बेवकूफ़ो! मैं तुम को एक एक नक्षत्र देने के लिए तैयार हूँ.
तुम लम्बी उम्रों  की तमन्ना करते हो,
मैं तुमको मरने ही नहीं दूँगा जब तक तुम न चाहो ,
तुम तंदुरस्ती की आरज़ू करते हो,
मैं तुमको सदा जवान रहने का वरदान दूंगा,
शर्त है कि, तुम 
मेरे छुपे हुए राज़ो-नियाज़ को तलाशने की जद्दो-जेहाद करो,
मुझे मत तलाशो,
मेरे नाम की लगी हुई इन रूहानी दूकानों पर तुम को 
अफ़ीमी नशा के सिवा कुछ न मिलेगा.
तुम जा रहे हो किधर ? सोचो,

पश्चिम जागृत हो चुका है. वह आन्तरिक्ष में आशियाना बना रहा है,
तुम आध्यात्म के बरगद के साए में बैठे पूजा पाठ और नमाज़ों में मग्न हो.
जागृत लोग नक्षर में चले जाएँगे तुम तकते रह जाओगे,
तुमको भी  ले जाएंगे साथ साथ,
मगर अपना ग़ुलाम  बना कर,
जागो, 
मोमिन सभी को जगा रहा है.
***

Tuesday, December 11, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -23


शर्म से डूब मरो        
         
एक थे बाबा इब्राहीम. 
यहूदियों, ईसाइयों, मुसलमानों 
(और शायद ब्रह्मा आविष्कारक आर्यन के भी) 
के मुश्तरका मूरिसे आला 
(मूल पुरुष) अब्राम, अब्राहम, इब्राहीम, ब्राहम. (और शायद ब्रह्म भी) 
बाबा इब्राहीम.
बहुत पुराना ज़माना था, अभी लौह युग भी नहीं आया था, 
हम उनका बाइबिल प्रचलित पहला नाम अब्राहम लिखते हैं कि 
वह पथर कटे क़बीले के ग़रीब बाप तेराह के बेटे थे, 
बाप तेराह बार बार बेटे अब्राहम से कहता कि 
बेटा! हिजरत करो, (विदेश जाना)
हिजरत में बरकत है, 
हो सकता है तुम को एक दिन वहाँ दूध और शहद वाला देश रहने को मिले. 
आख़िर एक दिन बाप तेराह की बात अब्राहम को लग ही गई, 
अब्राहम ने सामान ए सफ़र बांधा, 
जोरू सारा को और भतीजे लूत को साथ किया और तरके-वतन (खल्देइया) 
से बाहर निकला.
ख़ाके-ग़रीबुल वतनी छानते हुए मिस्र के बादशाह फ़िरअना के दरबार वह तीनो पहुँचे, 
माहौल का जायज़ा लिया. 
बादशाह ने दरबार आए मुसाफ़िरों को तलब किया, 
तीनों उसकी ख़िदमत में पेश हुए, 
अब्राहम ने सारा को अपनी बहन बतला कर 
ग़रीबुल वतनी से नजात पाने का हल तय किया, 
जबकि वह उसकी चचा ज़ाद बहन थी भी, 
सारा हसीन थी, बादशाह ने सारा को मन्ज़ूर ए नज़र बना कर 
अपने हरम में शामिल कर लिया.
एक मुद्दत के बाद जब यह राज़ खुला तो बादशाह ने अब्राहम की ख़बर ली 
मगर सारा की रिआयत से उसको कुछ माल मता देकर महल से बहार किया. 
उस माल मता से अब्राहम और लूत ने भेड़ पालन शुरू किया 
जिससे वह एक दिन मालदार चरवाहे बन गए. 
सारा को कोई औलाद न थी, 
उसने बच्चे की चाहत में अब्राहम की शादी अपनी मिसरी ख़ादिमा हाजरा से करा दी, जिससे इस्माईल पैदा हुआ, 
मगर इसके बाद ख़ुद सारा हामला हुई और उससे इस्हाक़ पैदा हुआ.
इसके बाद सारा और हाजरा में ऐसी महा भारत हुई कि 
अब्राहम को सारा की बात माननी पड़ी,  
वह हाजरा को उसके बच्चे इस्माइल के साथ बहुत दूर सेहरा बियाबान में छोड़ आया.

