Wednesday, January 30, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -67


 अन्दर से फूटी हुई चाहत     
हर शै की तरह इंसानी ज़ेहन भी इर्तेकई मरहलों के हवाले रहता है 
जिसके तहत अभी इंसानी मुआशरे को ख़ुदा की ज़रुरत है. 
कुछ लोग बहुत ही सादा लौह होते हैं, 
उन्हें अपने वजूद के सुपुर्दगी में मज़ा आता है. 
जैसे की एक हिन्दू धर्म पत्नि अपने पति को ही देवता मान कर 
उसके चरणों में पड़ी रहने में राहत महसूस करती है. 
हमारे एक डाक्टर दोस्त हैं, जो बहुत ही सीधे सादे नेक दिल इंसान हैं, 
वह अपने हर काम का अंजाम ईश्वर की मर्ज़ी पर डाल के बहुत सुकून महसूस करते हैं, उनको देख कर बड़ा रश्क आता है कि वह मुझ से बेहतर ज़िंदगी ग़ुज़ारते हैं, 
कभी कभी अन्दर का कमज़ोर इंसान भटक कर कहता है कि 
किसी न किसी ख़ुदा को मान कर ही जीना चाहिए. 
किसी का क्या नुक़सान है कि कोई अपना ख़ुदा रख्खे. 
ये फ़ितरते इंसानी ही नहीं, बल्कि फ़ितरते हैवानी भी है. 
एक कुत्ता अपने मालिक के क़दमों पर लोट पोट कर कितना ख़ुश होता है. 
बहुत से हैवान इंसान की पनाह में रहक़र ही अमाँ पाते हैं. 
अपने पूज्य, अपने माबूद, अपने देव और अपने मालिक के तरफ़ 
ये क़दम इंसान या हैवान के दिल के अन्दर से फूटा हुवा जज़बा है, 
न कि इनके ऊपर लादा गया लदान. 
ये किसी ख़ारजी तहरीक या तबलीग़ का नतीजा नहीं, 
इसके पीछे कोई डर, खौ़फ़ नहीं, कोई लालच या सियासत नहीं है. 
इसको मनवाने के लिए कोई क़ुरआनी अल्लाह की आयतें नहीं 
जिसके एक हाथ में दोज़ख़ की आग और दूसरे हाथ में जन्नत का ग़ुलदस्ता रहता है. 
अन्दर से फूटी हुई ये चाहत क़ुरआनी अल्लाह की तरह हमारे वजूद की घेरा बंदी नहीं करतीं. आपका ख़ुदा  किसी को मुतास्सिर न करे, शौक से पूजिए 
जब तक कि आप अपने सिने बलूग़त में न आ जाएं, 
आप की समझ में ज़िंदगी के राज़ ओ नयाज़ न झलकें. 
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