मैजिक आई
अल्ताफ़ हुसैन 'हाली'(हलधर) कहते हैं अँधेरा जितना गहरा होता है, मैजिक आई उतनी ही चका चौंध और मोहक़ लगती है. हाली साहब सर सय्यद के सहायकों में एक थे, रेडियो कालीन युग था जब रेडियो में एक मैजिक आई हुवा करती थी, श्रोता गण कान गाने पर और आँखें मैजिक आई पर गड़ोए रहते थे.
हाली का अँधेरे से अभिप्राय था निरक्षरता.
कहते हैं कि चम्मच से खाने पर भी मुल्लाओं का कटाक्ष होता है,
जब कि यह साइंसटिफ़िक है, क्यूँकि इंसान की त्वचा बीमारी के कीटाणुओं को आमंत्रित करती है.
सर सय्यद को मुल्लाओं ने काफ़िर होने का फ़तवा दे दिया था.
पता नहीं मौलाना हाली को बख़्शा या नहीं.
क़ुरआन का स्पाट तर्जुमा और उस पर बेबाक तबसरा पहली बार शायद भारतीय माहौल में मैंने किया है.
मेरे विश्वास पात्र सरिता मैगज़ीन के संपादक स्वर्गीय विश्व नाथ जी को मैंने अपनी लेखनी की एक झलक दिखलाई, उन्हों ने कहा इतना तो मैं भी समझता हूँ जो तुम समझते हो मगर इसका फ़ायदा क्या?
मुफ़्त में अंगार हाथ में ले रहे हो.
और मेरे लेख की पंक्तियाँ उन्हें अंगार लगीं, सरिता में जगह देने से इंकार कर दिया.
क़ुरआन को नग्नावस्था में देखने के बाद होशयार की रालें टपक पड़ती हैं कि एक अनपढ़, अगर इतना बड़ा पैग़म्बर बन सकता है तो मैं क्यूँ नहीं?
न बड़ा तो मिनी पैग़म्बर ही सही.
गोया चौदह सौ सालों से मुहम्मद की नक़्ल में जगह जगह मिनी पैग़म्बर कुकुर मुत्ते की तरह पैदा हो रहे हैं. इसी सिलसिले के ताज़े और कामयाब पैग़म्बर मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी हुए हैं.
यह मुहम्मद की ही भविष्य वाणी के फल स्वरुप हैं कि
'' ईसा एक दिन मेहदी अलैहिस्सलाम बन कर आएँगे और दज्जाल को क़त्ल कर के इस्लाम का राज क़ायम करेंगे .''
मिर्ज़ा ने मुहम्मद की कल्पनाओं का फ़ायदा उठाया, और बन बैठे
''मेंहदी अलैहिस्सलाम''
क़दियानियों की मस्जिदें तक क़ायम हो गईं, वह भी पाकिस्तान लाहोर में. उसमें इस्लामी कल्चर के मुवाफ़िक़ क़त्ल ओ ग़ारत गरी भी होने लगी. पिछले दिनों 72 अहमदिए शहीद हुए.
उस शहादत की याद आती है जब मुहम्मद का वंश कर्बला में अपने कुकर्मों का परिणाम लिए इस ज़मीन से उठ गया था, वह भी 72 थे.
उम्मी (निरक्षर) मुहम्मद सदियों पहले अंध वैश्वासिक युग में हुए.
उन्होंने इर्तेक़ा (रचना क्रिया) के पैरों में ज़ंजीर डाल कर युग को और भी सदियों पीछे ढकेल दिया.
इस्लाम से पहले अरब योरोप से आगे था, ख़ुद इसे योरोपियन दानिश्वर तस्लीम करते हैं और अनजाने में मुस्लिम आलिम भी, मगर मुहम्मद ने सिर्फ़ अरब का ही नहीं दुन्या के कई टुकड़ों का सर्व नाश कर दिया.
युग का अँधेरा दूर हो गया है, धरती के कई हिस्सों पर रातें भी दिन की तरह रौशन हो गई मगर मुहम्मद का नाज़िला ( प्रकोपित) अंधकार मय इस्लाम अपनी मैजिक आई लिए मुसलमानों को सदियों पुराने तमाशे दिखा रहाहै.
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37 - अकेला चना
मैं एक मिटटी से वापस आ रहा था, साथ में मेरे एक ख़ासे पढ़े लिखे रिश्तेदार भी थे. चलते चलते उन्हों ने एक झाड़ से कुछ पत्तियां नोच लीं, उसमें से कुछ ख़ुद रख लीं और कुछ मुझे थमा दीं. मैं ने सवाल्या निशान से जब उनको देखा तो समझाने लगे कि मिटटी से लौटो तो हमेशा हरी पत्ती के साथ घर में दाख़िल हुवा करो.
मैंने सबब दरयाफ़्त किया कि इस से क्या होता है?
तो बोले इस से होता कुछ नहीं है, ये मैं भी जनता हूँ मगर ये एक समाज़ी दस्तूर है, इसको निभाने में हर्ज क्या है? घर में घुसो तो औरतें हाथ में हरी पत्ती देखकर मुतमईन हो जाती हैं, वर्ना बुरा मानती है.
ये है क़बीलाई ज़िंदगी की ज़ेह्नी ग़ुलामी का एक नमूना.
ये बीमारी नस्ल दर नस्ल हमारे समाज में चली आ रही है.
ऐसे बहुतेरे रस्म ओ रिवाज को हमारा समाज सदियों से ढोता चला आ रहा है.
तअलीम के बाद भी इन मामूली अंध विशवास से लोग उबार नहीं पा रहे.
दूसरी मिसाल इसके बर अक्स मैं अपनी तहरीर कर रहा हूँ कि मेरी शरीक-हयात दुल्हन के रूप में अपने घर से रुख़सत होकर मेरे घर नक़ाब के अंदर दाख़िल हुईं, दूसरे दिन उनको समझा बुझा कर नक़ाब को अपने घर से रुख़सत कर दिया,
कि दोबारा उन पर उसकी साया तक नहीं पड़ी.
मेरे इस फ़ैसले से नई नवेली दुल्हन को भी फ़ितरी राहत महसूस हुई,
मगर वक़्ती तौर पर उनको इसकी मुख़ालिफ़त भी झेलनी पड़ी,
बिल आख़िर मेरी भावजों को इससे हौसला मिला, उन्हों ने भी आख़िर नक़ाब तर्क कर दिया. इसका देर पा असर ये हुवा कि पैंतीस साल बाद हमारे बड़े ख़ान दान ने आख़िर कार नक़ाब को ख़ैर बाद कर बिया.
इन दो मिसालों से मैं बतलाना चाहता हूँ कि अकेला चना भाड़ तो नहीं फोड़ सकता मगर आवाज़ बुलंद कर सकता है. बड़े से बड़े मिशन की कामयाबी के लिए पहला क़दम तो उठाना ही पड़ेगा. इंसान अपने अंदर छिपी सलाहियतों से ख़ुद पहचानने से बचता राहता है.
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