Sunday, February 17, 2019

धर्म और मज़हब - - - सच्चाई के आईने में -78


 ख़ुदाओं की आमद 
तख़लीक़ ए कायनात का ज़िक्र जब आता है, 
जो सिर्फ़ साढ़े छः हज़ार साल पहले दुन्या के वजूद में आने की बात करता है. 
तो वाक़ेया नाटा ठिंगना और हास्य स्पद लगने लगता है. 
लाखो वर्ष पहले के इंसानी और हैवानी कंकाल मिलते है, 
साढ़े छह हज़ार पहले पैदा होने वाला पहला आदमी आदम कहाँ ठहरता है ? 
यह सूरतें कोरी कल्पनाएँ हैं जहाँ पर अक़्ल ए इंसानी जाकर अटक जाती है.  
इनको कंडम किए बिना वह आगे नहीं बढ़ सकती. 
 बचती है डरबन की थ्योरी जो बतलाती है कि इंसान का वजूद भी दूसरे जीवों की तरह पानी से ही हुवा, यह ख़याल अभी तक का सत्य मालूम पड़ता है, 
बाक़ी पूर्ण सत्य आने वाले भविष्य में छुपा हुवा है. 
आप अपने सर मुबारक को खुजलाएं कि 
आप अपने ज़ेहनों में इन अक़्ली गद्दा रूहानियत फ़रोशों 
की दूकानों से ख़रीदा हुवा सौदा सजाए हुए हैं ?
या बेदारी की तरफ़ आने के लिए तैयार हैं ?
इन के मुरत्तब किए हुए ख़ुदाओं में से जो किसी एक को नहीं मानता, 
यह उसे कहते हैं जानवर हैं.  
अब रावी आपको फिर डर्बिन की तरफ़ ले जाता है, इसकी तलाश में आपको आंशिक रूप में कुछ न कुछ सच्चाई नज़र आएगी. हो सकता है इंसान की शाख़ जीव जंतु से कुछ अलग हो मगर इंसान हैवानी हालात से दो चार होते हुए ही यहाँ तक पहुंचा है. पाषाण युग तक इंसान यक़ीनी तौर पर हैवानो का हम सफ़र रहा है, 
इसके बावजूद तब तक आदमी सिर्फ़ आदमी ही था. 
उस वक़्त तक इंसानी ज़ेहन में किसी अल्लाह का तसव्वर क्यों नहीं आया ? 
उस वक़्त किसी ख़ुदा के खौ़फ़ से नहीं बल्कि वजूद के  
बक़ा पर तवज्जो हुवा करती थी. 
यह ख़ुदा फ़रोश इंसान के लिए ख़ुदा को इतना ही फ़ितरी और लाज़िम मानते हैं तो उस वक़्त ख़ुद ख़ुदा ने अपनी ज़ात को क्यों नहीं मनवा लिया.  
जैसा कि मैंने अर्ज़ किया कि अहद ए संग के क़ब्ल आदमी हैवानों का हम सफ़र था, इसके बाद इसको पहाड़ियों, खोहों, दरख़्तों और ज़मीनी पैदावारों ने कुछ राहत पहुंचाई. प्रकृतिक हलचल से भी कुछ नजात मिली, इंसान इंसानी क़बीलों में रहने लगा जिसकी वजह से इसमें कुछ हिम्मत और ताक़त आई. इसके बावजूद इसे जान तोड़ मेहनत और अपनी सुरक्षा से छुटकारा नहीं मिला. वह इतना थक कर चूर हो जाता कि उसे और कुछ सोचने का मौक़ा ही न मिलता. उस वक़्त तक किसी ख़ुदा का विचार इसके दिल में नहीं आया. 
वह रचना कालिक सीढ़ियाँ चढ़ता गया, चहार दीवारियाँ इंसान को सुरक्षित करती गईं, ज़मीनी फ़सलें तरतीब पाने लगीं, जंगली जानवर मवेशी बनकर क़ाबू में आने लगे. राहत की सासें जब उसे मयस्सर हुईं तो ज़ेहनों को कुछ सोचने का मौक़ा मिला. 
इंसानी क़बीलों के कुछ अय्यारों ने इस को भापा और ख़ुदाओं का रूहानी जाल बिछाना शुरू किया. इस कोशिश में वह बहुत कामयाब हुए. होशियार ओझों के यह फार्मूले ज़ेहनी ख़ूराक के साथ साथ मनोरंजन के साधन भी साबित हुए. 
इस तरह लोगों के मस्तिष्क में ख़ुदा का बनावटी वजूद दाखिल हुवा जोकि रस्म ओ रिवाज बनता हुवा वज्द और जुनून की कैफ़ियत अख़्तियार कर गया.  
दुन्या भर की ज़मीनों पर ख़ुदा अंकुरित हुवा, 
कहीं देव और देवियाँ उपजीं, कहीं पैग़मबर और अवतार हुए, तो कहीं निरंकार. 
इंसान ज़हीन होता गया, नफ़ा और नुक़सान विकसित हुए, 
फ़ायदे मंद चीज़ों को पूजने की तमीज़ आई, 
जिससे डरा उसे भी पूजना प्रारम्भ कर दिया. 
छोटे और बड़े ख़ुदा बनते गए या यूं कहे कि 
आने वाली महा शक्ति के कल पुर्ज़े ढलना शुरू हुए, 
जो बड़ी ताक़त बनी, 
उसका ख़ुदा तस्लीम होता गया. 
*** 

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