'मेहमान नाज़ेबा'
अन्ना हज़ारे का इंक़्लाब आया और चार दिन में पूरे मुल्क को हिला कर चला गया. इस इंक़्लाब में गांधी के साथ कोई 'अबुल कलाम' नहीं था.
मुसलामानों का कहीं दूर दूर तक अता पता नहीं था.
शबाना आज़मी ज़रूर थी जिसको आलिमान इस्लाम "नचनियाँ,गवैया"
और नापाक औरत से नवाज़ते हैं. शबाना एक अज़ीम फ़नकारा ही नहीं,
एक अज़ीम इंसान भी है, जिसकी पहचान आक्सफोर्ड का एवार्ड है, जो इसे मिला.
ऐसी ही कुछ फ़िल्मी हस्तियाँ हैं जिनका मेल भारतीयता से खाता है.
अन्ना की हवा में जो जमाअत इस्लामी ने हिस्सा लिया वह 'मेहमान नाज़ेबा' थे.
उनकी तंजीम तो इस्लामी इंक़्लाब की मुंतज़िर है.
वह इंसानी मसायल से बेबहरे है.
चाहते हैं कि देश में तमाम रहनुमाओं की तस्वीरें उतार कर
अल्लाह की तस्वीर लगा दी जाए, जैसे अभी मिस्र में देखा गया
कि होस्नी मुबारक की तस्वीर हटा कर हवा का बुत,
यानी अल्लाह का तोग़रा लगा दिया गया.
बरेली के तथा कथित आला हज़रात ने उन मुसलामानों को कुफ़्र का फ़तवा दिया था जो गाँधी जी की अर्थी में शरीक हुए थे.
फिर भी उनके नाम की आला हजरत एक्सप्रेस चलाई जा रही है
और मुसलमान सुब्ह व शाम उसका ग़ुणगान करते हैं.
इस्लाम की घुट्टी मुसलमानों को दुन्या में कहीं सुर्ख रू नहीं होने देगी,
ये जहाँ भी दूसरी क़ौमों के साथ रहते हैं अपने आप में ज़लील ख़्वार रहते हैं.
जहाँ ये क़ाबिज़ हैं, हर रोज़ अपनी जेहादी मौत के नवाला आपस में होते रहते हैं. इस्लाम ने इंसानों को ऐसा ज़हरीला नशा पिलाया है
जिसकी काट अभी तक तो पैदा नहीं हुई है.
फिर मैं कहूँगा कि मुसलमान इस्लाम से तौबा करके
मुस्लिम से ईमान दार मोमिम हो जाएँ, एक एलान के साथ.
उनका कुछ न छिनेगा, न बदलेगा, न नाम, न तहज़ीब व तमद्दुन,
न रख रखाव और न किसी दूसरे धर्म की पैरवी.
धर्म के नए मानी हैं धाँधली जिस दिन इस बात को समझ कर कोई गाँधी,
कोई अन्ना पैदा होंगा, उस दिन हिदुस्तान में मुकम्मल इंक़्लाब आएगा.
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