ज़िंदगी जीने की चीज़ है
मुहम्मद की सोहबत में मुसलमान होकर रहने से बेहतर था कि
इंसान आलम-ए-कुफ्र में रहता.
मुहम्मद हर मुसलमान के पीछे पड़े रहते थे,
न ख़ुद कभी इत्मीनान से बैठे और न अपनी उम्मत को चैन से बैठने दिया.
इनके चमचे हर वक़्त इनके इशारे पर तलवार खींचे खड़े रहते थे
" या रसूल्लिल्लाह ! हुक्म हो तो गर्दन उड़ा दूं"
आज भी मुसलमानों को अपनी आक़बत पर ख़ुद एतमादी नहीं है.
वह हमेशा ख़ुद को अल्लाह का मुजरिम और ग़ुनाहगार ही माने रहता है.
उसे अपने नेक आमाल पर कम और अल्लाह के करम पर ज्यादह भरोसा रहता है.
मुहम्मद की दहकाई हुई क़यामत की आग ने मुसलमानो की शख़्सियत कुशी कर राखी है.
क़ुदरत की बख़्शी हुई तरंग को मुसलमानों से इस्लाम ने छीन लिया है.
सजदे में जाकर मेरी बातों पर ग़ौर करो,
अगर तुम्हारी आँख खुले तो,
सजदे से सर उठाकर अपनी नमाज़ की नियत को तोड़ दो
और ज़िदगी की रानाइयों पर भी एक नज़र डालो.
ज़िंदगी जीने की चीज़ है,
इसे मुहम्मदी जंजीरों से आज़ाद करो.
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