सोया हुवा समाज
गीता की तरह अगर हम क़ुरआन सार निकलना चाहें तो वो ऐसे होगा - - -
अवाम को क़यामत आने के यक़ीन में लाकर, दोज़ख का खौफ़ और
जन्नत की लालच पैदा करना,
फिर उसके बाद मन मानी तौर पर उन भेड़ों को हाँकना''
क़यामत के उन्वान को लेकर मुहम्मद जितना बोले हैं उतना दुन्या में शायद किसी उन्वान पर बोला हो.
इस्लाम को अपना लेने के बाद मुसलमानों मे एक वाहियात इंफ़्रादियत आ गई है
मुहम्मद की इस 'बड़ बड़' को ज़ुबानी रट लेने की,
जिसे हफ़िज़ा कहा जाता है.
लाखों ज़िंदगियाँ इस ग़ैर तामीरी काम में लग कर अपनी फ़ितरी ज़िन्दगी से ना आशना और महरूम रह जाती हैं और दुन्या के लिए कोई तामीरी काम नहीं कर पातीं.
अरब इस हाफ़िज़े के बेसूद काम को लगभग भूल चुके हैं और तमाम हिंदो-पाक के मुसलमानों में रायज, यह रवायती ख़ुराफ़ात अभी बाक़ी है.
वह मुहम्मद को सिर्फ़ इतना मानते हैं कि उन्हों ने कुफ्र और शिर्क को ख़त्म करके वहदानियत (एक ईश्वर वाद) का पैग़ाम दिया.
मुहम्मद वहाँ आक़ाए दो जहाँ नहीं हैं.
यहाँ के मुसलमान उनको ग़ुमराह और वहाबी कहते हैं.
तुर्की में इन्केलाब आया, कमाल पाशा ने तमाम कट्टर पंथियों के मुँह में लगाम और नाक में नकेल डाल दीं, जिन्हों ने दीन के हक़ में अपनी जानें क़ुरबान करना चाहा उनको लुक़्मए अज़ल हो जाने दिया, नतीजतन आज योरोप में अकेला मुस्लिम मुल्क है जो योरोप के शाने बशाने चल रहा है.
कमाल पाशा ने बड़ा काम ये किया की इस्लाम को अरबी जुबान से निकाल कर टर्किश में कर दिया जिसके बेहतरीन नतायज निकले,
कसौटी पर चढ़ गया क़ुरआन.
कोई टर्किश हाफ़िज़ ढूंढे से नहीं मिलेगा टर्की में.
काश भारत में ऐसा हो सके,
क़ौम का आधा इलाज यूँ ही हो जाए.
हमारे मुल्क का बड़ा सानेहा ये मज़हब और धर्म है,
इसमें मुदाख़लत न हिदू भेड़ें चाहेगी और न इस्लामी भेड़ें,
इनके क़साई इनके नजात दिहन्दा बन कर इनको ज़िबह करते रहेंगे.
हमारे हुक्मरान अवाम की नहीं अवाम की 'ज़ेहनी पस्ती' की हिफ़ाज़त करते हैं. मुसलमान को कट्टर मुसलमान और हिन्दू को कट्टर हिन्दू बना कर इनसे इंसानियत का जनाज़ा ढुलवाते हैं.
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