अब्राहम को उसके इलोही ने ख़्वाब में दिखलाया कि 
वह अपने छोटे बेटे इस्हाक़ की क़ुरबानी दे, 
वह इस्हाक़ को लेकर पहाड़ियों पर चला गया 
और आँख पर पट्टी बाँध कर उसे हलाल कर डाला 
मगर वह जब पट्टी आँख से उतारता है तो बच्चे की जगह मेंढा पाता है 
और इस्हाक़ सही सलामत सामने खड़ा होता है. (तौरात) 

मैं अब इस्लामी अक़ीदत से अबराम को '' हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम'' लिखूंगा 
जिनका सहारा लेकर मुहम्मद अपने दीन को दीने-इब्राहीमी कहते हैं.
सब से पहले, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर तीन जुर्म ख़ास - - - 
पहला जुर्म 
यह झूट कि उन्होंने अपनी बीवी सारा को बादशाह के सामने अपनी बहन बतलाया और उसको बादशाह की ख़ातिर हरम के हवाले किया.
दूसरा जुर्म 
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का दूसरा जुर्म कि अपनी बीवी हाजरा और बच्चे इस्माईल को दूर बिया बान सेहरा में मर जाने के छोड़ आए.
तीसरा जुर्म 
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर तीसरा जुर्म झूट का कि उन्हों ने अपने बेटे इस्हाक़ को हलाल किया था. 
दर असल उन्हों ने हलाल तो किया था मेंढे को ही मगर झूट की ऐसी बुन्याद डाली कि सदियों तक उस पर ख़ूनी जुर्म का अमल होता रहा.

ख़ुद मुहम्मद के दादा अब्दुल मुत्तलिब मनौती की बुन्याद पर मुहम्मद के बाप अब्दुल्ला को क़ुर्बान करने जा रहे थे मगर चाचाओं के आड़े आने पर सौ ऊँटों की क़ुर्बानी देकर अब्दुल्ला की जान बची. 
सोचिए कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के एक झूट पर हज़ारों सालों में कितनी जानें चली गई होंगी. 
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम झूट बोले, 
इस्हाक़ का मेंढा बन जाना ग़ैर फ़ितरी बात है, 
अगर अल्लाह मियाँ भी रूप धारण करके, आकर गवाही दें तो 
मेडिकल साइंस इस बात को नहीं मानेगी. 
अक़ीदा जलते तवे पर पैजामें जलाता रहे. 
ऐसे अरबी झूठे और मुजरिम पर हम नमाज़ों के बाद दरूद ओ सलाम भेजते हैं- - - 
अल्ला हुम्मा सल्ले . . . 
अर्थात 
''ऐ अल्लाह मुहम्मद और उनकी औलादों पर रहमत भेज जिस तरह तूने रहमत भेजी थी इब्राहीम और उनकी औलादों पर.बे शक तू तारीफ़ किया गया है, तू बुज़ुर्ग है."
मुसलमानों ! 
अपने बाप दादाओं के बारे में सोचो जिनको तुमने अपनी आँखों से देखा है कि 
उनहोंने किन किन मुसीबतों का सामना करके तुमको बड़ा किया है और 
उन बुजुगों को भी ज़ेहन में लाओ जिनका ख़ूने-अक़दस तुम्हारे रगों में दौड़ रहा है और जिनको तुमने देखा भी नहीं, हज़ारों साल पहले 
या फिर लाखों साल पहले 
कैसी कैसी मुसीबतों का सामना करते हुए 
तूफ़ानों से, सैलाबों से, दरिंदों से 
पहाड़ी खोह और जंगलों में रह कर तुमको बचाते हुए 
आज तक ज़िन्दा रक्खा है 
क्या तुम उनको फ़रामोश करके मुहम्मद की ग़ुम राहियों में पड़ गए हो ? 
अब्राहम की यहूदी नस्लों के लिए और अरबी क़ुरैशियों के लिए 
दिन में पाँच बार दरूद ओ सलाम भेजते हो? 
शर्म से डूब मरो. 
***

