क़ानूने-फ़ितरत
तब्दीलियाँ क़ानूने-फ़ितरत हैं जो वक़्त के हिसाब से ख़ुद बख़ुद आती रहती हैं. मुहम्मद ने अपना दीन थोपने के लिए ''तबदीली बराए तबदीली'' की है
जो कठ मुल्लाई पर आधारित थी.
ख़ास कर औरतें इस में हादसाती लुक़्मा हुईं.
क़ब्ले-इस्लाम औरतों को यहाँ तक आज़ादी थी,
कि शादी के बाद भी कि अगर संतान से वंचित हैं तो
वह समाज के लायक़ ओ फ़ायक़ फ़र्द से,
अपने शौहर की रज़ामंदी के बाद, मासिक धर्म से फ़ारिग होकर,
उसकी ''शर्म गाह'' की तलब कर सकती थीं
और तब तक के लिए जब तक कि वह हामला न हो जाएँ .
ये रस्म अरब में अलल एलान थी और क़ाबिले-सताइश थी,
जैसा कि भारत में नियोग की प्रथा हुवा करती थी.
मुहम्मद ने अनमोल कल्चर का गला गोंट दिया,
मुसलमानों को सिर्फ़ यही याद रहने दिया गया कि
सललललाहो अलैहेवसल्लम ने बेटियों को जिंदा दफ़नाने को रोका.
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