थोथी बहसें
आजकल हमारे टेलीविज़न चैनलों पर हिन्दू मुस्लिम की
"जुबानी जंगी बहसों"
का सिलसिला बहुत पसंद किया जाता है.
दोनों वर्ग के कागज़ी पहलवान इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है ,
ख़ास कर जब दोनों ओर के मुल्ला और पंडित इकठ्ठा होते है.
यह दोनों नूरा कुश्ती किया करते है.
इसे जान साधारण आँख गड़ो कर देखते हैं और चैनलों की TRP
ऊंचाइयों पर चली जाती है.
दोनों तरफ़ के नेता और धर्म ग़ुरु कपट भरी बहसें करते हैं.
इस्लाम की व्याख्या दोनों महानुभाव बहुत एहतियात के साथ करते हैं.
क़ुरआनी आयतें दोनों वर्गों के पास प्रयक्ष रूप में होती हैं.
एक मिनट में वह क़ुरआनी आयतें पेश की जा सकती हैं
जिसमे मुहम्मदी अल्लाह खुलकर जिहाद का हुक्म देता है ,
बड़ी क्रूर तरीकों से मुसलमानो को जिहाद के लिए कहता है.
वह कहता है - - -
जिहाद तुम पर फ़र्ज़ कर दिया गया है और - - - 2=214
अल्लाह की राह में क़त्ताल करो और - - - 2=224-25
जिहाद में मरे हुए लोग मरे नहीं , वह ज़िंदा हैं और ख़ुश है - - - 3=70
जिहादी सूरह - - - 4=75 , 77 ,
मैं कुफ़्फ़ार के दिलों में रोब डाल देता हूँ , सो तुम गर्दनों पर मारो, पूरा पूरा मारो 8=2
जिहादी सूरह - - - 8 = 15-16-17
जिहादी सूरह- - - 8=39-43 -64-67
घात लगा कर कफ़िरों के लिए बैठे रहो, उन्हें पकड़ो, बांधो और मारो सूरह तौबा 9=5
सूरह तौबा ऐसी सूरह है जिसे अल्लाह अपने नाम से शुरू नहीं करता बाक़ी सभी 113 सूरतें बिस्मिल्लाह - - - से शुरू होती हैं.
(इस सूरह में अल्लाह कफ़िरों के साथ अपने किए हुए समझौता को तोड़ता है , समजौता था
लकुम दीनकुम वले यदीन (यानि तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए और हमारा दीन हमारे लिए )
जिस को मौलाना अज्ञान जनता के सामने रख कर इस्लाम की मिसाल देते हैं,
वह यह नहीं बतलाते कि यह मुआहिदा सिर्फ़ चार महीन चला जिसे अल्लाह जैसी ज़ात ने इसे तोड़ा और नए फ़रमान जारी किए. और तौबा करता है.
जिहादी सूरह- - - 9=5-16-29-31-39 -41,45, 47,53 ,74,86
जिहादी सूरह- - - 48 =15,16 ,20,23
जिहादी सूरह- - - 61 =10,11 - - 9=5-16-29-31-39
इन क़ुरानी पैग़ाम को हर मुल्ला और पंडित जानते हैं
मगर इसका एलान नहीं कर सकते.
मुल्ला इस लिए इस पैग़ाम का ख़ुलासा नहीं करता कि
वह रंगे हाथोँ पकड़ा जायगा और ला जवाब हो जाएगा.
पंडित इस वजह से इन क़ुरानी पैग़ाम को इस्लाम के मुंह पर नहीं मारता
कि उसके अपने धर्म में इससे भी बड़े शैतानी पैग़ाम छिपे हुए हैं
और वह नर मुंड पहने हुए काली माँ, कैलंडर की तरह मंज़र ए आम पर नुमायां है.
दोनों धर्म एक दूसरे के पूरक हैं.
उर्दू कहानी कार मीर अम्मन एक कहानी के किरदारों में एक ऐसे मंतर का इस्तेमाल करते हैं जो कि मरे हुए मुर्दे की आत्मा को,
किसी ज़िदा को मार कर उसमें डाल सकते हैं.
वह एक देव को मार कर उसकी आत्मा को एक तोते को मार कर
उसके मुर्दा शरीर में डाल देते हैं.
इस तरह देव की हक़ीक़त तोते में महफूज़ रहती है.
इस पसे मंज़र में पंडित जी तोते की गर्दन इस लिए नहीं मरोर सकते
कि तोते में उनके देव की आत्मा है, उसे मारने से ख़ुद उनका देव मर जाएगा.
इस तरह से मुल्ला और पंडित धर्म और मज़हब के विषैले जीव को मरने नहीं देते.
यह उनकी रोज़ी रोटी है.
इन बातों का हल यही है कि
इंसान धर्मों से मुक्ति पाए.
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