Monday, December 10, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -22


अल्लाह देख रहा है 

काश कि हम अल्लाह को इस क़दर क़रीब समझ कर ज़िन्दगी को जिएँ. 
मगर अल्लाह की गवाही का डर किसे है?
उसकी जगह अगर बन्दे में दरोग़ा जी के बराबर भी अल्लाह का डर हो तो इंसान ग़ुनाहों से बाज़ आ सकता है. 
कोई देखे या न देखे अल्लाह देख रहा है, 
की जगह यह बात एकदम सही होगी कि 
" कोई देखे या न देखे मैं तो देख रहा हूँ." 
दर अस्ल अल्लाह का कोई गवाह नहीं है, 
आलावा कुंद ज़ेहन मुसलमानों के जो लाउड स्पीकर से अज़ानें दिया करते कि 
" मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अलावा कोई अल्लाह नहीं"
और 
"मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके दूत हैं."
अल्लाह ग़ैर मुस्तनद है, 
और मैं अपनी ज़ात को लेकर सनद रखता हूँ कि मैं हूँ.
इस लिए मेरा देखना अपने हर आमाल को यक़ीनी बनता है. 
इसी को लेकर तबा ताबईन (मुहम्मद के बाद के) कहे जाने वाले 
मंसूर को सज़ाए मौत हुई, 
उसने एलान किया था कि मैं ख़ुदा हूँ (अनल हक़)
इंसान अगर अपने अंदर छिपे ख़ुदा का तस्लीम करके जीवन जिए तो 
दुन्या बहुत बदल सकती है.
***

Sunday, December 9, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -21



सच्चा रहनुमा कौन है?        

