Wednesday, January 23, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -62

 क़ाबिले-जुर्म आस्थाएँ        
जिस तरह आप कभी कभी ख़ुदाए बरतर की ज़ात में ग़र्क़ होकर 
कुछ जानने की कोशिश करते हैं, 
इसी तरह कभी मुहम्मद की ज़ात में ग़र्क़ होकर कुछ तलाश करने की कोशिश करें. अभी तक बहैसियत मुसलमान उनकी ज़ात में जो पाया है, 
शऊरी तौर पर देखा जाए तो वह सब दूसरों के मार्फ़त है.  
इनके क़ुरआन और इनकी हदीस में ही सब कुछ उजागर है. 
आपके लिए मुहम्मद की पैरवी कल भी ज़हर थी और आज भी ज़हर है. 
इंसानियत की अदालत में आज सदियों बाद भी इन पर मुक़दमा चलाया जा सकता है, जिसमे बहेस मुबाहिसे के लिए मुहज्ज़ब समाज के दानिशवरों को दावत दी जाय.
 इनका फ़ैसला यही होगा की इस्लाम और क़ुरआन पर यक़ीन रखना 
क़ाबिले जुर्म अमल होगा.
आज न सही एक दिन ज़रूर ऐसा वक़्त आएगा कि मज़हबी ज़ेहन रखने वाले 
तमाम मजहबों के अनुयाइयों को सज़ा भुगतना होगा 
जिसमे पेश पेश होंगे मुसलमान.
धर्म व् मज़हब द्वारा निर्मित ख़ुदा और भगवान दुर्गन्ध भरे झूट हैं, 
इसके विरोध में सच्चाई सुबूत लिए खड़ी है. 
मानव समाज अभी पूर्णतया बालिग़ नहीं हुवा है, 
यह अभी अर्ध विकसित है, 
इसी लिए झूट का बोल बाला है और सत्य का मुँह काला है. 
जब तक ये उलटी बयार बहती रहेगी, 
मानव समाज सच्ची खुशियों से बंचित रहेगा.   
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