Monday, February 4, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -70


 इम्कानी अज़ाब 

कोई वलीद नाम का शख़्स था जिसने मुहम्मद के हाथों पर हाथ रख कर बैत की थी और इस्लाम क़ुबूल किया था. वह अपने घर वापस जा रहा था कि उसे कोई शनासा मिल गया और तहक़ीक़ की. वलीद ने जवाब दिया कि तुमने ठीक ही सुना है. 
मैं डर रहा हूँ कि मरने के बाद कोई ख़राबी न दर पेश हो. 
शनासा ने कहा बड़े शर्म की बात है कि तुम ने अपना और अपने बुज़ुर्गों के दीन को छोड़ कर एक सौदाई की बातों पर यक़ीन कर लिया. 
वलीद ने कहा मुमकिन है उसकी बातें सच हों और मैं जहन्नम में जा पडूँ?
शनासा बोला भाई मैं तुम्हारे वह इम्कानी अज़ाब अपने सर लेने का वादा कर रहा हूँ, बशर्ते तुम मुझे कुछ मॉल दो. 
वलीद इस बात पर राज़ी हो गया मगर कुछ मोल भाव के बाद. 
वलीद ने शनासा से इसकी तहरीर लिखवाई और दो लोगों की गवाही कराई फिर तय शुदा रक़म अदा करके अपने पुराने दीन पर लौट आया ये बात जब मुहम्मद के इल्म में आई तो क़ुरआनी आयत नाज़िल हुई.
आप उस वक़्त के इस वाकए से तब के लोगों का ज़ेहनी मेयार को समझ सकते हैं.
कुछ वलीद जैसे गाऊदियों ने इस्लाम क़ुबूल किया, फिर माले-ग़नीमत के लुटेरों ने. इसके बाद जंगी मज़लूमों ने इसे क़ुबूल किया.
 क़ुरआन खोखला पहले भी था और आज भी है.
वलीद जैसे सादा लौह कल भी थे और आज भी हैं.
देखना है तो टेली विज़न पर बाबाओं, बापुओं, स्वामियों 
और पीरों की सजी हुई महफ़िल देख सकते हैं.
शनासा जैसे होशियार और होश मंद भी हमेशा रहे ही हैं.
ज़रुरत है क़ौम को चीन जैसे इन्क़लाब की, 
जो अवाम की ज़ेहनी मरम्मत गोलियों की चन्द आवाज़ से करें, 
वर्ना हमारा मुल्क इसी कश मकश की हालत में पड़ा रहेगा.
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