 * क्या आप ने कभी ग़ौर किया कि किस मसलके-इस्लाम से आप हैं है?
* क्या आपने कभी ख़याल किया कि आप का महफूज़ मुल्क कहाँ है?
* क्या आपने कभी सोचा कि आप में से किसी ने इस धरती को कुछ दिया, 
जिससे सब कुछ ले रहे है?
* क्या आप ने कभी खोजबीन की कि मौजूदा ईजाद और तरक़्क़ी में आपका कोई योगदान है?जब कि भोगने में सब से आगे है ?
* क्या आप ने कभी ख़याल किया कि अपनी नस्लों के लिए किया कर रहे हैं? 
बतौर नमूने के यह चन्द सवाल मैंने आपके सामने रख्खे हैं, 
सवाल तो सैकड़ों हैं. 
बग़ैर दूर अंदेशी के जवाब तो आपके पास हर सवाल के होंगे 
मगर हक़ीक़त में आप के पास कोई मअक़ूल जवाब नहीं, 
अलावः शर्मसार होने के, 
क्यूँकि आपको मुहम्मदी अल्लाह ने आप को ग़ुमराह कर रखा है 
कि यह दुन्या फ़ानी है और आक़बत की ज़िदगी लाफ़ानी. 
इस्लाम 90% यहूदियत है और यह अक़ीदा भी उन्हीं का है. 
वह इसे फ़रामोश करके आसमान में सुरंग लगा रहे हैं 
और मुसलमान उनकी जूठन चबा रहे हैं. 
पहला सवाल है मुसलमानों की रहनुमाई का? 
अलावा रूहानी हस्तियों के कोई क़ाबिले ज़िक्र नहीं, 
रूहानियत जो अपने आप में इंसान को निकम्मा बनाती है, 
इनको छोड़ कर जिसके शाने बशाने आप हों?
 आला क़द्रों में कबीर, शिर्डी का साईं बाबा जैसे जो आपके लिए 
नियारया हो सकते थे उनको आप ने इस्लाम से ख़ारिज कर दिया 
और वह हिन्दुओं में बस कर उनके अवतार बन गए. 
माज़ी क़रीब में क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिना 
शराब और सुवर के गोश्त के शौक़ीन थे, 
कभी भूल कर नमाज़ रोज़ा नहीं किया, 
कैसे पाकिस्तानियों ने उनको क़ायदे-आज़म बना दिया? 
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सूरज डूबते ही शराब में डूब जाते थे. 
ए.पी.जे अब्दुल कलाम तो मौजूदा ही हैं, 
मुसलमान उनको मुहम्मदी हिन्दू कहते हैं. 
इनमें से कोई इस्लाम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता.
 गाँधी जी जो आप के हमदर्दी में गोली के शिकार हुए, 
उनको आप के ओलिमा काफ़िर कहते हैं. 
बरेली के आला हज़रात ने तो उनकी अर्थी यात्रा में शामिल होने वाले 
मुसलमानों को काफ़िर का फ़तवा दे दिया था. 
एक कमाल पाशा तुर्की में मुस्लिम रहनुमा सही मअनो में हुवा, 
जिसको इस्लामी दुन्या क़यामत तक मुआफ़ नहीं करेगी. 
पिछली चौदह सदियों से आप लावारिस हैं, 
क्यूँकि आप का वारिस, मालिक, रहनुमा है मुहम्मदी अल्लह 
और वह फ़रेब जिसके आप शिकार हैं आप के आख़रुज़्ज़मा, 
सललल्लाहो अलैहे वसल्लम.
आप किस टाइप के मुसलमान है? 
टाईप नंबर एक तो आप को काफ़िर कहता है. 
हर मस्जिद किसी न किसी मुल्ला की हुकूमत बनी हुई है. 
ख़ुद मुहम्मद ने मस्जिदे नबवी को अपने हाथों से मदीने में मिस्मार किया 
कि वह काफ़िरों की मस्जिद हो गई थी. 
अली ने तीनो ख़लीफ़ाओं को क़त्ल कराया, 
यहाँ तक कि उस्मान ग़नी की लाश तीन दिनों तक सड़ती रही, 
तब रहम दिल यहूदियों ने उनको अपने क़ब्रिस्तान में दफ़नाया था. 
दुन्या भर में बक़ौल मुहम्मद अगर मुसलमानों के 72 फिरक़े हो चुके थे, 
तो उनमें से 71 आपका जानी दुश्मन है.
फिर भी आप मुसलमान हैं? 
जाएँगे भी कहाँ? सोचें कि कोई रास्ता बचा है आपके लिए?
आपका कोई मुल्क नहीं,  
आप आज़ादी के साथ कहीं भी नहीं रह सकते, 
हर मुल्क में आप पड़ोस में दुश्मन पाले हुए हैं. 
आपका कोई मुल्क हो ही नहीं सकता, 
तमाम दुन्या पर इस्लाम को छा देने की आप का मिशन जो है. 
आप को अमलन देखा गया है कि मुस्लिम हुक्मरान हमेशा 
एक दूसरे को फ़तह करते रहे. 
बस काबे में आप सब ज़रूर इकठ्ठा होते हैं, 
लबबैक कह कर, ताकि क़ुरैशियों को इमदाद जारिया हो 
और आप को मुहम्मदी सवाब मिले.
आप ने ख़िदमत ए ख़ल्क़ के लिए कोई ईजाद की? 
कोई तलाश कोई या कोई खोज मुसलमानों द्वारा वजूद में आई ? 
आप दो चार मुस्लिम नाम गिना सकते हैं और 
ए. पी जे. अब्दुल कलाम को भी पेश कर सकते हैं, 
मगर आप अच्छी तरह जानते हैं कि साइंटिस्ट कभी मुसलमान हो ही नहीं सकता. मुसलमान तो सिर्फ़ अल्लाह का खोजी होता है 
और मुसलमान उम्मी मुहम्मद को सब से बड़ा साइंसदान ख़याल करता है. 
जहाँ कोई फ़नकार बना कि टाट पट्टी से बाहर हुवा. 
मकबूल फ़िदा हुसैन या नव मुस्लिम ए. आर. रहमान जैसी 
आलमी हस्तियाँ क्या इस्लाम को गवारा हैं? 
हम तो यहाँ तक कहेंगे कि मुसलमानों को नई ईजादों की बरकतों को 
छूना भी नहीं चाहिए, चाहे रेल हो या हवाई सफ़र हो, 
चाहे बिजली हो. मोबाईल हो, कप्यूटर हो,ए.सी हो, 
मुसल्म्मानों के लिए हराम हो जाना चाहिए, 
या फिर इस्लाम हराम हो जाना चाहिए
तब होश ठिकाने आएँगे. 
साइंस की तअलीम भी मुसल्म्मानों लिए ममनू हो 
अगर तालिब इल्म इस्लामी अक़ीदे का हो, 
वरना जदीद इल्म का इस्तेमाल इनको तालिबान बना कर 
इंसानियत पर ख़ुदकुश बम बन कर नाज़िल होता रहेगा.
क्या आपने कभी सोचा कि मुहम्मद के बाद मुसलमानों में कोई 
आलमी हस्ती पैदा हुई है? 
कोई नहीं. 
उन्हों ने इसकी इजाज़त ही नहीं दी. 
ज़माना जितना आगे जाएगा, मुसलमान उतना ही पीछे चला जायगा. 
एक दिन इसके हाथ में झाड़ू पंजा आ जाएगा. 
इसकी अलामत बने मज़लूम बिरादरी ( मेहतर ) भी जग गई है 
मगर मुसलमानों की नींद ही नहीं खुल रही है.
मुसलमानों ! 
मोमिन आप के साथ रहते हुए आप को जगा रहा है, 
वरना उसके लिए बड़ा आसान था ईसाई या हिन्दू बन जाना. 
क्यूं अपनी जान को हथेली पर रख कर मैदान में उतरा? 
इस लिए कि आप लोग सब से ज़्यादः इंसानी बिरादरी की आँखों में खटक रहे हो. 
मै आपका कुछ भी नहीं छीनना चाहता, 
जैसे हैं, जहाँ हैं, बने रहिए, 
बस ईमानदार मोमिन बन जाइए, 
देखिएगा कि ज़माने कि नफ़रत आपकी पैरवी में बदल जाएगी.
इस्लामी ओलिमा को अपनी ड्योढ़ी मत लांगने दीजिए, 
इन्हें गलाज़त आलूद खिंजीर मानिए. 
इनके अलावा जो भी आपको इस्लाम के हक़ में समझाए, 
देखिए कि इसकी रोज़ी रोटी तो इस्लाम से वाबिस्ता तो नहीं है? 
ऐसे लोगों की मदद कीजिए कि वह हराम ज़रीआ मुआश बदल सकें. 
आप जागिए और दूसरों को जगाइए.
***

