Tuesday, February 5, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -71

 इब्राहीम के जुर्म

हज़रात इब्राहीम ग़रीबुल वतनी की हालत में अपनी बीवी सारा को 
किसी मजबूरी के तहत अपनी बहन बतला कर मिसरी बादशाह 
फ़िरौन की पनाह में रहा करते थे. 
तौरेत के मुताबिक़ सारा हसीन थी और बादशाह कि मंजूरे नज़र हो कर उसके हरम में पनाह पा गई थी. 
सच्चाई खुलने पर हरम से बाहर की गई, साथ में इब्राहीम और उनका भतीजा लूत भी. 
उसके बाद दोनों चचा भतीजों ने मवेशी पालन का पेशा अपनाया 
और कामयाब गडरिए हुए.
बनी इस्राईल की शोहरत, तारीख़ में फ़िरअना के वज़ीर यूसुफ़ की ज़ात से हुई. 
युसूफ़ इतना मशहूर हुवा कि इसके बाप दादों का नाम तारीख़ में दर्ज हुवा. 
युसुफ़ के वजूद ने याक़ूब, इशाक, इस्माईल, और इब्राहीम जैसे 
मामूली लोगों का नामो निशान भी कहीं तारीख़ में न होता.
मानव की रचना कालिक अवस्था में इब्राहीम को जो होना चाहिए था वोह थे, 
न इतने सभ्य कि उन्हें पैग़ाबर कहा जाए, 
ना ही इतने बुरे कि जिन्हें अमानुष कहा जाय. 
मानवीय कमियाँ थीं उनमें कि अपनी बीवी को बहन बना कर बादशाह के शरण में गए और अपनी धर्म पत्नी को उसके हवाले किया. 
दूसरा उनका जुर्म ये था कि अपनी दूसरी गर्भ वती पत्नी हाजरा को पहली पत्नी सारा के कहने पर घर से निकल बाहर कर दिया था, जो कि रो धो कर सारा से माफ़ी मांग कर वापस घर आई. तीसरा जुर्म था कि इस्माईल के पैदा हो जाने के बाद हाजरा को एक बार फ़िर मय इस्माईल के घर से दूर मक्का के पास एक मरु खंड में मरने के लिए छोड़ आए. 
***

No comments:

Post a Comment