Tuesday, December 4, 2018

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में - 16


मोमिन बा ईमान 

मेरे लेखों पर पाठक, ख़ास कर धरम धारियों के कमेंट्स ने तो मेरे होश ही उड़ा दिए. किसी ने मुझे गालियाँ दीं और किसी ने शाबाशी. एक शरीफ ने तो मेरी माँ को नरेंद्र मोदी के साथ सुला दिया, तो दुसरे ने अनाम धारी की माँ को. अफ़सोस है कि क्या मैंने सत्य पथ का रास्त इन लोगों के लिए चुना है? दो एक को छोड़ कर बाक़ी सभी धर्म पथ पर नहीं बल्कि धर्म भरष्ट हैं. मेरी माँ अगर ज़िदा होती तो नरेद्र मोदी उसके छोटे बेटे के बराबर होते और वह भी उनको रास्ट्र धर्म को याद दिलाती.

मैं एक बहुत ही निर्धन परिवार का बेटा हूँ . 
अनथक मेहनत से अपने सम्पूर्ण परिवार को ग़रीबी रेखा से ऊपर उठाया है, 
लाखों रुपए ईमानदारी के साथ इनकम टैक्स भरा है. 
माँ की बात चली है तो मैं इतने बचपन में उसे खो चुका हूँ कि मुझको उसकी शक्ल भी याद नहीं मगर उनको देखने के लिए अपने कालेज को उनके नाम से एक क्लास रूम बनवा कर दिया है. 
तालीम ही मेरी मंजिल है. 
मैं आज भी इसके लिए अपने आपको समर्पित रखता हूँ, 
मेरे पास कोई बड़ी डिग्री नहीं, न ही ढंग का लेखन कर पता हूँ 
मगर धर्म ग़ुरूओं का अध्यन किया है. 
फिर मुझे कबीर याद आता है, जो कहता है 
''तुम जानौ कागद की लेखी, मैं जानूं आखन की देखी.'' 
मेरे तमाम आलोचक कागद की लेखी को आधार बना कर 
मुझे उन लेखो का आइना दिखलाते हैं, 
जिनको पढ़ कर वह उधार ज्ञान अर्जित करते हैं. 
खेद है कि वह अपने दिलो-दिमाग और अपने ज़मीर को अपना साक्ष्य नहीं बनाते. 
मेरे लेख को क़ुरआन  के उर्दू तर्जुमे से सीधे मीलान 
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी'' 
के क़ुरआन  से कर लीजिए जो दुनया के सब से दिग्गज आलिम हैं और हदीसें ''बुखारी और मुस्लिम'' से मिला लीजिए. 
हाँ उस पर तबसरा मेरा है जो ज़्यादः किसी को गराँ ग़ुज़रता हो, 
उनको ही मेरा मशविरा है कि वह 
''कागत की लेखी'' पर न जाएं यह उधार का ज्ञान है. 
अगर आप की अपना कुछ अपने अन्दर बिसात और चेतना हो तो मेरी बात मने 
वर्ना हजारों ''बातिल ओलिमा'' हैं, उनपर अपनी तवानाई बर्बाद करें.
''दीन और ईमान'' ये दोनों लफ़्ज़ बहुत ही मुक़द्दस हैं और अरबी भाषा के हैं. 
इन शब्दों का पर्याय मेरे अल्प ज्ञान के अनुसार किसी और भाषा में नहीं हैं, इस लिए इनका अर्थ भी समझा पाना मुश्किल हो रहा है. 
दीन लफ़्ज़ बना है दयानत से जो कबीरी ''साँच'' है और ईमान का अर्थ लगभग ऐसा है जो किसी ''धर्म कांटे की नाप तौल'' हो.
जो किसी दूसरे भाव के असर में न हो. 
इन दोनों शब्दों पर इस्लाम ने बिल जब्र इजारा कर लिया है. 
शब्द मुसलमान, हिन्दू नहीं होते मगर इजारादारी का मनहूस साया इन पर ज़रूर है. मैं अपनी अंतर आत्मा के अंतर गत ईमान दार मोमिन हूँ, 
और मेरा दीन है मानवता. 
मानवता ही मानव धर्म होना चाहिए. 
आपसे निवेदन है कि मुझे समझने की कोशिश करें. 
हो सके तो आप भी ''मोमिन'' हो जाएँ.
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