Saturday, December 8, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -20


ईमानी कमजोरियाँ 

मैं वयस्कता से पहले ईमान का मतलब लेन देन के तकाजों को ही समझता था (और आज भी सिर्फ़ इसी को समझता हूँ) 
मगर इस्लामी समझ आने के बाद मालूम हुवा कि इस्लामी ईमान का 
अस्ल तो कुछ और ही है, वह है 'कलमा ए शहादत', 
यानीअल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखना, 
क़समे-आम और क़समे-पुख़्ता . 
इन बारीकियों को मौलाना जब समझ जाते है कि अल्लाह 
झूट को  कितना दर ग़ुज़र करता है तो वह लेन देन की बेईमानी भरपूर करते हैं. 
मेरे एक दोस्त ने बतलाया कि उनके क़स्बे के एक मौलाना, 
जो मस्जिद के पेश इमाम हैं, मदरसे के मुतवल्ली, क़ुरआन के आलिम, 
बड़े मोलवी, साथ साथ ग्राम प्रधान रहे .
हज़रात ने क़स्बे की एक रंडी हशमत जान का खेत पटवारी को पटा कर जीम का नुकता बदलवा कर नीचे से ऊपर करा दिया जो जान की जगह ख़ान हो गया. हज़रात के वालिद मरहूम का नाम हशमत ख़ान था. 
विरासत हशमत ख़ान के बेटे, बड़े मोलवी साहब उमर ख़ान की हो गई, 
हशमत रंडी की सिर्फ़ एक बेटी छम्मी थी (अभी जिंदा है), उसने उसको मोलवी के क़दमों पर लाकर डाल और कहा
"मोलवी साहब इस से मैं रंडी पेशा न कराऊँगी, रहम कीजिए, 
अल्लाह का खौ़फ़  खाइए - - "- 
मगर मोलवी का दिल न पसीजा उसका ईमान कमज़ोर नहीं था,
 बहुत मज़बूत था. 
उसके दो बेटे हैं, मेरे दोस्त बतलाते हैं दोनों डाक्टर है, 
और पोता कस्बे का चेयर मैन है. 
रंडी की और मदरसे की हडपी हुई जायदादें सब उनके काम आ रही हैं. 
यह है ईमान की बरकत. 
मुसलमानो के इस ईमानी झांसे में हो सकता है ग़ैर मुस्लिम इन से 
ज़्यादः धोका खाते हों कि ईमान लफ्ज़ अहद को समझते हों.
अहद की बात आई तो तसुव्वुर क़ायम हुवा
 "प्राण जाए पर वचन न जाए" 
***

Friday, December 7, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -19


दीन के मअनी हैं दियानत दारी.      

इस्लाम को दीन कहा जाता है मगर इसमें कोई दियानत दारी नहीं है. 
अज़ानों में मुहम्मद को अल्लाह का रसूल कहने वाले 
बद दयानती का ही मुज़ाहिरा करते हैं . 
वह अपने साथ तमाम मुसलमानों को ग़ुमराह करते हैं, 
उन्हों ने अल्लाह को नहीं देखा कि वह मुहम्मद को अपना रसूल बना रहा हो, 
न अपनी आँखों से देखा और न अपने कानों से सुना, 
फिर अज़ानों में इस बे बुन्याद आक़ेए की गवाही दियानत दारी कहाँ रही ? 
क़ुरआन  की हर आयत दियानत दारी की पामाली करती है जिसको अल्लाह का कलाम कह गया है. 
नई साइंसी तहक़ीक़ व तमीज़ आज हर मौज़ूअ को निज़ाम ए क़ुदरत के मुताबिक़ सही या ग़लत साबित कर देती है. 
साइंसी तहक़ीक़ के सामने धर्म और मज़हब मज़ाक मालूम पड़ते हैं. 
बद दयानती को पूजना और उस पर ईमान रखना ही 
इंसानियत के ख़िलाफ़ एक साज़िश है या फ़िर नादानी है. 
हम लाशऊरी तौर पर बद दयानती को अपनाए हुए हैं. 
जब तक बद दयानती को हम तर्क नहीं करते, 
इंसानियत की आला क़द्रें क़ायम नहीं हो सकतीं 
और तब तक यह दुन्या जन्नत नहीं बन सकती. 
आइए हम अपनी आने आली नस्लों के लिए इस दुन्या को जन्नत नुमा बनाएँ. 
इस धरती पर फ़ैली हुई धर्म व मज़हब की गन्दगी को ख़त्म करें, 
अल्लाह है तो अच्छी बात है और नहीं है तो कोई बात नहीं.
 अल्लाह अगर है तो दयानत दारी और ईमान ए सालेह को ही पसंद करेंगा, न कि इन साज़िशी जालों को जो मुल्ला और पंडित फैलाए हुए हैं. 
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Thursday, December 6, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 18


मोम जैसा मोमिन   
          
मुसलमानों! 
तुम अगर अपना झूटा मज़हब इस्लाम को तर्क कर के मोमिन हो जाओ 
तो तमाम कौमें तुम्हारी पैरवी के लिए आमादा नज़र आएँगी. 
कौन कमबख़्त ईमान दारी की क़द्र नहीं करेगा? 
माज़ी की तमाम दुन्या लाशऊरी तौर पर मौजूदा दुन्या की 
हुकूमतों को ईमानदार बनने के लिए कुलबुला रही है, 
मगर मज़हबी कशमकश इनके आड़े आती है. 
चीन पहला मुल्क है जिसने मज़हबी वबा से छुटकारा पा लिया है 
नतीजतन वह ज़माने में सुर्खुरू होता जा रहा है, 
शायद हम चीन की सच्ची सियासत की पैरवी पर मजबूर हो जाएं.
मोमिन लफ्ज़ अरबी है, इसके लिए तमाम इंसानियत अरबों की शुक्र ग़ुज़ार है कि इतना पाक साफ़ शुद्ध और लाजवाब लफ्ज़ दुन्या को उन्हों ने दिया 
जिसे एक अरब ने ही इस्लाम का नाम देकर इस पर डाका डाला 
और लूट कर इसे खोखला कर दिया.
मगर इसका असर अभी भी क़ायम है.
ऐसे ही "सेकुलर" लफ्ज़ को हमारे नेताओं ने लूटा है. 
सेकुलर के मानी हैं "ला मज़हब" 
जिसका नया मानी इन्हों ने गढ़ा है 
"सभी मज़हब को लिहाज़ में लाना" 
सियासत दान और मज़हबी लोग ही ग़ैर मोमिन होते हैं, 
अवाम तो मोम की तरह मोमिन होती है, 
हर सांचे में ढल जाती है.
***